नई दिल्ली | सीबीएसई 12वीं के नतीजों ने इस साल हजारों इंजीनियरिंग उम्मीदवारों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। जेईई मेन में शानदार प्रदर्शन करने वाले छात्र बोर्ड परीक्षा में पिछड़ गए हैं।
CBSE रिजल्ट: JEE छात्रों का सपना टूटा: JEE Main में 99% लेकिन 12वीं में फेल? CBSE मार्किंग पर सवाल
सीबीएसई की डिजिटल मार्किंग से हजारों JEE उम्मीदवार प्रभावित, 75% क्राइटेरिया बना बड़ी बाधा।
HIGHLIGHTS
- जेईई मेन में 99 परसेंटाइल हासिल करने वाले हजारों छात्र सीबीएसई बोर्ड में 75 प्रतिशत अंक लाने में विफल रहे हैं।
- छात्रों और शिक्षकों ने सीबीएसई की नई 'ऑन स्क्रीन मार्किंग' (OSM) प्रणाली को इस गिरावट का मुख्य कारण बताया है।
- डिजिटल कॉपी चेकिंग के कारण गणित और भौतिकी जैसे विषयों में स्टेप मार्किंग और डायग्राम्स पर नंबर कटने के आरोप लगे हैं।
- रीचेकिंग के लिए प्रति विषय 500 रुपये की फीस छात्रों के लिए आर्थिक बोझ बन रही है, जिससे अभिभावकों में भारी रोष है।
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जेईई एडवांस्ड की दौड़ से बाहर हुए होनहार
इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए इस साल के सीबीएसई बोर्ड परिणाम किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। कई छात्र जेईई मेन में 99 परसेंटाइल लाकर भी बोर्ड में 75 प्रतिशत नहीं ला सके।
नियमों के अनुसार, आईआईटी में प्रवेश के लिए 12वीं बोर्ड में कम से कम 75 प्रतिशत अंक होना अनिवार्य है। इस मानदंड को पूरा न कर पाने के कारण हजारों छात्र अपात्र हो गए हैं।
छात्रों का कहना है कि उन्होंने दो साल तक कड़ी मेहनत की और कठिन प्रवेश परीक्षा पास की। लेकिन बोर्ड के नतीजों ने उनके प्रीमियम इंजीनियरिंग कॉलेजों में जाने के सपने को तोड़ दिया है।
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डिजिटल मार्किंग तकनीक पर उठे गंभीर सवाल
इस साल सीबीएसई ने कॉपियों की जांच के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग (OSM) का सहारा लिया है। इसके तहत शिक्षकों को कंप्यूटर स्क्रीन पर ही स्कैन की गई कॉपियों का मूल्यांकन करना होता है।
शिक्षकों का मानना है कि डिजिटल माध्यम से कॉपियां जांचना काफी जटिल प्रक्रिया है। स्क्रीन पर लंबे उत्तरों को पढ़ना और स्टेप-बाय-स्टेप मार्किंग करना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
अक्सर छात्र हल्के पेन का उपयोग करते हैं जिससे स्कैन की गई कॉपियों में लिखावट स्पष्ट नहीं दिखती। इस वजह से कई बार सही उत्तर होने पर भी छात्रों के नंबर काट लिए जाते हैं।
"डिजिटल मूल्यांकन में स्टेप मार्किंग और जटिल डायग्राम्स को नजरअंदाज किए जाने की संभावना बढ़ जाती है, जिसका खामियाजा मेधावी छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।"
टॉपर्स के अंकों में आई अप्रत्याशित गिरावट
यह समस्या केवल औसत छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूल टॉपर्स भी इसकी चपेट में आए हैं। दिल्ली के कई नामी स्कूलों के शिक्षकों ने इस विसंगति पर चिंता व्यक्त की है।
गणित और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों में 95 से अधिक अंक की उम्मीद करने वाले छात्र 70 के नीचे सिमट गए हैं। एक छात्र ने बताया कि उसके गणित में 13 अंक कम आए हैं।
फिजिकल एजुकेशन जैसे स्कोरिंग विषयों में भी छात्रों को बहुत कम अंक मिले हैं। छात्रों का आरोप है कि डिजिटल चेकिंग के दौरान परीक्षक ने उनके उत्तरों को पूरी तरह नहीं पढ़ा।
रीचेकिंग की प्रक्रिया और आर्थिक चुनौतियां
अपने परिणामों से असंतुष्ट हजारों छात्रों ने अब कॉपियों की रीचेकिंग और पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया है। हालांकि, यह प्रक्रिया छात्रों के लिए काफी महंगी साबित हो रही है।
सीबीएसई प्रत्येक विषय के पुनर्मूल्यांकन के लिए 500 रुपये की भारी फीस वसूल रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों के लिए यह राशि जुटाना एक बड़ी चुनौती बन गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल युग में छात्रों को अब अपनी लेखन शैली बदलनी होगी। अब गहरे रंग के पेन का उपयोग और बहुत साफ हैंडराइटिंग अनिवार्य हो गई है।
भविष्य की राह और समाधान की मांग
शिक्षाविदों का मानना है कि सीबीएसई को अपनी मार्किंग प्रणाली में पारदर्शिता लाने की जरूरत है। अगर तकनीकी खामियों से छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है, तो इस पर विचार होना चाहिए।
छात्रों और अभिभावकों ने बोर्ड से मांग की है कि 75 प्रतिशत के मानदंड में इस साल ढील दी जाए। वे चाहते हैं कि उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन हो और उन्हें न्याय मिले।
निष्कर्षतः, तकनीक का उपयोग शिक्षा में सुधार के लिए होना चाहिए, न कि छात्रों के करियर में बाधा बनने के लिए। बोर्ड को इस गंभीर मुद्दे पर जल्द ही स्पष्टीकरण देना होगा।
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