हमीं जब न होंगे तो क्या रंगे महफिल
लोग भूल गये हैं। लोगों को भूलने की बीमारी है। भूल जाना भी चाहिए।
जब तक भूलेंगे नहीं, इस कपटकायी संसार में नयी चीजें, नयी बयार, नये दस्तकों की आहट और आवक को आप महसूस कैसे करेंगे? दिमाग वैसे भी कोई आलू गोदाम तो होता नहीं। भूलना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जहां बुनियाद होती है, उस ठौर को हर हाल में बचाया जाना चाहिए-आंधी, पानी, मौसम की संगदिली और दाहक स्मृतियों से, जो कब आ धमकेंगी और हमसे हमारा आपा छीन लेंगी, कोई नहीं जानता।
उसे हर हाल में बियाबान होने से बचाना भी जरूरी है, ताकि वक्त कितना भी तीखा हो, परिंदों की परवाज़ बनी रहे, चहकता रहे आंगन और तुलसी के बिरवे संवाद करते रहें तितलियों से।
पूछते रहें कि तुमने नदी देखी? तुमने गुलाम मंडी देखी? तुमने बिकते हुए लोग देखे? तुमने क्रौंच वध देखा? क्या क्या देखा तुमने? यह तितली-तुलसी संवाद ही (चाहे काल्पनिक और मिथकीय जितना भी लगे) हमारे जीवन में रोज आकार लेते वक्त का बैरोमीटर है जो किरचों से बना है और जो आर-पार देख सकने की कला में प्रवीण है।
ऐसी ही कुछ सघन किरचों से हमारा परिचय कराती है एक किताब जिसमें मायानगरी मुंबई से लेकर कलकत्ता और जोधपुर जैसे शहर तक पिन्हा हैं।
अपनी पूरी आंतरिकता, पूरे द्वंद्व, पूरे ठाठ और पूरे ठसके के साथ। 'मेरा प्यार मुझे लौटा दो'। हां, यही नाम है उस किताब का।
लेखक हैं पत्रकार और अध्येता राजेंद्र बोड़ा, जिनसे खाना भले छूट जाए लेकिन संगीत, कला और सिनेमा से जिनकी आशनाई नहीं छूटती।
याद इसलिए भी रह गया यह नाम क्योंकि यह किताब हम औसत लोगों के हालाते हाजरा पर तफ्सरा भी करती है और उन दुश्वारियों से आगाह भी करती है जो किसी कलाकार को मुकाम तक पहुंचने के टेढ़े मेड़े रस्तों में झेलनी होती हैं।
यह कालिदास के उज्जयिनी जाने और राजकवि होने की कथा नहीं है। यह उससे भी पहले की कथा है।
यह कालिदास के कालिदास बनने की कथा है। मुफलिसी, तंगदस्ती, गलाजत, अपमान, जिद और जुनून की कथा। यह उस मेटल की कथा है जो किसी को कालिदास तो किसी को तड़ीपार की राह दिखाता है। यह कथा है सज्जन की।
उस कलाकार की जो ' पृथ्वी थियेटर' की जरूरत बना रहा, जिसे पृथ्वीराज कपूर ने खोजा था और जिसने हिंदी सिनेमा की लगभग दो सौ फिल्मों में काम किया।
किसी की स्क्रिप्ट लिखी, किसी में गीत लिखे, किसीमें ऐक्टिंग की, किसी में लड़की का रोल निभाया तो किसी स्क्रिप्ट को नुक्कड़ नाटक में ढाला जो बाद में फिल्म की शक्ल में सामने आयी।
यह उस सज्जन की कथा है जिसने औसत भारतीय समाज को दिया बहुत बहुत कुछ लेकिन लिया बहुत बहुत कम।
बीसवीं सदी की आठवीं दहाई के उत्तरार्द्ध में जो बच्चे हुआ करते थे और जो अब बच्चों के पिता हैं और जो उस वक्त हिन्दी टीवी सीरियलों की दुनिया को समझ बूझ रहे थे, उनके जेह्न में आज भी वह बेताल (विक्रम और बेताल, 1985) तारी है जिसे विक्रमादित्य कभी संतुष्ट नहीं कर पाये और जिनका हर जवाब उसे फुर्र होने का मौका दे देता था।
यह वाचिक और बौद्धिक चंचलता के खिलाफ चुप्पी का बिगुल था। रामानंद सागर ने यह टेली सीरियल बनाया था। इसका दूसरा संस्करण 1995-96 में बना लेकिन उसे वह मकबूलियत नहीं मिली।
जोधपुर के एक सामान्य परिवार में 1921 में जन्मे सज्जन लाल पुरोहित का रुझान थियेटर की ओर तब हुआ जब वह कलकत्ता में कानून की पढ़ाई कर रहे थे।
जब शहर थरथरा रहा था कि क्या पता कब कोई एटम बम गिरे और लोग जमींदोज हो जाएं। यह द्वितीय विश्वयुद्ध का दौर था।
तबाही और भय और भुखमरी और अहर्निश चुप्पी का। उन्होंने उस चुप्पी को ढाला थियेटर में और निर्भय हो कर नाटकों में ऐक्टिंग का रुख किया। मकसद था यह बताना कि आवाज पर पहरा नहीं लगाया जा सकता, चाहे सामने तोप ही क्यों न हो।
गुलाम भारत में सुदूर कलकत्ता से जोधपुर का यह पहला सृजनात्मक हिन्दी हांका था। 1940 की दहाई में वह बंबई आये और हिन्दी फिल्म 'मौसम' से फिल्मी सफर का आगाज किया लेकिन थियेटर हमेशा उनकी पहली मोहब्बत रहा।
यह वह दौर था जब बंबई में मायानगरी के पास आज की तरह न तो लेखकों की पलटन थी और न कलाकारों की रेलमपेल।
'एक बुलाये सौ धाये' जैसा भी कुछ नहीं था उन दिनों। ऐक्टर बनाने वाले स्कूलों का तो दूर दूर तक नाम पता नहीं था।
जो एकल सरमाया था सज्जन के पास, वह थियेटर का ही सरमाया था। आप कह सकते हैं कि सिनेमा में भी वह थियेटर ही जीते रहे उम्र भर। लेकिन जिन लोगों ने 'काबुली वाला' या' बीस साल बाद' या 'जॉनी मेरा नाम' जैसी फिल्में देखी हैं, वे सज्जन को भूल नहीं सकते।
'बीस साल बाद' का जासूस तो भुलाये ही नहीं भूलता। रोल चाहे हीरो का हो, चाहे करेक्टर आर्टिस्ट का, किसी भी फिल्म में यह कलाकार आपको मायूस नहीं करेगा।
राजेंद्र बोड़ा ने ऐसे कलाकार को उसके घर-आंगन से पकड़ा है, उसकी चिट्ठियों से पकड़ा है, उसके मान- अपमान, उसकी पीड़ा, उसकी कचोट, उसके बिखराव, उसके सपनों, उसके आह्लाद के साथ पकड़ा है।
किताब में उनकी बेटी के वे तमाम बयान हैं और निर्भीक बयान हैं जो कोई बेटी अपने पिता के बारे में दे सकती है-बिना इस बात की चिंता किये कि कल को जवाब भी देना पड़ सकता है। किसी डोजियर का।
सज्जन का बंबई का फार्म हाउस, तिनका- तिनका जोड़ कर उसे बनाना, उनकी आंखों के सामने उसका बिकना, वहां की हरियाली का सर्वनाश, वहां गगनचुंबी इमारत की तामीर... पारिवारिक कलह, सज्जन का मौन, बीमारी और फिर इस दुनिया से उनकी रुखसती। सब कुछ है इस किताब में और बहुत प्रामाणिकता के साथ है।