जयपुर। राजस्थान सरकार ने 1993 बैच के वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल को एपीओ यानी आगामी पदस्थापन आदेशों की प्रतीक्षा में कर दिया है। कार्मिक विभाग की ओर से 28 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में इस कार्रवाई के पीछे प्रशासनिक कारण बताए गए हैं। आदेश पर कार्मिक (क-1) विभाग के संयुक्त शासन सचिव डॉ. धीरज कुमार सिंह के हस्ताक्षर हैं।
शिखर अग्रवाल पूर्व में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके हैं। एपीओ किए जाने से पहले वे प्रदेश के उद्योग, निवेश और औद्योगिक विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण विभागों तथा संस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
यह आदेश ऐसे समय जारी हुआ है, जब शिखर अग्रवाल, उनकी IPS पत्नी डॉ. प्रशाखा माथुर और परिवार के सदस्यों के नाम उदयपुर तथा अलवर के रिसॉर्ट प्रोजेक्ट्स में 40 विला और कॉटेज खरीदने के मामले पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, एपीओ आदेश में संपत्ति विवाद का कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए दोनों घटनाक्रमों के बीच आधिकारिक संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।
कई महत्वपूर्ण आर्थिक विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे
एपीओ किए जाने से पहले शिखर अग्रवाल के पास उद्योग, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, राजकीय उपक्रम और दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर के अतिरिक्त मुख्य सचिव की जिम्मेदारी थी। वे निवेश एवं प्रवासी राजस्थानी कार्य विभाग और निवेश संवर्धन ब्यूरो से जुड़े दायित्व भी संभाल रहे थे।
इसके अतिरिक्त वे राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम यानी RIICO के चेयरपर्सन, राजस्थान लघु उद्योग निगम यानी RAJSICO के चेयरपर्सन एवं प्रबंध निदेशक तथा भिवाड़ी इंटीग्रेटेड विकास प्राधिकरण के विशेषाधिकारी भी थे।
शिखर अग्रवाल फरवरी 2024 से नवंबर 2025 तक मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे। नवंबर 2025 में हुए प्रशासनिक फेरबदल के बाद उन्हें उद्योग, निवेश और RIICO जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी गई थी।
कार्मिक विभाग के 28 अक्टूबर के आदेश में उनके निलंबन, आरोपपत्र या किसी जांच एजेंसी को प्रकरण सौंपने का उल्लेख नहीं है। महत्वपूर्ण विभागों का अतिरिक्त प्रभार किस अधिकारी को दिया जाएगा, इसकी जानकारी भी आदेश में स्पष्ट नहीं की गई है।
क्या है 40 विला-कॉटेज की खरीद का मामला?
मीडिया रिपोर्टों और सामने आए संपत्ति संबंधी दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि शिखर अग्रवाल, उनकी पत्नी डॉ. प्रशाखा माथुर और परिवार के सदस्यों ने करीब ढाई साल के दौरान गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से कुल 40 विला और कॉटेज खरीदे। ये संपत्तियां कंपनी के अनंता रिसॉर्ट परिसरों से जुड़ी बताई गई हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, उदयपुर के बुझड़ा स्थित रिसॉर्ट प्रोजेक्ट में 20 कॉटेज खरीदे गए। इनका पंजीकरण सितंबर 2023 में हुआ था। अलवर जिले के अजबगढ़ स्थित प्रोजेक्ट में 20 विला खरीदे गए, जिनका पंजीकरण मार्च 2026 में हुआ।
सभी 40 इकाइयों की कुल खरीद राशि 6 करोड़ 16 लाख 50 हजार रुपये बताई गई है। दावा है कि संपत्तियों को खरीदने के बाद उसी विक्रेता कंपनी को सालाना 1 करोड़ 80 लाख रुपये की कुल लीज राशि पर वापस दे दिया गया।
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संपत्ति खरीदने के बाद उसे विक्रेता या संचालन करने वाली कंपनी को वापस किराए पर देने की ऐसी व्यवस्था को लीज-बैक मॉडल कहा जाता है। लीज-बैक व्यवस्था अपने आप में गैरकानूनी नहीं होती, लेकिन इस मामले में खरीद मूल्य और कथित सालाना लीज राशि के अनुपात को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
thinQ360 का वित्तीय विश्लेषण: करीब 29.2 प्रतिशत का सकल अनुपात
उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर 6.165 करोड़ रुपये की कुल खरीद राशि पर 1.80 करोड़ रुपये सालाना लीज मिलने का दावा सही माना जाए तो सकल लीज अनुपात करीब 29.2 प्रतिशत बैठता है।
इसी राशि का भुगतान लगातार होता रहे तो कर, स्टांप शुल्क, रखरखाव और अन्य खर्चों को शामिल किए बिना खरीद राशि करीब 3.43 वर्ष में वापस आ सकती है। यह केवल उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित गणितीय आकलन है। वास्तविक लाभ लीज अनुबंध की अवधि, भुगतान की शर्तों, कर, खर्च और अन्य वित्तीय दायित्वों पर निर्भर करेगा।
इस अनुपात के कारण यह सवाल उठ रहा है कि संपत्तियों का खरीद मूल्य किस आधार पर निर्धारित किया गया और क्या उसी प्रोजेक्ट के अन्य खरीदारों को भी समान खरीद मूल्य तथा लीज प्रस्ताव दिया गया था। इन सवालों की वास्तविकता संबंधित बिक्री विलेख, लीज अनुबंध, भुगतान रिकॉर्ड और तुलनात्मक बाजार मूल्य की जांच से ही स्पष्ट हो सकती है।
IPR में विवरण और समयक्रम को लेकर सवाल
अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को नियमानुसार अचल संपत्ति विवरण यानी Immovable Property Return दाखिल करना होता है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि शिखर अग्रवाल और डॉ. प्रशाखा माथुर के नाम कुल 28 विला-कॉटेज हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड में शिखर अग्रवाल के विवरण में 14 इकाइयों का उल्लेख बताया गया है, जबकि डॉ. प्रशाखा माथुर के प्रदर्शित विवरण में संबंधित संपत्तियों की जानकारी नहीं दिखने का दावा किया गया है।
हालांकि, इस मामले में संपत्तियों की खरीद का समयक्रम भी महत्वपूर्ण है। जनवरी 2026 में दाखिल किया गया वार्षिक संपत्ति विवरण 31 दिसंबर 2025 तक की स्थिति से संबंधित होगा, जबकि अजबगढ़ की 20 संपत्तियों का पंजीकरण मार्च 2026 में होने की बात कही गई है। इसलिए सितंबर 2023 और मार्च 2026 में हुई खरीद का अलग-अलग मिलान करना आवश्यक होगा।
यह भी देखा जाना होगा कि संबंधित अधिकारियों ने संपत्ति खरीदने से पहले या बाद में सक्षम विभाग को नियमानुसार सूचना दी थी या नहीं। केवल सार्वजनिक पोर्टल पर प्रदर्शित विवरण के आधार पर सेवा नियमों के उल्लंघन का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
शिखर अग्रवाल ने लेनदेन को बताया वैध
विवाद सामने आने के बाद शिखर अग्रवाल की ओर से कहा गया कि संपत्तियों से जुड़े सभी लेनदेन वैध हैं और उनकी जानकारी नियमानुसार अचल संपत्ति विवरण तथा आयकर रिटर्न में दी गई है।
पत्नी के संपत्ति विवरण में जानकारी नहीं दिखने के सवाल पर उनका कहना है कि दस्तावेज तकनीकी रूप से गलत स्थान पर संलग्न होने के कारण संबंधित विवरण दूसरी जगह प्रदर्शित हो रहा है। परिवार के अन्य सदस्यों के नाम संपत्तियों की खरीद पर उन्होंने कहा कि वयस्क बच्चों ने अपने स्तर पर संपत्तियां खरीदी हैं।
हितों के टकराव का सवाल
प्रकरण में हितों के संभावित टकराव को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। संबंधित अवधि के दौरान शिखर अग्रवाल वन एवं पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव और बाद में उद्योग तथा RIICO से जुड़े शीर्ष पदों पर रहे।
यदि सरकार औपचारिक जांच का निर्णय लेती है तो यह जांच का विषय हो सकता है कि विक्रेता कंपनी या उससे जुड़े किसी समूह की भूमि, पर्यावरण स्वीकृति, औद्योगिक प्रोत्साहन अथवा अन्य सरकारी प्रकरण में संबंधित अधिकारी की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका रही या नहीं। फिलहाल ऐसी किसी भूमिका या नियम उल्लंघन की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
विपक्ष ने की स्वतंत्र जांच की मांग
संपत्ति विवाद और एपीओ आदेश के बाद प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास सहित कांग्रेस नेताओं ने मामले में श्वेतपत्र जारी करने और स्वतंत्र एजेंसी से उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि संबंधित अधिकारी दंपती तथ्यों पर अपना जवाब देने में सक्षम हैं। राज्य सरकार की ओर से फिलहाल किसी औपचारिक जांच की घोषणा किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।
अब सरकार के अगले कदम पर नजर
शिखर अग्रवाल को एपीओ किए जाने के बाद उद्योग, निवेश, RIICO और BIP जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए नए अधिकारी को जिम्मेदारी देने की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि सरकार संपत्ति प्रकरण में किसी औपचारिक जांच का निर्णय लेती है या मामला प्रशासनिक पदस्थापन तक सीमित रहता है।
नोट: संपत्ति की खरीद, लीज राशि, संपत्ति विवरण और हितों के संभावित टकराव से संबंधित कई बिंदु मीडिया रिपोर्टों, सामने आए दस्तावेजों और राजनीतिक आरोपों पर आधारित हैं। एपीओ किया जाना निलंबन या दोष सिद्धि नहीं है। संबंधित अधिकारी ने लेनदेन को वैध बताया है। किसी नियम उल्लंघन या आपराधिक जिम्मेदारी का निष्कर्ष सक्षम जांच और आधिकारिक प्रक्रिया के बाद ही निकाला जा सकता है।