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भीम ऐप क्यों हुआ फेल?: हजारों करोड़ खर्च, फिर भी BHIM ऐप 1% हिस्सेदारी को तरसा

जोगेन्द्र सिंह शेखावत · 17 सितम्बर 2026, 11:37 दोपहर
सरकारी प्रयासों और भारी निवेश के बावजूद, भारत का अपना भीम ऐप UPI बाजार में फोनपे और गूगलपे जैसे विदेशी दिग्गजों से बहुत पीछे है, जिसकी हिस्सेदारी 1% से भी कम है।

विदेशी ऐप्स का दबदबा, देसी BHIM ऐप क्यों पिछड़ा?

यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के जरिए पैसों का लेन-देन अब आम हो गया है। लेकिन इस विशाल बाजार में देसी ऐप्स की मौजूदगी न के बराबर है, खासकर सरकारी ऐप की।

यह एक बड़ा सवाल है कि सरकार के भारी प्रयासों के बावजूद, भीम (BHIM) ऐप के बाद आए विदेशी ऐप्स ने कैसे तीन-चौथाई बाजार पर कब्जा कर लिया?

बाजार पर किसका कितना कब्जा?

एनसीपीआई (NCPI) के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में यूपीआई के जरिए हुए कुल लेन-देन में से लगभग 80% हिस्सेदारी सिर्फ दो विदेशी ऐप्स - फोनपे और गूगलपे की थी।

फोनपे (वालमार्ट) और गूगलपे (अल्फाबेट) ने भारतीय डिजिटल भुगतान बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि पेटीएम जैसे निजी देसी ऐप भी सरकारी भीम ऐप से कहीं आगे हैं।

हजारों करोड़ की सरकारी मदद भी बेअसर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 दिसंबर, 2016 को भारत इंटरफेस फॉर मनी (BHIM) ऐप लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना था।

लेकिन दस साल बाद भी यह ऐप संख्या और रकम दोनों के मामले में एक फीसदी हिस्सेदारी भी हासिल नहीं कर पाया है।

सरकारी प्रोत्साहन योजनाएं

मोदी सरकार ने भीम-यूपीआई को मजबूत करने के लिए लगातार इंसेंटिव स्कीमें चलाई हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में इसके लिए 1500 करोड़ रुपये की योजना शुरू की गई।

इससे पहले के तीन वर्षों में सरकार करीब 7230 करोड़ रुपये का इंसेंटिव दे चुकी थी। इसके बावजूद, भीम ऐप बाजार में अपनी जगह बनाने में असफल रहा है।

यह स्थिति सर्विस सेक्टर में सरकारी कंपनियों की विफलता पर फिर से सवाल खड़े करती है, जैसे कि बीएसएनएल-एमटीएनएल का निजी कंपनी जियो के सामने पिछड़ जाना।

UPI ट्रांजैक्शन पर फिर से चार्ज

यूपीआई से भुगतान पर चार्ज को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है। 15 अक्टूबर, 2026 से 2000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट भुगतान पर 0.4% का चार्ज लगाया जाएगा।

यह चार्ज ग्राहक से नहीं, बल्कि मर्चेंट से वसूला जाएगा। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इसे 'यूपीआई टैक्स' कहकर इसका विरोध किया है।

चार्ज क्यों जरूरी है?

चार्ज लगाने के पक्षधरों का कहना है कि डिजिटल पेमेंट के बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निवेश जरूरी है। इस चार्ज से मिलने वाली रकम से इस जरूरत को पूरा करने में मदद मिलेगी।

अनुमान है कि इससे करीब 160-170 अरब रुपये की वसूली होगी, जिसका 60% बैंकों को, 25% ऐप्स को और 15% एग्रीगेटर्स को मिलेगा।

यह पहली बार नहीं है जब यूपीआई पर चार्ज लगा है। 2016 में 0.3% चार्ज था, जिसे बाद में हटा दिया गया था। क्रेडिट और डेबिट कार्ड पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) पहले से ही लागू है।

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