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राम-विवाह से राष्ट्रधर्म का संदेश: राम-विवाह से राष्ट्रधर्म तक: गौ-संरक्षण का संदेश

गणपत सिंह मांडोली · 25 अगस्त 2026, 09:46 रात
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने रेवदर में श्रीराम-विवाह प्रसंग का विवेचन करते हुए विवाह को संस्कारों का मिलन और गौ-संरक्षण को सामाजिक उत्तरदायित्व बताया।

रेवदर |अर्बुदारण्य की पावन धरा पर श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में 'श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव' का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव में गो ऋषि दत्त शरणानंद जी महाराज के सानिध्य में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्रीराम-विवाह प्रसंग पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया।

विवाह: दो परिवारों का मंगलमय मिलन

जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपने प्रवचन में श्रीराम-विवाह प्रसंग का भावपूर्ण एवं तात्त्विक विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं है, बल्कि यह दो परिवारों, उनके संस्कारों और परम्पराओं के मंगलमय मिलन का एक पवित्र आधार है।

उन्होंने श्रीराम द्वारा भगवान शिव का धनुष भंग किए जाने के बाद मिथिला में हुए विवाह उत्सव का सुंदर वर्णन किया। इसके साथ ही, अयोध्या से राजा दशरथ की बारात के आगमन के प्रसंग को भी सुनाया।

भारतीय विवाह परंपरा का महत्व

महाराजश्री ने इन प्रसंगों के माध्यम से भारतीय विवाह परम्परा में निहित गहरे मूल्यों को रेखांकित किया। उन्होंने मर्यादा, परिवार के प्रति समर्पण, त्याग की भावना और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला।

राजा दशरथ का गौदान और गौ-महिमा

विवाह प्रसंग की चर्चा करते हुए, शंकराचार्य जी ने राजा दशरथ द्वारा एक लाख गौओं के दान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने समझाया कि भारतीय संस्कृति में दान करना केवल धन या वैभव का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह लोकमंगल और कृतज्ञता की एक गहरी अभिव्यक्ति है।

उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि में गौ को माता का स्थान दिए जाने की बात कही। उन्होंने गौ-संरक्षण को एक महत्वपूर्ण सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि गौ को राष्ट्रमाता का सम्मान मिलने से उसके संरक्षण और सेवा की भावना और भी मजबूत होगी।

जीवन के पाँच महत्वपूर्ण ऋण

महाराज ने पितृ ऋण, मातृ ऋण, आचार्य ऋण, देव ऋण और समाज ऋण की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन केवल उसका अपना नहीं होता।

उन्होंने समझाया कि माता-पिता, गुरु, प्रकृति, पूर्वजों और समाज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही हमारे संस्कारों की वास्तविक नींव है।

युवाओं के लिए संदेश

अंत में, युवाओं से श्रीराम और माता सीता के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया गया। उन्हें मर्यादा, संयम, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और पारिवारिक मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस कार्यक्रम में ऋषिचैतन्यजी महाराज, चेतननाथजी महाराज सहित अनेक संत, जनप्रतिनिधि एवं हजारों की संख्या में गोभक्त उपस्थित रहे।

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