जयपुर | राजस्थान में सरकारी भुगतान प्रणाली के ठप होने से उपजे गंभीर संकट पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का ध्यान आकर्षित करने के लिए एक 'अति आवश्यक' पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने राज्य में व्याप्त वित्तीय अव्यवस्था को उजागर किया है।
गहलोत ने क्यों लिखा 'अति आवश्यक' पत्र?
अशोक गहलोत ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि यह समस्या किसी एक विभाग या योजना तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक संकट है जो समाज के लगभग हर वर्ग को प्रभावित कर रहा है।
कर्मचारियों, पेंशनभोगियों, दुर्घटना पीड़ितों के परिवारों, अस्पतालों, दवा विक्रेताओं और छोटे ठेकेदारों को अपने जायज भुगतान के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। गहलोत ने इसे राज्य के इतिहास में वित्तीय कुप्रबंधन का सबसे खराब दौर बताया है।
आम आदमी पर सीधा असर
यह संकट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह लाखों परिवारों की आजीविका और सम्मान से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। जब सरकार अपने ही कर्मचारियों और सेवा प्रदाताओं का भरोसा खो देती है, तो पूरी व्यवस्था की नींव हिल जाती है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे इस मामले की गंभीरता को समझें और प्रदेश की जनता को इस अनावश्यक संकट से उबारने के लिए तत्काल कदम उठाएं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे बड़ी मार
इस वित्तीय संकट का सबसे बुरा असर राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा है। राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) के तहत निजी अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और दवा की दुकानों का करोड़ों रुपये का भुगतान महीनों से लंबित है।
स्थिति इतनी विकट हो गई है कि कई अस्पतालों ने RGHS के तहत कैशलेस सेवाएं सीमित करने या सरकार के साथ हुए एमओयू को समाप्त करने की चेतावनी दे दी है।
कैशलेस योजना में जेब से भुगतान
इसका सीधा नतीजा यह हो रहा है कि कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को कैशलेस इलाज के वादे के बावजूद अपनी जेब से पैसे देने पड़ रहे हैं। उन्हें इस उम्मीद पर भुगतान करना पड़ रहा है कि सरकार से पैसा आने पर अस्पताल उन्हें वापस कर देगा।
गहलोत ने मांग की है कि राज्य सरकार को ऐसे मामलों में लिखित गारंटी देकर अस्पतालों को भुगतान के लिए पाबंद करना चाहिए ताकि मरीजों पर बोझ न पड़े।
चिरंजीवी योजना के लाभार्थी भी परेशान
मुख्यमंत्री चिरंजीवी/आयुष्मान दुर्घटना बीमा योजना के तहत भी हालात अच्छे नहीं हैं। इस योजना में दुर्घटना में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार को पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है।
जानकारी के अनुसार, सैकड़ों मामलों में दावे स्वीकृत होने के बावजूद पीड़ित परिवारों को महीनों से भुगतान नहीं मिला है। यह उन परिवारों के प्रति घोर असंवेदनशीलता है जिन्होंने अपना कमाने वाला सदस्य खो दिया है।
गहलोत ने अपने पत्र में लिखा, "प्रदेश के इतिहास में वित्तीय कुप्रबंधन का ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा गया।"
कर्मचारियों और पेंशनभोगियों का दर्द
राज्य के सेवानिवृत्त कर्मचारी भी इस कुप्रबंधन का शिकार हो रहे हैं। जीपीएफ, समूह बीमा, ग्रेच्युटी और अर्जित अवकाश (पीएल) जैसी राशियां, जो उनकी जीवन भर की जमा पूंजी हैं, रिटायरमेंट के कई महीनों बाद भी नहीं मिल रही हैं।
यह पैसा उनका हक है, कोई सरकारी खैरात नहीं। इस देरी से उन्हें अपने भविष्य की योजनाओं और जरूरतों को पूरा करने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी अटकी
इसके अलावा, राज्य के कई जिलों में सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी महीनों से लंबित है। इससे वृद्ध, विधवा और दिव्यांग पेंशनभोगी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जिनके लिए यह पेंशन राशि ही जीवनयापन का एकमात्र सहारा होती है।
विकास कार्यों पर लगा ब्रेक, ठेकेदार परेशान
ट्रेजरी से बिल पास होने के बावजूद भुगतान न होने का संकट पिछले कई महीनों से बना हुआ है। इसका सीधा असर सड़क, पेयजल और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर पड़ रहा है, जिससे विकास कार्य ठप हो गए हैं।
हालात इतने खराब हो चुके हैं कि छोटे-छोटे ठेकेदारों को अपना पैसा पाने के लिए अखबारों में विज्ञापन देकर सरकार का ध्यान खींचना पड़ रहा है। यह सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
हजारों की आजीविका खतरे में
इस भुगतान संकट के कारण हजारों श्रमिकों और छोटे उद्यमियों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। जब ठेकेदारों को भुगतान नहीं मिलेगा, तो वे अपने मजदूरों और आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान कैसे करेंगे? यह एक दुष्चक्र बन गया है।
मानवाधिकार आयोग ने भी लिया संज्ञान
भुगतान संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य मानवाधिकार आयोग को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना पड़ा। आयोग ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है, जो सरकार के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी की बात है।
यह दर्शाता है कि स्थिति जमीनी स्तर पर कितनी गंभीर है और सरकार की उदासीनता किस हद तक बढ़ चुकी है।
गहलोत की मुख्यमंत्री से अपील
अपने पत्र के अंत में, अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से उम्मीद जताई है कि वे इस विषय की गंभीरता को समझेंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है।
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे समय रहते आवश्यक निर्णय लें, ताकि प्रदेश के लाखों परिवारों को इस अनावश्यक संकट से राहत मिल सके और सरकार पर लोगों का भरोसा फिर से कायम हो सके।
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