मणकसास (झुंझुनूं)/रॉयल गाँव (खण्डेला, सीकर)। राजस्थान में बेटियों को उनके मायके और पैतृक गाँव बुलाकर रिश्तों की स्मृतियों को सहेजने की पहल चर्चा में है। प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर ऐसे आयोजन किए जा रहे हैं, जिनमें विवाह के बाद अलग-अलग स्थानों पर रह रही बेटियाँ अपने गाँव लौटकर परिजनों और बचपन की सखियों के साथ समय बिताती हैं। इसी कड़ी में झुंझुनूं जिले के मणकसास और सीकर जिले के खण्डेला क्षेत्र स्थित रॉयल गाँव में ‘बुआ, बहन, बेटी स्नेह मिलन समारोह’ आयोजित किया गया।
दोनों आयोजनों में परिवार और गाँव से जुड़ी अलग-अलग पीढ़ियों की महिलाओं ने भाग लिया। किसी परिवार की बुआ और दादी-बुआ कार्यक्रम में पहुंचीं तो किसी की बहन, मौसी, माता और बेटी ने इसमें सहभागिता निभाई। वर्षों बाद बचपन की सखियों और रिश्तेदारों की मुलाकात हुई तो पुराने किस्सों, पारिवारिक स्मृतियों और बचपन की यादों का सिलसिला शुरू हो गया।
मायके लौटकर ताजा हुईं बचपन की यादें
आयोजन में शामिल महिलाओं के लिए यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने बचपन और पारिवारिक जड़ों से दोबारा जुड़ने का अवसर बना। जिस आँगन और गलियों में उन्होंने बचपन बिताया था, वहां लौटकर उन्होंने पुरानी स्मृतियां साझा कीं। वर्षों बाद मिलीं बचपन की सखियों ने एक-दूसरे के जीवन और परिवार के बारे में जानकारी ली।
अलग-अलग पीढ़ियों की महिलाओं के एक स्थान पर जुटने से नई पीढ़ी को भी अपने विस्तृत परिवार और रिश्तों को समझने का अवसर मिला। बुजुर्ग महिलाओं ने परिवार से जुड़े पुराने प्रसंग साझा किए, जबकि युवा पीढ़ी ने उन रिश्तों और परम्पराओं को करीब से जाना, जिनके बारे में उन्होंने अब तक केवल परिवार की बातचीत में सुना था।
भाइयों, पिताओं और बुजुर्गों ने संभाली जिम्मेदारी
समारोह की विशेषता यह रही कि इसकी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी भाइयों, पिताओं और गाँव के बुजुर्गों ने संभाली। जिस परिवार और गाँव से बेटियों की विदाई हुई थी, वहीं के लोगों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। आयोजकों की ओर से बेटियों के प्रति सम्मान और आत्मीयता व्यक्त करते हुए पारम्परिक तरीके से अभिनंदन किया गया।
सीकर जिले के खण्डेला क्षेत्र स्थित रॉयल गाँव में भामाशाह मेघराज सिंह रॉयल की ओर से रॉयल गढ़ में समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान पारम्परिक स्वागत, पारिवारिक संस्कार और रिश्तों के प्रति सम्मान का भाव दिखाई दिया। आयोजन का उद्देश्य बेटियों को यह विश्वास दिलाना रहा कि विवाह के बाद भी मायके और पैतृक गाँव में उनका स्थान और सम्मान पहले की तरह कायम है।
रिश्तों की डोर मजबूत बनाए रखने का संदेश
भामाशाह मेघराज सिंह रॉयल ने अपने संदेश में कहा कि बेटियाँ घर की रौनक होती हैं और उनके आने से आँगन गुलजार हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रयास यही होना चाहिए कि प्रत्येक बेटी जब भी अपने मायके आए, उसे वही अपनापन, सम्मान और स्नेह मिले। उन्होंने इस परम्परा को आगे बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों को भी इससे जोड़ने की कामना की।
ब्रिगेडियर जितेंद्र सिंह शेखावत ने अपने संदेश में कहा कि बुआ, बहन और बेटी के रिश्ते परिवार तथा समाज की मजबूत डोर हैं। इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कारों और पारिवारिक रिश्तों के महत्व से परिचित कराते हैं। उन्होंने कामना की कि परिवारों के बीच यह अपनापन बना रहे और प्रत्येक बेटी के मन में मायके को लेकर सम्मान तथा भरोसे का भाव कायम रहे।
नई पीढ़ी ने समझा रिश्तों का महत्व
समारोह में शामिल परिवारों के लिए ये पल सामान्य मुलाकात से कहीं आगे रहे। बुआ का दुलार, बहनों की हंसी और बेटियों की चहल-पहल के बीच नई पीढ़ी ने देखा कि पारिवारिक रिश्तों को प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे को समय देकर कैसे सहेजा जाता है। आयोजन के दौरान साझा की गई यादें और पारिवारिक प्रसंग भविष्य में नई पीढ़ी के लिए भी परिवार की कहानियों का हिस्सा बनेंगे।
आयोजकों का मानना है कि समय के साथ जिम्मेदारियां और जीवन की परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन मायके तथा पैतृक गाँव से जुड़ी स्मृतियां बनी रहती हैं। ऐसे स्नेह मिलन समारोह बेटियों को परिवार और गाँव से दोबारा जोड़ने के साथ यह संदेश भी देते हैं कि मायके के आँगन में उनका इंतजार और अधिकार हमेशा बना रहता है।