नई दिल्ली | मौसम का मिजाज इन दिनों हर किसी को हैरान कर रहा है। दिल्ली-एनसीआर में शुक्रवार की सुबह जब लोगों की आंखें खुलीं, तो नजारा कुछ अलग ही था।
सुबह के उजाले के साथ ही हल्की हवा और धुंध छाई हुई थी। यह कोहरे जैसा दिख रहा था, लेकिन असल में यह धूल भरी धुंध थी।
तेज हवाओं ने गर्मी से राहत तो दी, लेकिन विजिबिलिटी काफी कम हो गई। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर अप्रैल में यह क्या हो रहा है?
आखिर क्यों है मौसम का 'अप्रैल फूल'?
मौसम वैज्ञानिक इस बदलाव को प्रकृति की एक जटिल प्रक्रिया मान रहे हैं। उनके अनुसार, यह केवल संयोग नहीं बल्कि वैश्विक मौसमी बदलावों का असर है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘पोलर जेट स्ट्रीम’ में बाधा आने की वजह से पश्चिमी विक्षोभों की संख्या बढ़ गई है। इसकी वजह से मौसम लगातार 'अप्रैल फूल' बना रहा है।
इस सप्ताह उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में बेमौसम गरज-चमक के साथ बारिश हुई। कई जगहों पर ओलावृष्टि ने भी जनजीवन और फसलों को प्रभावित किया है।
पोलर वोर्टेक्स और जेट स्ट्रीम का कनेक्शन
भारत का मौसम एक वैश्विक कड़ी से जुड़ा हुआ है। आर्कटिक के चारों ओर घूमने वाली ठंडी हवाओं का समूह, जिसे ‘पोलर वोर्टेक्स’ कहते हैं, जेट स्ट्रीम को प्रभावित करता है।
जब ये जेट स्ट्रीम अपने सीधे मार्ग से भटककर ‘लहरदार’ हो जाती हैं, तो ये सिस्टम को भारत के निचले अक्षांशों की ओर धकेल देती हैं।
यही कारण है कि इस साल पश्चिमी विक्षोभों की संख्या में असामान्य वृद्धि देखी गई है। मार्च के महीने में ही 8 पश्चिमी विक्षोभ दर्ज किए गए हैं।
थार मरुस्थल से आने वाली धूल
दिल्ली-एनसीआर में छाई धुंध का एक बड़ा कारण राजस्थान का थार मरुस्थल है। गर्मी की शुरुआत के साथ ही वहां हवा की गति बढ़ जाती है।
ये तेज हवाएं भारी मात्रा में धूल उड़ाकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में लाती हैं। चूंकि एनसीआर राजस्थान के करीब है, इसलिए यहां असर ज्यादा दिखता है।
हवा में धूल के महीन कण यानी PM10 की मात्रा बढ़ गई है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर चल रहे निर्माण कार्य और खुदी हुई सड़कें भी इस धूल में इजाफा करती हैं।
एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन का असर
अक्सर इस मौसम में राजस्थान के आसपास हवा का एक चक्र बनता है। यह चक्र जमीन की धूल को ऊपर की ओर उठा देता है।
जब हवा की गति धीमी पड़ती है, तो यह धूल एनसीआर के आसमान में एक ‘परत’ की तरह जम जाती है। बारिश की कमी की वजह से यह धूल नीचे नहीं बैठ पाती।
वसंत की ओर खिसकता मौसम का चक्र
वैज्ञानिकों का मानना है कि पश्चिमी विक्षोभों के आने के समय में एक बड़ा ढांचागत बदलाव आया है। पहले ये सर्दियों में चरम पर होते थे।
अब ये विक्षोभ अप्रैल, मई और जून तक खिंच रहे हैं। इसका सीधा संबंध आर्कटिक समुद्री बर्फ के पिघलने और जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है।
जनवरी और फरवरी में बहुत कम पश्चिमी विक्षोभ आए थे। लेकिन मार्च के मध्य से इन प्रणालियों में अचानक बहुत ज्यादा तेजी देखी गई है।
IMD का अलर्ट और फसलों पर खतरा
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि अगले तीन दिनों तक उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का दौर जारी रह सकता है।
इस दौरान ओलावृष्टि की भी संभावना है। हालांकि इस बारिश ने बढ़ती गर्मी से राहत दी है, लेकिन किसानों के लिए यह चिंता का विषय है।
खेतों में खड़ी गेहूं और सरसों की फसलों के लिए यह बेमौसम बरसात और ओले किसी दुश्मन से कम नहीं हैं। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
क्या वाकई हो रही है 'नकली' बारिश?
सोशल मीडिया पर कई तरह की अफवाहें भी चल रही हैं। कुछ लोग इसे 'नकली' बारिश बता रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
यह पूरी तरह से एक प्राकृतिक घटना है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी जब पश्चिमी विक्षोभ से मिलती है, तो ऐसी स्थिति बनती है।
फिलहाल, दिल्ली-एनसीआर के लोगों को धूल और अचानक होने वाली बारिश के लिए तैयार रहना चाहिए। आने वाले दिनों में मौसम के और भी 'यू-टर्न' देखने को मिल सकते हैं।