जयपुर | भारतीय संगीत आकाश का एक चमकता सितारा आज हमेशा के लिए ओझल हो गया। सुरों की मलिका और करोड़ों दिलों की धड़कन आशा भोसले (आशा ताई) अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन की खबर सुनते ही देश-विदेश में उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई है।
आशा भोसले का निधन, संगीत जगत स्तब्ध: सुरों की रानी आशा भोसले ने दुनिया को कहा अलविदा: उमराव जान को दी नई पहचान, जयपुर के संगीत प्रेमियों से था गहरा लगाव
भारतीय संगीत की अनमोल रत्न आशा भोसले का निधन हो गया है। उन्होंने न केवल उमराव जान जैसी फिल्मों को अमर बनाया, बल्कि शास्त्रीय संगीत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
HIGHLIGHTS
- आशा भोसले ने अपनी मखमली आवाज से 'उमराव जान' की गजलों को पूरी दुनिया में अमर कर दिया।
- जयपुर के संगीत प्रेमियों की समझ की वे हमेशा मुरीद रहीं और शहर से उनका गहरा जुड़ाव था।
- शास्त्रीय संगीत में उनकी पकड़ का अंदाजा फिल्म 'सूरज' के उनके कठिन गीतों से लगाया जा सकता है।
- 80 वर्षों के लंबे करियर में उन्होंने हिंदी, उर्दू, मराठी और पंजाबी समेत कई भाषाओं में गायन किया।
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उमराव जान को दी नई जिंदगी
आशाजी के जाने से जेहन में सबसे पहला ख्याल 'उमराव जान' का आता है। अगर वह नहीं होतीं, तो शायद आज की पीढ़ी पूर्व सदी की मशहूर शायरा और नर्तकी उमराव जान को इस रूप में नहीं जान पाती। फिल्म 'उमराव जान' में संगीतकार खय्याम साहब ने उनके निर्देशन में कई गजलें गवाईं। 'दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए' को उन्होंने जिस अंदाज में पेश किया, उसने उमराव जान के किरदार में जान फूंक दी थी। उनकी आवाज की खनक और नजाकत ने इस गजल को कालजयी बना दिया। ऐसा महसूस होता था मानो उमराव जान स्वयं पर्दे पर दोबारा जीवित हो उठी हों। खुद विदा होकर भी वह अपनी आवाज के जरिए उमराव जान को हमेशा के लिए अमर कर गईं।
शास्त्रीय संगीत में अद्भुत दखल
आशा भोसले न केवल एक पार्श्व गायिका थीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत पर भी उनकी जबरदस्त पकड़ थी। संगीत के जानकार अक्सर फिल्म 'सूरज' के उनके एक गाने का जिक्र करते हैं। इस फिल्म के गाने 'कैसे समझाऊं बड़े ना समझ हो' में 'झा' शब्द पर सम पर आना कोई आसान काम नहीं था। यह केवल एक मंझा हुआ शास्त्रीय संगीतज्ञ ही कर सकता था। आशाजी ने इस कठिन मुखड़े को इतनी सहजता से गाया कि बड़े-बड़े दिग्गज हैरान रह गए। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे सुगम संगीत के साथ-साथ शास्त्रीय विधा में भी उतनी ही निपुण हैं।
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जयपुर से रहा अटूट रिश्ता
गुलाबी नगरी जयपुर के प्रति आशाजी का प्रेम किसी से छिपा नहीं था। वे अक्सर कहती थीं कि जयपुर के श्रोता संगीत को सिर्फ सुनते नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझते भी हैं। यही कारण था कि जयपुर में होने वाले उनके कार्यक्रमों में दर्शकों के साथ उनका एक अनोखा और भावनात्मक रिश्ता बन जाता था। यहां के संगीत प्रेमी उन्हें सुनने के लिए घंटों इंतजार करते थे।
राशिद खान के साथ वो यादगार शाम
जयपुर से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा साल 2019 का है। कूकस के एक सितारा होटल में 'इंडियन म्यूजिक समिट' का आयोजन किया गया था। वहां एक शाम आशा भोसले ने उस्ताद राशिद खान का गायन सुना। उस्ताद की गूंजती आवाज और राग की गहराई ने उस शाम को जादुई बना दिया था। आशाजी खुद उस प्रस्तुति में इस कदर डूब गईं कि वे बार-बार 'वाह' और 'क्या बात है' कहकर दाद दे रही थीं। उन्होंने बाद में कहा था कि राशिद खान की गायकी रूह को छू लेने वाला अनुभव है। यह उनकी महानता थी कि वे खुद इतनी बड़ी कलाकार होकर भी दूसरे कलाकारों का दिल खोलकर सम्मान करती थीं।
वर्सटाइल गायन की अनूठी मिसाल
अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तरह ही आशाजी एक वर्सटाइल सिंगर थीं। उन्होंने रोमांस से भरे गीतों को अपनी सुरीली आवाज में पिरोया तो वहीं भजनों में भी भक्ति का रंग भरा। 'मेरे रोम-रोम में बसने वाले राम' जैसे भजनों को उन्होंने जिस भाव से गाया, वह सीधे सुनने वालों के दिल में उतर जाता था। उन्होंने हर तरह के मूड और शैली में खुद को बखूबी ढाला।
कव्वाली और गजल में भी दिखाया कमाल
सिने जगत में आशा ताई ने केवल गीतों तक खुद को सीमित नहीं रखा। फिल्म 'बरसात की रात' में उनकी कव्वाली 'ना तो कारवां की तलाश है' आज भी लोगों की जुबान पर रहती है। इसके अलावा उन्होंने गजल के शहंशाह मेहदी हसन के सामने भी अपनी गायकी का लोहा मनवाया था। भारत में ही उन्होंने मेहदी हसन को अपना गाना सुनाकर उनसे खूब दाद और तारीफ बटोरी थी।
भाषाओं पर रहा जबरदस्त नियंत्रण
मराठी परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद आशाजी ने उर्दू, पंजाबी और हिंदी भाषाओं पर अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने इन भाषाओं के उच्चारण और सुरों का कड़ा रियाज किया था। उनके एकल गीत जैसे 'आओ हुजूर तुमको बहारों में ले चलूं' और 'पान खाए सैंया हमार' उनकी आवाज की विविधता को दर्शाते हैं। उन्होंने मोहम्मद रफी, मन्ना डे और किशोर कुमार के साथ कई सदाबहार युगल गीत गाए।
नई पीढ़ी के लिए संदेश
दीनानाथ मंगेशकर के संगीत परिवार की इस विलक्षण प्रतिभा ने लगभग 80 साल तक संगीत की सेवा की। इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी वे हमेशा सीखने में विश्वास रखती थीं। वे अक्सर युवा पीढ़ी को सलाह देती थीं कि वे रियाज जरूर करें। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखें कि उनका रियाज सही दिशा में हो रहा है या नहीं, क्योंकि सही तकनीक ही सफलता की कुंजी है।
कभी नहीं भरेगा प्रशंसकों का दिल
साहिर लुधियानवी का लिखा वह गीत 'अभी ना जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं' आज उनके प्रशंसकों की स्थिति को बयां करता है। देश-दुनिया के उनके करोड़ों चाहने वाले उन्हें और सुनना चाहते थे। आशा भोसले का जाना संगीत के एक अध्याय का अंत है, लेकिन उनकी आवाज हमेशा फिजाओं में गूंजती रहेगी। सुरों की इस रानी को पूरा देश आज नम आंखों से नमन कर रहा है।
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