जोधपुर | अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), जोधपुर और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू), जोधपुर ने चिकित्सा और विधि के क्षेत्र में समन्वय की एक नई मिसाल पेश की है। दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों ने मिलकर “विधि और चिकित्सा पर एक दिवसीय हितधारक परामर्श एवं पैनल चर्चा” का सफल आयोजन किया। इसका उद्देश्य चिकित्सा अनुसंधान के विधिक पहलुओं को सुदृढ़ करना था। कार्यक्रम का मुख्य विषय “चिकित्सा विज्ञान एवं अनुसंधान के विधिक विनियमन पर अंतर्विषयक संवाद को सुदृढ़ करना” रखा गया था। इसमें देश के जाने-माने विशेषज्ञों ने भविष्य की स्वास्थ्य प्रणाली पर मंथन किया।
उद्घाटन और भविष्य का विजन
उद्घाटन सत्र में एनएलयू जोधपुर की कुलगुरु प्रो. (डॉ.) हरप्रीत कौर और एम्स जोधपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ. गोवर्धन दत्त पुरी ने संयुक्त रूप से संबोधित किया। डॉ. पुरी ने कहा कि बदलते समय में स्वास्थ्य सेवाओं, चिकित्सा तकनीक और अनुसंधान के क्षेत्र में विधि एवं चिकित्सा के बीच बेहतर समन्वय अत्यंत आवश्यक हो गया है। प्रो. हरप्रीत कौर ने बताया कि सुरक्षित, पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने के लिए दोनों क्षेत्रों का साथ आना एक महत्वपूर्ण पहल है।
न्यायिक दृष्टिकोण और पेटेंट कानून
राजस्थान उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश श्री विनीत कुमार माथुर ने पेटेंट प्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला। उन्होंने जनस्वास्थ्य और एकाधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता बताई। न्यायमूर्ति माथुर ने नोवार्टिस जैसे ऐतिहासिक मामलों का उदाहरण देते हुए एंटी-एवरग्रीनिंग प्रावधानों के महत्व को समझाया। उन्होंने नवाचार को प्रोत्साहित करने वाले कानूनी ढांचे पर जोर दिया।
तकनीकी सत्र: मेड-टेक और आईपीआर
कार्यक्रम का पहला सत्र “मेड-टेक रेगुलेशन्स” पर केंद्रित था। इसमें चिकित्सा उपकरणों के नियमन, रोगी सुरक्षा और कानूनी अनुपालन व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की गई। दूसरे सत्र में “चिकित्सा एवं बौद्धिक संपदा अधिकार” (IPR) पर विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने नवाचार, पेटेंट और सार्वजनिक स्वास्थ्य के व्यावसायीकरण के विभिन्न पहलुओं को बारीकी से समझाया।
इच्छामृत्यु पर गंभीर पैनल चर्चा
कार्यक्रम का सबसे चर्चित हिस्सा इच्छामृत्यु (Euthanasia) पर आयोजित पैनल चर्चा रही। इसमें न्यूरोलॉजी, मनोरोग और फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ कानूनी विद्वानों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा हरीश राणा मामले में दिए गए हालिया आदेश पर चर्चा की। इसमें मरीज की स्वायत्तता और कानूनी सुरक्षा को प्रमुख माना गया। पैनल ने इच्छामृत्यु से जुड़े नैतिक प्रश्नों और विकसित हो रहे न्यायिक दृष्टिकोण पर गहन संवाद किया। प्रो. संहिता पांडा और डॉ. रंजीत थॉमस ने इस पर विस्तृत प्रकाश डाला।
विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम में डीसीजीआई डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी और एम्स की डीन अकादमिक डॉ. पंकजा रवि राघव सहित कई गणमान्य हस्तियां उपस्थित रहीं और अपने विचार व्यक्त किए। चिकित्सा अधीक्षक प्रो. अभिषेक भारद्वाज और एनएलयू की रजिस्ट्रार डॉ. सुनीता पंकज ने भी इस अंतर्विषयी संवाद को भविष्य की नीतियों के लिए मील का पत्थर बताया।
आयोजन की सफलता के सूत्रधार
कार्यक्रम के सफल आयोजन में एम्स के डॉ. अनुभव गुप्ता और एनएलयू की डॉ. कनिका ढींगरा ने मुख्य भूमिका निभाई। उनकी टीम ने इस जटिल विषय को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया। सहायक भूमिका में मुकेश कुमार गुडेसर, महावीर प्रसाद वैष्णव, संजय जोशी और भवानी चारण सहित अन्य सदस्यों का विशेष योगदान रहा, जिससे यह संवाद सार्थक रहा। समापन सत्र में चिकित्सा संस्थानों, विधि शिक्षण संस्थानों और नियामक संस्थाओं के बीच भविष्य में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया ताकि शोध और नीति निर्माण को गति मिल सके।