बीकानेर | राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रामीण सेवा शिविर योजना अर्जनसर में महज एक औपचारिकता बनकर रह गई। ग्रामीणों की समस्याओं का मौके पर समाधान करने का उद्देश्य पूरी तरह विफल हो गया, जिससे स्थानीय निवासियों में भारी निराशा और आक्रोश है।
शिविर बना आंकड़ों का खेल
सोमवार को अर्जनसर रेलवे स्टेशन परिसर में आयोजित इस शिविर का हाल बेहाल था।
पूरे दिन की कार्यवाही के बाद नतीजा यह रहा कि मात्र पांच जन्म प्रमाण पत्र, एक मृत्यु प्रमाण पत्र और सात जनाधार अप्रूवल ही हो सके।
अधिकारियों ने इन छोटे-मोटे ऑनलाइन कार्यों को ही अपनी सफलता की कहानी के रूप में पेश करने की कोशिश की, जबकि असल मुद्दे अनसुने रह गए।
सरकारी मंशा और जमीनी हकीकत में अंतर
सरकार की मंशा है कि 22 विभागों से जुड़े 51 तरह के कार्यों का निपटारा इन शिविरों में हो।
इनमें राजस्व से जुड़े खाता विभाजन, नक्शा शुद्धि, और नए रास्तों की मंजूरी जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं।
लेकिन अर्जनसर शिविर में इनमें से एक भी काम सिरे नहीं चढ़ सका। अधिकारियों की उदासीनता के कारण यह शिविर महज खानापूर्ति साबित हुआ।
गंभीर समस्याओं की घोर अनदेखी
ग्रामीणों ने अपनी गंभीर समस्याओं को लेकर शिविर में गुहार लगाई, लेकिन उनकी आवाज अनसुनी कर दी गई।
कस्बे का गौरवपथ बारिश के पानी से लबालब है, जिससे लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया है।
इसके अलावा, वाटर वर्क्स की डिग्गी की दीवार टूटने से बारिश का गंदा पानी सीधे पीने के पानी के स्रोत में जा रहा है, जिससे बीमारी फैलने का खतरा बढ़ गया है।
अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
इन गंभीर शिकायतों के बावजूद, शिविर प्रभारी और लूणकरणसर के उपखंड अधिकारी (एसडीएम) मात्र दस मिनट के लिए ही शिविर में आए।
उन्होंने इन समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया। तहसीलदार भी मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने भी कोई संज्ञान नहीं लिया।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) का तो कोई प्रतिनिधि शिविर में मौजूद ही नहीं था, जो सड़कों की समस्या का समाधान करता।
एक ग्रामीण ने कहा, "हम बड़ी उम्मीद लेकर आए थे कि हमारी वर्षों पुरानी समस्याओं का कुछ हल निकलेगा, लेकिन यहां तो कोई सुनने वाला ही नहीं है। ऐसे शिविरों का क्या फायदा?"
क्या ऐसे शिविरों की कोई उपयोगिता है?
शिविर में वन विभाग ने कुछ पौधे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। कुछ जाति प्रमाण पत्र भी जारी किए गए।
लेकिन जिन मुख्य समस्याओं, जैसे सड़क, रास्तों और सार्वजनिक भूमि के सीमांकन से जुड़े विवादों के लिए ग्रामीण इंतजार कर रहे थे, वे जस के तस बने रहे।
खसरा और नक्शा दुरुस्ती जैसे राजस्व मामलों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई, जो इन शिविरों का एक मुख्य उद्देश्य होता है।
अर्जनसर का यह शिविर अधिकारियों की लापरवाही और सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की पोल खोलता है। यदि ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं होता, तो ऐसे आयोजनों पर जनता का विश्वास उठना स्वाभाविक है। प्रशासन को इन मुद्दों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
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