जयपुर | गुलाबी नगरी जयपुर में एशियाई विकास बैंक (ADB) की दो दिवसीय विशेष ओरिएंटेशन कार्यशाला का सफल आयोजन हुआ। यह कार्यशाला मुख्य रूप से 'एनवायरमेंटल एण्ड सोशल फ्रेमवर्क' (ESF) पर केंद्रित रही। इसका मुख्य उद्देश्य विकास परियोजनाओं में सामाजिक और पर्यावरणीय सुरक्षा को प्राथमिकता देना था। इसमें विभिन्न सरकारी विभागों और स्टेकहोल्डर्स ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की।
सुरक्षा मानकों पर गहन मंथन
एडीबी के विशेषज्ञों ने कार्यशाला के दौरान बताया कि किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण का ध्यान रखना कितना जरूरी है। उन्होंने सामाजिक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करने के व्यावहारिक तरीकों पर विस्तार से प्रजेंटेशन दिए। कार्यशाला में दस्तावेज़ीकरण, अनुक्रमण और ईएसएफ के तहत अनुपालन से जुड़े तकनीकी पहलुओं को बारीकी से समझाया गया। प्रतिभागियों ने अपनी केस स्टडी के जरिए फील्ड में आने वाली चुनौतियों और अपने अनुभवों को सबके साथ साझा किया।
खरीद प्रक्रिया और जोखिम प्रबंधन
प्रोक्योरमेंट और फाइनेंशियल मैनेजमेंट पर भी एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व स्टेफान बेस्सादी और सुश्री अनीता ने किया। इसमें गुणवत्ता आधारित बोली मूल्यांकन (MPC) के महत्व को रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि जोखिम मूल्यांकन को खरीद प्रक्रिया का हिस्सा बनाना क्यों आवश्यक है। इससे परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है। अनुबंध प्रवर्तन और प्रभावी डीब्रिफिंग के महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विस्तार से बात की गई।
इन विभागों की रही सक्रिय भागीदारी
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में स्थानीय निकाय, वन विभाग और पीएचईडी के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। साथ ही जेएमआरसी और डीएमआरसी के प्रतिनिधियों ने भी इसमें भाग लेकर तकनीकी जानकारी प्राप्त की। एडीबी की ओर से भावेश कुमार, मोहम्मद जावेद, सुश्री अक्षिता शर्मा और सुरेश गुप्ता जैसे विशेषज्ञों ने मार्गदर्शन दिया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और अनुकूलन के महत्व पर भी प्रकाश डाला। गोविंद सिंह राठौड़ ने पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों पर विशेषज्ञों के साथ संवाद किया।
सतत विकास को मिलेगी नई दिशा
यह कार्यशाला राजस्थान में संस्थागत क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुई है। इससे राज्य में सतत और जवाबदेह आधारभूत विकास को काफी बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजनों से सरकारी विभागों की कार्यक्षमता में सुधार होता है। अंत में, प्रतिभागियों ने सकारात्मक फीडबैक साझा किया। ऐसी कार्यशालाएं भविष्य की परियोजनाओं को अधिक जन-हितैषी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मील का पत्थर साबित होती हैं।