बीकानेर | 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक और अदम्य साहस के प्रतीक ब्रिगेडियर जगमाल सिंह राठौड़ का मंगलवार को निधन हो गया।
वे 87 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे, उन्होंने बीकानेर स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली।
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह ने 1971 के युद्ध में वह कर दिखाया था, जिसकी कल्पना आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।
उन्होंने पाकिस्तानी सीमा के भीतर 16 किलोमीटर तक घुसकर रानीहल चेकपोस्ट पर तिरंगा फहराया था।
रेगिस्तान के रण में शौर्य की गाथा
उनकी इस वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1972 में 'वीर चक्र' से सम्मानित किया था।
वे न केवल एक उत्कृष्ट सैनिक थे, बल्कि ओलंपिक शूटर और वर्तमान कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के ताऊजी भी थे।
उनकी बेटी कविता राठौड़ ने बताया कि वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक काफी सक्रिय और अनुशासित बने रहे।
वे सादुलगंज क्षेत्र में रहते थे और उनका अंतिम संस्कार बुधवार को राजपूत शांति धाम में किया जाएगा।
ऊंटों पर सवार होकर दुश्मन को ललकारा
1971 के उस दौर में जब सैन्य संसाधन आज की तरह आधुनिक नहीं थे, उन्होंने अद्भुत रणनीतिक कौशल दिखाया था।
जैसलमेर और बीकानेर के दुर्गम रेगिस्तानी इलाकों में उन्होंने ऊंटों की मदद से अपनी बटालियन को आगे बढ़ाया था।
उस समय वाहनों की कमी थी, लेकिन ब्रिगेडियर जगमाल सिंह ने इसे अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया।
वे ऊंटों पर सवार होकर अपनी 'गंगा जैसलमेर' बटालियन के साथ पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुस गए थे।
रानीहल चेकपोस्ट पर तिरंगे का गौरव
6 दिसंबर 1971 को हुई वह निर्णायक लड़ाई आज भी भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
उस दिन मेजर (तत्कालीन) जगमाल सिंह की कंपनी ने दुश्मन की एक अत्यंत मजबूत सुरक्षा वाली चौकी पर हमला किया था।
पाकिस्तानी सेना ने भारी मशीनगनों और मोर्टार से भीषण गोलाबारी शुरू कर दी थी, जिससे आगे बढ़ना मुश्किल था।
लेकिन मेजर राठौड़ ने तुरंत स्थिति का आकलन किया और अपनी रणनीति बदलते हुए खुद एक प्लाटून का नेतृत्व किया।
गंगा जैसलमेर बटालियन का ऐतिहासिक योगदान
वे दुश्मन की फायरिंग लाइन को चकमा देते हुए किनारे से आगे बढ़े और सीधे चौकी पर धावा बोल दिया।
इस अचानक हुए हमले से पाकिस्तानी फौज पूरी तरह हक्की-बक्की रह गई और उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला।
उनकी इस कार्रवाई ने रेगिस्तानी मोर्चे पर भारतीय सेना को एक बहुत बड़ी सामरिक बढ़त दिला दी थी।
भारतीय सैनिकों का साहस देख पाकिस्तानी सेना घबरा गई और पीछे हटने को मजबूर हो गई थी।
राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के परिवार से नाता
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह के निधन की खबर मिलते ही बीकानेर सहित पूरे राजस्थान में शोक की लहर दौड़ गई है।
उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी उनके अंतिम दर्शन के लिए बीकानेर पहुंच रहे हैं।
राठौड़ परिवार का भारतीय सेना में हमेशा से एक गौरवशाली और प्रेरणादायक इतिहास रहा है।
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह ने अपने परिवार और देश का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया था।
रेडियो संचार और युद्ध की चुनौतियां
उनकी बेटी कविता ने बताया कि उस समय संचार के साधन आज की तरह वॉकी-टॉकी या मोबाइल नहीं थे।
युद्ध के मैदान में सूचनाएं भेजने के लिए भारी-भरकम रेडियो सिस्टम का उपयोग करना पड़ता था।
ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी टीम के साथ तालमेल बनाए रखा और जीत हासिल की।
दुश्मन के कई सैनिकों को बंदी बनाया गया और बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए थे।
"पिताजी हमेशा कहते थे कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जिगर और सही रणनीति से जीता जाता है।" - कविता राठौड़
1971 युद्ध की रणनीतिक गहराई
1971 का भारत-पाक युद्ध मात्र 13 दिनों तक चला था, लेकिन इसके परिणाम ऐतिहासिक थे।
3 दिसंबर को शुरू हुआ यह युद्ध 16 दिसंबर को पाकिस्तान के आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ था।
इस युद्ध के कारण ही विश्व मानचित्र पर बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का उदय हुआ था।
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह जैसे योद्धाओं के कारण ही ढाका में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर किया था।
वीर चक्र: एक योद्धा का सम्मान
वीर चक्र पदक के प्रशस्ति पत्र में उनकी वीरता का स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि कैसे उन्होंने खुद को खतरे में डाला।
उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी टीम को प्रेरित किया और जीत सुनिश्चित की।
वे हमेशा अपनी रेजिमेंट 'द ग्रेनेडियर्स' की 13वीं बटालियन के शौर्य की कहानियां सुनाया करते थे।
आज उनके जाने से भारतीय सेना ने अपना एक अनमोल रत्न और मार्गदर्शक खो दिया है।
बीकानेर में शोक की लहर
बीकानेर के सादुलगंज स्थित उनके निवास पर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है।
सेना के अधिकारी और स्थानीय प्रशासन के लोग भी उन्हें नमन करने पहुंच रहे हैं।
बुधवार को होने वाले अंतिम संस्कार में उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने की भी संभावना है।
पूरा शहर अपने इस वीर सपूत की अंतिम विदाई की तैयारियों में जुटा हुआ है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणापुंज
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह की कहानी स्कूल और कॉलेजों में युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।
उन्होंने दिखाया कि कैसे सीमित संसाधनों में भी बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
उनकी वीरता की कहानियां राजस्थान के लोकगीतों और सैन्य इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं।
उनका निधन एक युग का अंत है, लेकिन उनकी बहादुरी की यादें हमेशा अमर रहेंगी।
युद्ध की स्मृतियां और संस्मरण
वे अक्सर याद करते थे कि कैसे रेगिस्तान की तपती रेत में उन्होंने दिनों-रात दुश्मन का पीछा किया था।
उनके साथी सैनिक उन्हें एक सख्त लेकिन बेहद दयालु और न्यायप्रिय अधिकारी के रूप में याद करते हैं।
उन्होंने अपनी बटालियन के हर जवान को अपने परिवार के सदस्य की तरह माना और नेतृत्व किया।
यही कारण था कि उनके आदेश पर जवान मौत के मुंह में भी कूदने को तैयार रहते थे।
भारतीय सेना का रेगिस्तानी गौरव
राजस्थान का सीमावर्ती क्षेत्र हमेशा से भारतीय सुरक्षा के लिए बहुत संवेदनशील रहा है।
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह ने इस क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों को समझकर अपनी युद्ध कला विकसित की थी।
ऊंटों का उपयोग कर उन्होंने पाकिस्तानी सेना को उस जगह मात दी, जहां वे खुद को सुरक्षित मानते थे।
उनकी यह रणनीति आज भी सैन्य अकादमियों में चर्चा का विषय रहती है।
13 दिनों का वो ऐतिहासिक संघर्ष
दिसंबर 1971 की वह सर्द रातें जब पूरा देश युद्ध की आग में झुलस रहा था, तब वे सीमा पर अडिग थे।
उनकी बटालियन ने न केवल अपनी सीमा की रक्षा की, बल्कि दुश्मन के इलाके में जाकर चोट की।
यह उनकी वीरता का ही प्रभाव था कि पाकिस्तानी सैनिक अपनी चौकियां छोड़कर भाग खड़े हुए थे।
उनका योगदान भारत की अखंडता को बनाए रखने में मील का पत्थर साबित हुआ।
निष्कर्ष और अंतिम विदाई
ब्रिगेडियर जगमाल सिंह राठौड़ का जीवन अनुशासन, साहस और राष्ट्रभक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
उनका निधन राष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।
आज पूरा भारत उनके शौर्य को नमन करता है और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है।
वे सदा हमारे दिलों में एक सच्चे नायक के रूप में जीवित रहेंगे।
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