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पीढ़ियों का फौजी जज्बा: योद्धा कर्नल मोहन सिंह शेखावत की कहानी: तीन पीढ़ियों का सैन्य गौरव

Pradeep Beedawat · 26 जुलाई 2026, 11:30 दोपहर
कारगिल विजय दिवस पर, तीन पीढ़ियों से सेना में रहे कर्नल मोहन सिंह शेखावत ने अपने सैन्य अनुभव, पारिवारिक विरासत और जाट रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास को साझा किया।

बीकानेर | कारगिल विजय दिवस के अवसर पर, भारतीय सेना के एक ऐसे योद्धा कर्नल मोहन सिंह शेखावत के साथ एक विशेष साक्षात्कार प्रस्तुत है, जिनका परिवार तीन पीढ़ियों से देश की सेवा कर रहा है। बीकानेर जिले के धोपालिया गांव के रहने वाले कर्नल शेखावत जाट रेजिमेंट से सेवानिवृत्त हुए हैं। इस बातचीत में उन्होंने अपने सैन्य जीवन, पारिवारिक विरासत और कारगिल युद्ध के अनुभवों को साझा किया।

तीन पीढ़ियों की सैन्य विरासत

कर्नल मोहन सिंह जी ने बताया कि फौज उनके खून में है। उनके दादा, कैप्टन ठाकुर कुशाल सिंह, प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश आर्मी में थे।

उन्हें उनकी वीरता के लिए 'ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एंपायर' (OBE) और 'इंडियन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस मेडल' (IDSM) से सम्मानित किया गया था, जो आज के महावीर चक्र के बराबर माना जा सकता है।

उन्हें तीन पीढ़ियों तक पेंशन मिली, जिसे 'जागीर अलाउंस' कहा जाता था।

उनके दादा ने इटली, इंग्लैंड और मेसोपोटामिया जैसे कई देशों में युद्ध लड़े। सेवानिवृत्ति के बाद उनकी पेंशन ₹375 थी, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी।

1933 में क्वीन विक्टोरिया के राज्याभिषेक के लिए उन्हें लंदन बुलाया गया था। वहां बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी ने उन्हें देखा और उनकी वीरता से प्रभावित होकर उन्हें बीकानेर की सेना को प्रशिक्षित करने के लिए आमंत्रित किया।

शिक्षा का महत्व

कर्नल शेखावत ने बताया कि उनके दादा अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा।

उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दी। उनके ताऊजी, लेफ्टिनेंट जनरल चिमन सिंह, को आरएमसी में भेजा गया, जहाँ उस समय राजाओं के बच्चे पढ़ते थे।

उनके पिता और चाचा को नोबल पब्लिक स्कूल में पढ़ाया गया। इसी शिक्षा की नींव के कारण आज उनके परिवार में लगभग 20 आर्मी ऑफिसर हैं, जिनमें से 10 अभी भी सेवा में हैं।

उनका अपना बेटा, मेजर राघव सिंह, भी सेना में है और उसने विदेश में एमटेक करने का अवसर छोड़कर फौज को चुना।

शिक्षा, खेल और सेना में प्रवेश

कर्नल साहब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बीकानेर में की। वे बास्केटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे और जूनियर नेशनल तक खेले।

11वीं और 12वीं की पढ़ाई उन्होंने केंद्रीय विद्यालय, आईआईटी चेन्नई से की, जहाँ उन्हें स्कॉलरशिप मिलती थी।

इसके बाद वे दिल्ली विश्वविद्यालय आ गए और डीयू टीम और दिल्ली स्टेट की तरफ से भी खेले। ग्रेजुएशन के तुरंत बाद उन्होंने सीडीएस के माध्यम से फौज ज्वाइन कर ली।

जाट रेजिमेंट और 1965 का डोगराई युद्ध

कर्नल शेखावत ने 3 जाट रेजिमेंट ज्वाइन की, जो 1965 की 'बैटल ऑफ डोगराई' के लिए प्रसिद्ध है।

यह लड़ाई लाहौर के पास डोगराई तहसील में हुई थी। 21-22 सितंबर को, उनकी यूनिट ने बिना किसी आर्मर्ड या एयर सपोर्ट के इच्छोगिल कैनाल को पार किया और लाहौर से केवल 12 किलोमीटर दूर डोगराई पर कब्जा कर लिया।

उन्होंने बताया कि यह लड़ाई हाथ से हाथ की लड़ाई थी और इसे दुनिया की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक माना जाता है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब तक आप जमीन पर भौतिक रूप से कब्जा नहीं करते, तब तक आप युद्ध नहीं जीत सकते, चाहे तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए।

कारगिल युद्ध: अदम्य साहस की गाथा

कारगिल युद्ध पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने जो काम किया वह लगभग असंभव था।

दुश्मन लगभग 130 चोटियों पर बैठा था, जहाँ कोई प्राकृतिक कवर नहीं था। ऊपर बैठा एक दुश्मन 100 सैनिकों को रोक सकता था।

यह युद्ध मई में शुरू हुआ और 26 जुलाई को समाप्त हुआ। इसमें इन्फेंट्री रेजिमेंट्स ने असाधारण वीरता दिखाई।

सैनिकों की छोटी-छोटी टुकड़ियां यह जानते हुए भी आगे बढ़ीं कि वे शायद वापस नहीं लौटेंगे। उन्होंने केवल अपने देश और रेजिमेंट के सम्मान के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी।

इस युद्ध में भारत का नुकसान हुआ, लेकिन पाकिस्तान का नुकसान उससे दोगुना था।

पाकिस्तान का धोखा और भारत का जवाब

कर्नल साहब ने बताया कि कारगिल में पाकिस्तान ने धोखा किया। लाइन ऑफ कंट्रोल पर एक अलिखित संधि थी कि सर्दियों में दोनों सेनाएं अपनी पोस्ट खाली कर देंगी क्योंकि वहां 40-50 फीट बर्फ गिरती है।

लेकिन पाकिस्तान ने इस संधि को तोड़कर अपनी नर्दन लाइट इन्फेंट्री और प्रशिक्षित आतंकवादियों को भारतीय पोस्टों पर बिठा दिया।

उनका मुख्य उद्देश्य लेह-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर नियंत्रण करना था ताकि लद्दाख को भारत से काट दिया जाए।

जब कैप्टन सौरभ कालिया की पेट्रोलिंग टीम वहां गई, तब इस धोखे का पता चला। भारतीय सेना ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और एक-एक करके सभी 130 चोटियों को वापस अपने कब्जे में ले लिया।

फौज में जातिवाद? 'राष्ट्र सर्वोपरि'

जब उनसे पूछा गया कि वे राजपूत होकर जाट रेजिमेंट में कैसे रहे, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि फौज में जातिवाद बिल्कुल नहीं है।

उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जब वे उड़ी सेक्टर में थे। एक ऑपरेशन के लिए जब टीम चुनी जा रही थी, तो जाट जवानों ने कहा कि वे केवल 'मोहन साहब' के साथ जाएंगे, भले ही वे राजपूत थे।

उन्होंने कहा, "फौज में न कोई धर्म है, न कोई जाति। हम सब भारतीय हैं।" उन्होंने सिविल प्रशासन में व्याप्त जातिवाद पर गहरा दुख व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि रेजिमेंट का नाम जाति पर होना गर्व की बात है और एक सैनिक अपने देश से पहले अपनी रेजिमेंट के सम्मान के लिए लड़ता है।

चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन और सैन्य सम्मान

कर्नल शेखावत ने अपने एक साहसिक ऑपरेशन के बारे में बताया। 1990 में, उन्हें चीन के पास 'अंजमखला पास' पर पेट्रोलिंग का नेतृत्व करने के लिए चुना गया, जहाँ 1962 के बाद कोई नहीं गया था।

उन्होंने अपनी टीम के साथ वहां भारतीय झंडा फहराया और चीन के निशानों को उखाड़ फेंका।

इसके अलावा, उन्होंने कश्मीर घाटी में कई ऑपरेशन किए, जिसमें एक ही ऑपरेशन में 14 आतंकवादियों को मार गिराया गया।

उनकी वीरता के लिए उन्हें तीन बार चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ साइटेशन से सम्मानित किया गया।

बदलती सेना और नागरिक समाज

उन्होंने बताया कि सेना में अब बहुत बदलाव आ गया है, जैसे अग्निवीर योजना। उन्होंने कहा कि पहले अफसरों और जवानों में गहरा प्रेम और विश्वास का रिश्ता था।

उन्होंने अपने एक जवान रूपाराम का किस्सा सुनाया, जिसने अपनी शादी को स्थगित कर दिया क्योंकि वह अपनी पलटन को एक महत्वपूर्ण प्रतियोगिता में छोड़कर नहीं जाना चाहता था।

उन्होंने कहा कि सेना में देश और रेजिमेंट हमेशा खुद से पहले आते हैं।

शहीदों का सम्मान

कर्नल साहब ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि हमारे देश में शहीदों और उनके परिवारों को वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं।

उन्होंने कहा कि विदेशों में सैनिकों को बहुत सम्मान दिया जाता है, लेकिन यहां शहीदों के परिवारों को छोटे-छोटे कामों के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं।

उन्होंने एक 1971 के शहीद का उदाहरण दिया जिनकी मूर्ति आज तक उनके गांव में नहीं लग पाई है क्योंकि स्कूल विकास समिति एनओसी नहीं दे रही है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रशासन को शहीदों के काम प्राथमिकता के आधार पर करने चाहिए।

युवाओं के लिए प्रेरणा और सेना पर भरोसा

सेना में चयन प्रक्रिया के बारे में उन्होंने बताया कि यह पूरी तरह से योग्यता पर आधारित है। इसमें कोई भाई-भतीजावाद या राजनीतिक प्रभाव नहीं चलता।

उन्होंने कहा कि सेना को एक संस्कारी बच्चा चाहिए, और गांव के बच्चों में ये संस्कार होते हैं, इसलिए उनका चयन अधिक होता है।

अंत में, उन्होंने कहा कि देश को अपनी सेना पर पूरा भरोसा है। किसी भी आपदा या संकट में, जब सेना पहुंचती है, तो लोगों को विश्वास हो जाता है कि अब सब ठीक हो जाएगा। सेना देश का अंतिम सहारा है, इसलिए इसे हमेशा मजबूत रखना चाहिए।

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