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सम्राट विक्रमादित्य और इतिहास का सच: क्या भारतीय इतिहास से जानबूझकर मिटाया गया सम्राट विक्रमादित्य का अस्तित्व? जानिए विक्रम संवत् की अनसुनी गाथा

नीलू शेखावत · 25 मार्च 2026, 04:39 दोपहर
भारत की काल गणना में विक्रम संवत् का स्थान सर्वोच्च है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे गौरवशाली राजा विक्रमादित्य को इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे? यह लेख उनकी महानता और वर्तमान विडंबना को उजागर करता है।
भारत वर्ष की काल गणना में अनेकों संवत् चले किन्तु जीवित थोड़े ही रहे। सबसे अधिक और अनवरत जीवन विस्तार विक्रम संवत् का ही है। उत्तरी भारत में विक्रम संवत् का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से तथा दक्षिण भारत में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। इसलिए उत्तरी को चैत्रादि एवं दक्षिणी को कार्तिकादि संवत् कहा जाता है। विक्रम के अन्य नाम कृत या मालव संवत् भी है जिनका उपयोग नवीं शताब्दी पूर्व तक होता रहा। आज समस्त उत्तर भारत विक्रमादित्य शकारि की कथाओं से पूरित है। विक्रमदित्य का भारतीय अनुश्रुतियों में प्राचीनतम उल्लेख गाथा सप्तशती में मिलता है जहाँ विक्रम विषयक यह श्लोक है - सवाहणसुहरसतोसिएण देन्तेण तुह करे सक्खम् चलणेण विक्कमाइत्तचरिअ अणु सिक्खिअ तिस्सा एक ऐसा प्रतापी राजा जो लाखों के उपहार दान किया करता था। इसके पश्चात् जैनाचार्य मेरुत्तुङ्ग रचित पट्टावली में उल्लिखित है कि विक्रमादित्य ने शकों का उन्मूलन कर विक्रम संवत् की स्थापना की। शकों के आतंक और दुर्दान्तता से इतिहास भलीभांति परिचित है। हजारों वर्षों से हमें बार-बार यह बताया जाता है कि हम हारे हुए, पराभवयुक्त पूर्वजों की संताने हैं जबकि हमारे प्रबल-बल विक्रम चरित्रों को हमसे सायास छुपाया जाता है । सम्राट विक्रमादित्य हमारी सुविक्षित संस्कृति का ऐसा ही सर्वोच्च शिखर और प्रकाश स्तंभ है। उनकी दिग्विजय, संवत् प्रवर्तन और गौरव गाथा ने विद्वानों से लेकर सामान्य जनता तक, नागरिकों से लेकर ग्रामवासियों तक सबको अभिभूत किया है।  इतिहास के पंडित चाहे अपने पूर्वग्रह से युक्त मस्तिष्क में उन्हें स्वीकृति न दे पाए किंतु लोक मन में उनके प्रति श्रद्धा और सद्भावना आज भी अक्षुण्ण है। वैसे भी कुछ चरित्र मुद्रा या अभिलेख अंकन से नहीं, लोकमन की स्मृति से स्वतः निश्चित है। राम और कृष्ण की प्रामाणिकता के लिए लिखित अभिलेख वांछनीय नहीं, परंपरा से ही लोकमन स्मृत है क्योंकि लोक कथाएं मात्र गुण गाथाएं नहीं है, जन जीवन की श्रुत स्मृतियां है, मानव जाति की परंपरा और इतिहास की आद्यगाथा है। अनुश्रुतियों की उपेक्षा आत्म प्रवंचना ही है। विक्रम संवत् भारत की ऐसी ही सजीव व्यवस्था है जो आज दिन तक निरंतर है। वह भी तब जबकि ईस्वी संवत् उसके समानांतर समस्त विश्व को अपने प्रभाव में ले चुकी है। अनेक उत्थान पतन से गुजर कर अचल हिमालय की तरह स्थिर रहने वाला यह संवत् हमारे राष्ट्र की चिर संचित निधि और महान धारणा की स्मृति है। भारतीय संस्कृति पर अभिमान करने वालों के लिए यह कम गौरव का विषय नहीं कि आज भारतवर्ष में प्रवर्तित विक्रम संवत् बुद्ध निर्वाण काल गणना को छोड़कर विश्व भर के सभी प्रचलित संवत्सर में सर्वाधिक प्राचीन है। इस संवत् की कालजयी जीवटता के बारे में आप क्या कहेंगे? इसके पूर्व और पश्चात् कई संवत् बने और बिगड़े किंतु इसका अस्तित्व अभी भी अचल बना हुआ है। इधर हमारी निकृष्टता और दुर्भाग्य यह कि इस जीवित सरणि के प्रवर्तक के अस्तित्व का अब तक हम काल निर्धारण नहीं कर पाए। जिन विक्रमादित्य की तेज राशि ने समस्त भूमंडल को प्रकाशित किया, आज भी जिनके स्मरण मात्र से प्रत्येक भारतीय का सिर गर्व से उठ जाता है, जिनकी लोकप्रियता का घोष आज ढाई हजार वर्ष के बाद भी गूंज रहा है, जिनका सिंहासन आज भी भारतीयों की चर्चा का विषय है, जिनके के नवरत्नों की विद्वता की चर्चा आज भी विद्वत् मंडलियां करती है, उन विक्रमादित्य का स्थान भारतीय इतिहास अब तक तय नहीं कर पाया। कविवर मैथिलीशरण गुप्त ने इस विडंबना को कुछ इस तरह व्यक्त किया - दो सहस्त्र संवत् बीते हैं हम निज विक्रम बिना आज फिर मारे मारे जीते हैं नित्य नये शक हूण हमारा जीवन रस पीते हैं होकर भी क्या हुए आज भी हम उनके मनचीते हैं आपस के संबंध हमारे कड़वे हैं तीते हैं भरे भरे हैं हाय हृदय किंतु हाथ हमारे रीते हैं… इतिहास तय नहीं कर पाया, न ही सही। लोक मेधा उन्हें न भूलेगी। इस देश ने अनेक शासको का उत्थान पतन देखा, अनेक शासनों का परिवर्तन देखा किंतु विक्रम संवत् की लोकप्रियता ने सबको पीछे छोड़ दिया। विक्रम और उनका विक्रमाब्ध हमारे स्वाभिमान, शौर्य और स्वर्ण युग के पर्याय है। - नीलू शेखावत
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