बिहार में शराबबंदी लागू हुए करीब एक दशक बीत चुका है। राज्य के सामने अब नशे के कारोबार की एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है।
बढ़ते ड्रग्स कारोबार के आंकड़े
शराब की तस्करी के खिलाफ कार्रवाई के बीच गांजा, हेरोइन और नशीली गोलियों का नेटवर्क फैल रहा है। बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती पांच महीनों में NDPS एक्ट के तहत 1,905 मामले दर्ज हुए हैं।
इस दौरान 9.29 लाख नशीली गोलियां जब्त की गई हैं। नशामुक्ति केंद्रों में इलाज कराने वालों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
तस्करी के बदलते तरीके
पुलिस मुख्यालय के अनुसार, जब्त किए जाने वाले गांजे और प्रतिबंधित गोलियों की मात्रा में कई गुना इजाफा हुआ है। अवैध शामक दवाइयां और ओपिऑइड दर्द निवारक आसानी से ब्लैक मार्केट में उपलब्ध हैं।
तस्करों ने कानून से बचने के लिए अपने तौर-तरीके बदल लिए हैं। अब बड़ी खेप के बजाय छोटे पैकेट और करियर के माध्यम से नशीले पदार्थों को जिलों में पहुंचाया जा रहा है।
भौगोलिक स्थिति और ट्रांजिट रूट
बिहार की भौगोलिक स्थिति इसे तस्करों के लिए आसान ट्रांजिट रूट बनाती है। नेपाल के साथ खुली सीमा और पूर्वोत्तर राज्यों से रेल-सड़क मार्ग जुड़ा होना इसकी मुख्य वजह है।
पूर्वोत्तर से आने वाली हेरोइन, स्मैक और ब्राउन शुगर अब राज्य के विभिन्न जिलों तक पहुंच रही है। जांच में सामने आया है कि इस धंधे में महिलाओं और बच्चों का कूरियर के रूप में इस्तेमाल हो रहा है।
'कोटा' और सिंथेटिक ड्रग्स का खतरा
बिहार में 'कोटा' नाम का एक नया पदार्थ चर्चा में है। यह हेरोइन का एक विशिष्ट रूप है जिसे सिगरेट के साथ इस्तेमाल किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिंथेटिक ड्रग्स शरीर पर बहुत जल्दी बुरा असर डालते हैं। एक बार लत लगने के बाद इससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
युवाओं पर मंडराता संकट
इस स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू किशोरों और युवाओं का इसकी चपेट में आना है। स्कूली छात्रों और सड़क पर रहने वाले बच्चों में इनहेलेंट और कफ सिरप का उपयोग बढ़ा है।
राज्य सरकार ने अपनी नारकोटिक्स विंग और विशेष टास्क फोर्स (STF) का गठन किया है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या से निपटने के लिए सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है।
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