राजनीति

भज्जी को मिली CRPF सुरक्षा: हरभजन सिंह को मिली CRPF सुरक्षा, मान ने छीनी थी सिक्योरिटी

गणपत सिंह मांडोली · 26 अप्रैल 2026, 04:44 दोपहर
भगवंत मान ने हरभजन सिंह की सुरक्षा हटाई, तो केंद्र ने CRPF कमांडो तैनात किए।

चंडीगढ़ | पंजाब की राजनीति में इस समय जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई है और इस सियासी ड्रामे के केंद्र में हैं पूर्व क्रिकेटर और राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह।

हाल ही में हरभजन सिंह सहित आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने पार्टी छोड़ने का ऐलान किया, जिसके बाद राज्य की भगवंत मान सरकार ने उनकी सुरक्षा वापस ले ली थी।

लेकिन अब इस मामले में केंद्र सरकार की एंट्री हो गई है और गृह मंत्रालय ने हरभजन सिंह की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ के कमांडो तैनात कर दिए हैं।

सुरक्षा वापसी और केंद्र का हस्तक्षेप

पंजाब में जैसे ही हरभजन सिंह की सुरक्षा हटाई गई, वैसे ही दिल्ली के गलियारों में हलचल तेज हो गई और गृह मंत्रालय ने तुरंत एक्शन लिया।

बताया जा रहा है कि हरभजन सिंह के पास पहले पंजाब पुलिस के करीब 9 से 10 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिन्हें मान सरकार ने वापस बुला लिया था।

सुरक्षा हटाए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर केंद्र सरकार ने उन्हें 'सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स' यानी सीआरपीएफ का सुरक्षा कवच प्रदान करने का निर्णय लिया।

यह फैसला उस समय आया है जब पंजाब में आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच 'ऑपरेशन लोटस' को लेकर जुबानी जंग अपने चरम पर है।

हरभजन सिंह के अलावा अन्य उन सांसदों को भी केंद्रीय सुरक्षा मिलने की संभावना है जिन्होंने हाल ही में आम आदमी पार्टी का साथ छोड़ा है।

हरभजन सिंह के घर के बाहर प्रदर्शन

सुरक्षा हटाए जाने के पीछे की एक बड़ी वजह शनिवार को हरभजन सिंह के घर के बाहर हुआ उग्र विरोध प्रदर्शन भी माना जा रहा है।

जालंधर में हरभजन सिंह के आवास के बाहर कुछ प्रदर्शनकारियों ने काले स्प्रे से 'पंजाब का गद्दार' लिख दिया था, जिससे तनाव काफी बढ़ गया था।

आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हरभजन सिंह पर पार्टी और पंजाब की जनता के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए जमकर नारेबाजी की।

सिर्फ हरभजन सिंह ही नहीं, बल्कि अशोक मित्तल और राजिंदर गुप्ता के घरों के बाहर भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं।

इन घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया और इसी खतरे को देखते हुए केंद्र ने उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली।

सात सांसदों का पार्टी छोड़ना: एक बड़ा झटका

आम आदमी पार्टी के लिए यह हफ्ता किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं रहा है, क्योंकि उसके सात दिग्गज सांसदों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया।

राघव चड्ढा, जो अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार माने जाते थे, उन्होंने इस बगावत का नेतृत्व करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।

राघव चड्ढा के साथ संदीप पाठक, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी ने भी पार्टी से किनारा कर लिया है।

संदीप पाठक वही व्यक्ति हैं जिन्हें आम आदमी पार्टी का चाणक्य कहा जाता था और जिन्होंने पंजाब चुनाव में पार्टी की जीत की रणनीति बनाई थी।

इन सात सांसदों के जाने से राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की ताकत काफी कम हो गई है और पार्टी के भीतर नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं।

राघव चड्ढा के गंभीर आरोप

राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ते समय जो आरोप लगाए, उन्होंने राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है और पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी अब उन सिद्धांतों और मूल्यों से पूरी तरह भटक चुकी है, जिनके लिए इसका गठन अन्ना आंदोलन के दौरान हुआ था।

चड्ढा ने आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर अब आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो चुका है और कुछ खास लोगों के हाथ में ही सारी कमान सिमट गई है।

उन्होंने भाजपा में शामिल होने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि वे देश के विकास के लिए अब एक नई दिशा में काम करना चाहते हैं।

इन आरोपों ने आम आदमी पार्टी के समर्थकों को हैरान कर दिया है, क्योंकि राघव चड्ढा को पार्टी का चेहरा माना जाता था।

भगवंत मान का 'सात मसालों' वाला तंज

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इन सात सांसदों के पार्टी छोड़ने पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है और उन्हें सार्वजनिक रूप से 'गद्दार' करार दिया।

मान ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि ये 'सात मसाले' हैं जो खाने का स्वाद तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन इनका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता।

उन्होंने कहा कि इन लोगों को आम आदमी पार्टी ने पहचान दी, इन्हें सांसद बनाया, लेकिन इन्होंने वक्त आने पर पार्टी की पीठ में छुरा घोंप दिया।

"ये सात मसाले स्वाद तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन अकेले इनका कोई वजूद नहीं है, इन्हें जनता ने नहीं बल्कि पार्टी ने बनाया था।" - भगवंत मान

मान ने इसे भाजपा का 'ऑपरेशन लोटस' बताते हुए कहा कि पैसे और सत्ता के लालच में इन लोगों ने पंजाब के जनादेश का अपमान किया है।

ऑपरेशन लोटस और भाजपा की रणनीति

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि भाजपा ने धनबल और जांच एजेंसियों का डर दिखाकर उनके सांसदों को तोड़ने का काम किया है।

पार्टी नेतृत्व का कहना है कि अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा राज्य में अस्थिरता पैदा करना चाहती है।

हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि सांसद अपनी मर्जी से और पार्टी की नीतियों से तंग आकर बाहर आए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन सांसदों का भाजपा में जाना पंजाब के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है।

खासकर हरभजन सिंह जैसे लोकप्रिय चेहरे का साथ मिलना भाजपा के लिए पंजाब के शहरी इलाकों में एक बड़ी जीत साबित हो सकता है।

संदीप पाठक का जाना: संगठन को क्षति

इन सात सांसदों में संदीप पाठक का इस्तीफा पार्टी के लिए सबसे बड़ा तकनीकी और संगठनात्मक घाटा माना जा रहा है।

संदीप पाठक ने पंजाब के गांव-गांव जाकर पार्टी का ढांचा तैयार किया था और कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फौज खड़ी की थी।

उनके पार्टी छोड़ने से संगठन के भीतर एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भरना भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल के लिए आसान नहीं होगा।

पाठक के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे पिछले काफी समय से पार्टी के कुछ फैसलों से नाराज चल रहे थे और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

अब देखना यह होगा कि संदीप पाठक के जाने के बाद पंजाब में आम आदमी पार्टी का जमीनी स्तर पर क्या हाल होता है।

सुरक्षा का राजनीतिकरण

भारत की राजनीति में सुरक्षा कवर देना या हटाना अक्सर एक राजनीतिक हथियार के रूप में देखा जाता रहा है और यहाँ भी वही दिख रहा है।

जब कोई नेता सत्ताधारी दल के खिलाफ जाता है, तो अक्सर उसकी सुरक्षा कम कर दी जाती है, जिसे दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है।

हरभजन सिंह के मामले में मान सरकार का तर्क था कि अब वे पार्टी में नहीं हैं, इसलिए उन्हें राज्य की विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है।

वहीं, केंद्र सरकार ने इसे सांसद की जान पर खतरा बताते हुए सीआरपीएफ तैनात कर दी, जो सीधे तौर पर राज्य सरकार को एक कड़ा संदेश है।

इस सुरक्षा युद्ध ने पंजाब पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बीच के समन्वय पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की आहट

पंजाब में अगले साल यानी 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इस दलबदल को उसी की तैयारियों के रूप में देखा जा रहा है।

आम आदमी पार्टी के लिए यह समय बहुत कठिन है क्योंकि उसे एक तरफ अपनी सरकार बचानी है और दूसरी तरफ संगठन को टूटने से रोकना है।

सांसदों के इस पलायन ने विपक्षी दलों जैसे शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस को भी हमला करने का एक नया मौका दे दिया है।

विपक्ष का कहना है कि जो पार्टी अपने सांसदों को संभाल नहीं सकती, वह पंजाब के भविष्य को क्या संभालेगी और कैसे विकास करेगी।

आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में और भी कई बड़े नाम पाला बदलते हुए देखे जा सकते हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प होगा।

हरभजन सिंह का राजनीतिक सफर

हरभजन सिंह ने क्रिकेट के मैदान पर अपनी फिरकी से दुनिया भर के बल्लेबाजों को नचाया, लेकिन राजनीति की पिच उनके लिए अलग साबित हो रही है।

उन्हें आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा भेजकर एक बड़ी जिम्मेदारी दी थी, ताकि वे युवाओं और खेल जगत के मुद्दों को उठा सकें।

हालांकि, पिछले कुछ समय से वे पार्टी की सक्रिय राजनीति से दूर नजर आ रहे थे और उनके भाजपा के करीब होने की चर्चाएं आम थीं।

अब जब वे आधिकारिक तौर पर पार्टी छोड़ चुके हैं, तो उनके सामने अपनी राजनीतिक साख को बचाए रखने की एक बड़ी चुनौती होगी।

जालंधर और आसपास के इलाकों में उनकी अच्छी पकड़ है, जिसका फायदा वे अपने नए राजनीतिक सफर में उठाना चाहेंगे।

कार्यकर्ताओं में रोष और नाराजगी

सांसदों के इस कदम से आम आदमी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी गुस्सा देखा जा रहा है, जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

पंजाब के विभिन्न हिस्सों में कार्यकर्ताओं ने इन सांसदों के पुतले फूंके और उन्हें अवसरवादी करार दिया है।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्होंने साथ छोड़ दिया और विपक्षी खेमे में शामिल हो गए।

यह नाराजगी आने वाले समय में चुनाव प्रचार के दौरान इन सांसदों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।

पार्टी नेतृत्व अब नए चेहरों को आगे लाने की योजना बना रहा है ताकि कार्यकर्ताओं के मनोबल को फिर से बढ़ाया जा सके।

स्वाति मालीवाल का रुख और विवाद

स्वाति मालीवाल का पार्टी छोड़ना भी काफी चर्चा में है, खासकर विभव कुमार मामले के बाद उनकी दूरियां पार्टी से बढ़ गई थीं।

मालीवाल ने भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं और कहा है कि अब वहां महिलाओं का सम्मान नहीं रह गया है।

उनके इस्तीफे ने आम आदमी पार्टी के महिला वोट बैंक पर भी असर डालने की संभावना पैदा कर दी है, जो पार्टी का एक मजबूत स्तंभ रहा है।

विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं और आम आदमी पार्टी को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह देखना दिलचस्प होगा कि स्वाति मालीवाल का अगला राजनीतिक कदम क्या होता है और वे किस दल का दामन थामती हैं।

अशोक मित्तल और राजिंदर गुप्ता की भूमिका

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर अशोक मित्तल और दिग्गज कारोबारी राजिंदर गुप्ता का जाना पार्टी के लिए आर्थिक और बौद्धिक नुकसान है।

ये दोनों ही सांसद पार्टी के लिए पंजाब के औद्योगिक और शैक्षिक क्षेत्रों में एक सेतु का काम करते थे।

उनके जाने से राज्य के व्यापारिक वर्ग के बीच आम आदमी पार्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है, जो पहले से ही कुछ नीतियों से असंतुष्ट हैं।

भाजपा इन दिग्गजों के जरिए पंजाब के शहरी और व्यापारिक समुदायों को अपनी ओर आकर्षित करने की योजना बना रही है।

इन सांसदों ने अपने इस्तीफे में पार्टी की कार्यप्रणाली को ही मुख्य कारण बताया है, जो नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

हरभजन सिंह को सीआरपीएफ सुरक्षा मिलना और सात सांसदों का इस्तीफा पंजाब की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

यह घटनाक्रम न केवल आम आदमी पार्टी की मजबूती को परखने वाला है, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच के तनाव को भी दर्शाता है।

अगर पार्टी इस संकट से उबरने में नाकाम रहती है, तो 2027 के चुनाव में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

फिलहाल, पंजाब की जनता इस पूरे घटनाक्रम को देख रही है और आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा कि 'गद्दार' और 'वफादार' की इस जंग में जीत किसकी होती है।

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