बीकानेर | नगर निगम महापौर चुनाव में कांग्रेस के स्पष्ट बहुमत के बावजूद मुकाबला रोचक हो गया है। कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी अनिल कल्ला के सामने पार्टी के ही नवनिर्वाचित पार्षद नवरतन डागा ने नामांकन दाखिल कर दिया है। वहीं भाजपा ने डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को अपना प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में फिलहाल महापौर पद के लिए मुकाबला त्रिकोणीय नजर आ रहा है।
कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत
बीकानेर नगर निगम में कुल 80 पार्षद हैं। इनमें कांग्रेस के 42, भाजपा के 27, निर्दलीय 10 और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का एक पार्षद है। बहुमत के लिए 41 पार्षदों का समर्थन आवश्यक है। इस लिहाज से कांग्रेस के पास अपने दम पर महापौर बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है।
हालांकि नवरतन डागा के नामांकन ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने अपने सभी 42 पार्षदों को एकजुट रखने की चुनौती खड़ी कर दी है। यदि कांग्रेस के मतों में विभाजन होता है तो स्पष्ट बहुमत के बावजूद महापौर चुनाव का गणित बदल सकता है।
अनिल कल्ला कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी
वार्ड संख्या 73 से निर्वाचित अनिल कल्ला को कांग्रेस ने महापौर पद के लिए अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया है। अनिल कल्ला पूर्व मंत्री डॉ. बीडी कल्ला के भतीजे हैं। पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण सामान्य परिस्थितियों में उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश अपने सभी पार्षदों को अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में एकजुट रखने की होगी। पार्टी के भीतर मतों का बिखराव रोकना अब उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौती बन गया है।
नवरतन डागा ने बढ़ाई कांग्रेस की चिंता
वार्ड संख्या 50 से निर्वाचित कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने भी महापौर पद के लिए नामांकन दाखिल किया है। उनके नामांकन को कांग्रेस के भीतर असंतोष और महापौर पद की अलग दावेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि डागा चुनाव मैदान में बने रहेंगे या नाम वापसी से पहले पार्टी स्तर पर कोई समझौता होगा, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्हें कांग्रेस अथवा अन्य खेमों के कितने पार्षदों का समर्थन प्राप्त है, इसकी भी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
भाजपा ने डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को उतारा
भाजपा ने महापौर पद के लिए डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को प्रत्याशी बनाया है। नगर निगम में भाजपा के पास 27 पार्षद हैं। संख्या बल के अनुसार भाजपा कांग्रेस से काफी पीछे है, लेकिन कांग्रेस के भीतर संभावित मत विभाजन ने उसके लिए राजनीतिक संभावनाओं का एक रास्ता खोल दिया है।
भाजपा के सामने अपने 27 पार्षदों को एकजुट रखने के साथ कांग्रेस के असंतुष्ट पार्षदों, 10 निर्दलीयों और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के एक पार्षद के समर्थन का समीकरण बनाने की चुनौती है। इन पार्षदों का वास्तविक रुख मतदान के समय ही स्पष्ट होगा।
निर्दलीयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
नगर निगम में निर्वाचित 10 निर्दलीय पार्षद महापौर चुनाव के राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रेस के पास बहुमत होने के कारण उसे सामान्य स्थिति में निर्दलीयों के समर्थन की आवश्यकता नहीं है, लेकिन पार्टी के मतों में विभाजन होने पर निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं।
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के एकमात्र पार्षद का मत भी करीबी मुकाबले की स्थिति में महत्वपूर्ण हो सकता है। फिलहाल निर्दलीय और अन्य पार्षद किस प्रत्याशी का समर्थन करेंगे, इसे लेकर कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।
कांग्रेस में सेंध लगी तो बदल सकता है गणित
कांग्रेस के पास भाजपा से 15 पार्षद अधिक हैं। इसके बावजूद पार्टी के दो प्रत्याशियों के मैदान में आने से क्रॉस वोटिंग और आंतरिक विभाजन की चर्चा शुरू हो गई है। यदि नवरतन डागा नाम वापस नहीं लेते और कांग्रेस के कुछ पार्षद उनके साथ जाते हैं, तो मुकाबला अधिक पेचीदा हो सकता है।
हालांकि केवल नामांकन के आधार पर कांग्रेस में बड़े विभाजन अथवा किसी प्रत्याशी की जीत का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अंतिम समीकरण नाम वापसी, प्रत्याशियों के समर्थन और मतदान के दौरान पार्षदों के वास्तविक रुख के बाद ही सामने आएगा।
21 सितंबर को होगा मतदान
महापौर चुनाव के कार्यक्रम के अनुसार 17 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। उम्मीदवार 18 सितंबर तक अपना नामांकन वापस ले सकेंगे, जबकि 21 सितंबर को मतदान होगा।
नाम वापसी की समय सीमा पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि महापौर पद का मुकाबला वास्तव में त्रिकोणीय रहता है या कांग्रेस के भीतर किसी समझौते के बाद चुनाव की तस्वीर बदल जाती है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या एकजुट रहेंगे 42 पार्षद?
फिलहाल बीकानेर महापौर चुनाव का सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस के 42 पार्षदों की एकजुटता को लेकर है। यदि सभी कांग्रेस पार्षद पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी अनिल कल्ला के साथ रहते हैं, तो कांग्रेस की जीत का रास्ता आसान दिखाई देता है। लेकिन पार्टी के मतों में सेंध लगने पर भाजपा और दूसरे प्रत्याशी के लिए संभावनाएं बन सकती हैं।
अब सभी की निगाहें नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापसी और निर्दलीय पार्षदों के रुख पर टिकी हैं। इन्हीं घटनाक्रमों से तय होगा कि बीकानेर की महापौर की कुर्सी पर बहुमत का अंकगणित भारी पड़ता है या अंदरूनी राजनीति कोई अप्रत्याशित परिणाम देती है।