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गुप्त नवरात्र: मां दुर्गा का वाहन क्या?: गुप्त नवरात्र 15 जुलाई से, नौका पर आएंगी मां दुर्गा

desk · 05 जुलाई 2026, 06:30 शाम
15 जुलाई से आषाढ़ गुप्त नवरात्र शुरू हो रहे हैं। इस बार मां दुर्गा का आगमन नौका पर होगा, जो समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है। जानें शुभ मुहूर्त और महत्व।

महाकौशल |

शक्ति उपासना का पर्व आषाढ़ गुप्त नवरात्र इस वर्ष 15 से 23 जुलाई तक श्रद्धा और सात्विक नियमों के साथ मनाया जाएगा। इस नवरात्र में साधक, तांत्रिक और श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ दस महाविद्याओं की विशेष साधना करते हैं।

इस बार नवरात्र की शुरुआत बुधवार से हो रही है, जिसके कारण मां दुर्गा का आगमन नौका पर माना जा रहा है। इसे एक शुभ और कल्याणकारी संकेत माना गया है।

नौका पर आगमन समृद्धि का प्रतीक

ज्योतिर्विद सौरभ दुबे के अनुसार, नवरात्र जिस दिन से शुरू होती है, उसी के आधार पर माता के वाहन का निर्धारण होता है।

बुधवार से शुरुआत होने पर माता नौका पर सवार होकर आती हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, यह वाहन अच्छी वर्षा, समृद्धि और कृषि में उन्नति का प्रतीक है।

कृषि प्रधान महाकौशल अंचल के लिए इसे विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। मान्यता है कि माता का नौका पर आगमन भक्तों के कष्ट दूर करने के साथ खुशहाली का संदेश देता है।

घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषाचार्य जनार्दन शुक्ला के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा 14 जुलाई को दोपहर 3.14 बजे शुरू होगी और 15 जुलाई को सुबह 11.52 बजे तक रहेगी।

उदया तिथि के आधार पर 15 जुलाई से गुप्त नवरात्र का आरंभ माना जाएगा। इस दिन पहले दिन पुष्य नक्षत्र में घटस्थापना की जाएगी।

कलश स्थापना का सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 8:02 बजे हर्षण योग में रहेगा। इसके बाद वज्र योग प्रारंभ हो जाएगा। हर्षण योग में किए गए अनुष्ठान को सुख, आनंद और मनोकामना पूर्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

साधना के लिए विशेष संयोग

ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि प्रतिपदा की उदया तिथि, पुष्य नक्षत्र और हर्षण योग का संयोग इस बार गुप्त नवरात्र को अत्यंत प्रभावशाली बना रहा है।

यह अवधि तंत्र-मंत्र, साधना, आध्यात्मिक अनुष्ठान और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए भी विशेष फलदायी मानी गई है।

सिद्धपीठों में होंगे विशेष अनुष्ठान

गुप्त नवरात्र के दौरान नर्मदा तट के प्राचीन मठों, भेड़ाघाट के चौसठ योगिनी मंदिर, गौरीघाट, बाजनामठ और मदन महल स्थित शारदा देवी मंदिर सहित प्रमुख सिद्धपीठों में विशेष पूजन-अनुष्ठान होंगे।

इन नौ दिनों तक मां काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी और बगलामुखी समेत दस महाविद्याओं की साधना की जाएगी। इस पर्व का समापन 23 जुलाई को नवमी के हवन और पूर्णाहुति के साथ होगा।

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