चीन की स्थापना और माओ त्से तुंग का युग
आज 1 अक्टूबर है और यह तारीख चीन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। ठीक 77 साल पहले 1949 में इसी दिन बीजिंग में माओ त्से तुंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना का ऐलान किया था।
भारत इस कम्युनिस्ट क्रांति से दो वर्ष पहले यानी 1947 में स्वतंत्र हुआ था। उस समय दोनों ही देश गरीबी से जूझ रहे थे और उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह खेती पर निर्भर थी।
आज चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बन चुका है। माओ के दौर में चीन ने एक मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया, हालांकि आर्थिक रूप से वह तब भी पिछड़ा हुआ था।
राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक क्रांति
माओ त्से तुंग का प्रसिद्ध विचार था कि राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। उनके नेतृत्व में चीन में जमींदारी प्रथा को खत्म किया गया और जमीन किसानों में बांटी गई।
1958 में चीन में कल्चरल रिवॉल्यूशन का बिगुल फूंका गया, जिसके कारण लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसके बाद 1966 से 1976 तक चली सांस्कृतिक क्रांति ने शिक्षा और उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचाया।
1976 में माओ की मृत्यु तक चीन एक राजनीतिक शक्ति तो बन गया था, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर बनी रही। इसी दौरान भारत लोकतंत्र की नींव मजबूत करने में जुटा था।
डेंग शियाओपिंग और आर्थिक सुधारों का उदय
माओ के बाद चीन की कमान डेंग शियाओपिंग के हाथों में आई। यहीं से चीन की तकदीर बदलने का सिलसिला शुरू हुआ। डेंग ने 1978 में व्यापक आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू किए।
चीन के तटीय इलाकों में विदेशी कंपनियों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाए गए। किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचने की अनुमति दी गई, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।
साल 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना। इसके बाद चीन ने दशकों तक अपने बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और रेल नेटवर्क पर भारी निवेश किया, जिससे वह 'दुनिया की फैक्ट्री' बन गया।
भारत बनाम चीन: आर्थिक उदारीकरण की तुलना
भारत ने अपने आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1991 में की, जो चीन के सुधारों के लगभग 13 साल बाद थी। भारत की प्रगति मुख्य रूप से आईटी और सेवा क्षेत्र पर आधारित रही।
इसके विपरीत, चीन ने मैन्युफैक्चरिंग यानी विनिर्माण क्षेत्र पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। यही कारण है कि आज दोनों देशों के व्यापारिक आंकड़ों में एक बड़ा अंतर दिखाई देता है।
बढ़ता व्यापार घाटा और उत्पादन निर्भरता
भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। पिछले पांच वर्षों में इसमें 155 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में चीन अमेरिका को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 151.1 अरब डॉलर रहा।
इस व्यापार में भारत का घाटा 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। भारत का निर्यात केवल 20-21 अरब डॉलर के आसपास है, जबकि आयात इसके मुकाबले सात गुना अधिक है।
प्रमुख क्षेत्रों में चीन का दबदबा
चीन दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत रेयर अर्थ मैग्नेट का उत्पादन करता है। भारत के पास पांचवां सबसे बड़ा भंडार होने के बावजूद वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है।
भारत औद्योगिक सामान के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर है। चीन से आने वाले कुल आयात का 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक सामान का है, जो भारतीय उद्योगों के लिए चिंता का विषय है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का 43 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता है।
- मशीनरी और कंप्यूटर क्षेत्र में यह निर्भरता 40 प्रतिशत है।
- ऑर्गेनिक केमिकल के मामले में भारत 44 प्रतिशत आयात चीन से करता है।
रक्षा बजट और सामरिक चुनौतियां
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में चीन का रक्षा खर्च भारत के मुकाबले 3.6 गुना अधिक था। भारत ने 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को 7,84,678 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
यह बजट जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत है, लेकिन पेंशन खर्च हटाने पर यह केवल 1.6 प्रतिशत रह जाता है। भारत 2020 से 2024 के बीच दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा है।
हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग की कमी और शोध (R&D) पर कम खर्च भारत के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। आईएमएफ के अनुसार, चीन की अर्थव्यवस्था भारत से लगभग चार से पांच गुना बड़ी है।
सामरिक घेराबंदी और भारत का जवाब
चीन भारत को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह, श्रीलंका में हंबनटोटा और म्यांमार में क्यौकप्यू के जरिए उसकी पैठ बढ़ी है।
इसके अलावा नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश में भी चीन ने भारी निवेश किया है। इसके जवाब में भारत ने अपनी सीमाओं पर सड़क, सुरंग और हवाई पट्टियों का निर्माण तेज कर दिया है।
भारत ने क्वाड और मालाबार जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों के माध्यम से अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपना सहयोग बढ़ाया है ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे।
भविष्य की राह और घरेलू क्षमता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को मुख्य क्षेत्रों में अपनी घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी। केवल आयात पर निर्भरता कम करके ही व्यापार घाटे को नियंत्रित किया जा सकता है।
रक्षा के मोर्चे पर बजट में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सीमित संसाधनों का स्मार्ट इस्तेमाल करना अनिवार्य है। भारत को सप्लाई चेन के नए स्रोत तलाशने और विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
*Edit with Google AI Studio