लोंगडिंग | अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग जिले में बसी वांचो जनजाति अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी सहेजे हुए है। इस जनजाति की जीवनशैली और रस्में किसी को भी हैरान कर सकती हैं।
यहां के घरों में रसोई की छत से मांस के टुकड़े लटकते मिलना आम बात है। इसे सुखाकर जरूरत पड़ने पर पकाया जाता है। वांचो समाज में हर बस्ती का अपना एक राजा होता है।
इन सभी बस्तियों के राजा मिलकर एक मुख्य मुखिया यानी चीफ का चुनाव करते हैं। यही चीफ जनजाति से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेता है। इनकी वेशभूषा भी काफी अलग और डरावनी हो सकती है।
पुरुष अक्सर गले में बंदर की खोपड़ी या जानवरों के दांतों से बनी माला पहनते हैं। उनके सिर पर भालू के बालों से बनी टोपी होती है, जिसे 'खोहम' कहा जाता है।
टैटू से पता चलती है उम्र
वांचो महिलाओं के शरीर पर बने टैटू केवल सजावट नहीं हैं। ये उनकी पहचान और उम्र का पैमाना होते हैं। किशोरावस्था में नाभि के पास टैटू बनाया जाता है।
जब लड़की रजस्वला होती है, तो उसके पैरों के निचले हिस्से पर टैटू गुदवाया जाता है। जांघों पर टैटू का मतलब है कि लड़की अब अपना जीवनसाथी चुनने के लिए तैयार है।
शादीशुदा महिलाओं की पहचान उनकी छाती पर बने टैटू से होती है। ये टैटू समाज में उनके दर्जे और जीवन के पड़ाव को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
प्रेम विवाह और अनोखा प्रस्ताव
इस जनजाति में ज्यादातर प्रेम विवाह ही होते हैं। जब किसी लड़की को कोई लड़का पसंद आता है, तो वह उसे 'माएपो' नाम का एक झुमका उपहार में देती है।
यही झुमका विवाह का औपचारिक प्रस्ताव माना जाता है। इसके बाद लड़के वाले लड़की के घर जाकर पान, तंबाकू और विशेष पेड़ की छाल भेंट करते हैं।
रिश्ता तय होने पर लड़का और लड़की एक-दूसरे को माला पहनाते हैं। इस रस्म को 'हिंगहो एलाई' कहा जाता है। इसके बाद मेहमाननवाजी का दौर शुरू होता है।
जिप्सम नाइलो: संबंध बनाने की आजादी
रिश्ता तय होने के बाद 'टोईकट' की परंपरा निभाई जाती है। इसमें लड़का अपनी होने वाली पत्नी और उसकी सहेलियों को अपने खेत दिखाने ले जाता है। वहां नाच-गाना भी होता है।
वांचो समाज में लड़का-लड़की को शादी से पहले मिलने की पूरी आजादी है। वे बस्ती के कम्युनिटी हॉल 'जिप्सम नाइलो' में जाकर शारीरिक संबंध भी बना सकते हैं।
यह परंपरा समाज द्वारा स्वीकृत है। यहां कपल्स को एक-दूसरे को समझने का पूरा मौका दिया जाता है। इसके बाद ही शादी की अगली रस्में पूरी की जाती हैं।
प्रेग्नेंसी के बाद मिलती है बहू की पहचान
जब लड़की गर्भवती हो जाती है, तो उसे ससुराल में प्रवेश मिलता है। गर्भावस्था के तीसरे महीने में 'खोकम' नाम की एक विशेष रस्म आयोजित की जाती है।
इस दौरान लड़की की छाती पर 'खाहू' नाम का टैटू बनाया जाता है। पुजारी पूजा करता है और घोषणा करता है कि अब यह लड़की परिवार का हिस्सा है।
इस रस्म के बाद पूरे गांव में मांस बांटा जाता है। एक बार खोकम की रस्म हो जाने के बाद रिश्ते को तोड़ना बहुत मुश्किल और खर्चीला हो जाता है।
विरासत और शिकार की परंपरा
वांचो समाज में संपत्ति का बंटवारा भी अनोखा है। मां के गहनों पर केवल सबसे बड़ी बेटी का अधिकार होता है। जमीन-जायदाद सबसे बड़े बेटे को मिलती है।
बाकी बच्चों को आमतौर पर कुछ नहीं दिया जाता। बच्चे के जन्म पर नाल काटने के लिए बांस के चाकू और लकड़ी की तलवार का इस्तेमाल किया जाता है।
आज भी यहां शिकार की परंपरा जीवित है। शिकार के बाद जानवर का सिर राजा को भेंट किया जाता है और बाकी मांस पूरी बस्ती में बांट दिया जाता है।
आत्माओं और बलि में विश्वास
ये लोग आत्माओं पर गहरा विश्वास रखते हैं। किसी भी परेशानी के हल के लिए पुजारी की सलाह ली जाती है। पुजारी सपना देखकर समस्या का कारण बताता है।
समस्या दूर करने के लिए कुत्ता, बकरी या मुर्गे की बलि दी जाती है। वांचो लोग धान और कई तरह के मिलेट जैसे मीखा और कामई की खेती करते हैं।
हालांकि अब बदलाव आ रहा है। गांव में प्राइमरी स्कूल हैं और युवा सरकारी नौकरियों और सेना में शामिल होकर देश की सेवा कर रहे हैं।