नई दिल्ली | केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के बुनियादी ढांचे और कृषि क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी विकास की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी बायो-बिटुमेन तकनीक के माध्यम से फसल अवशेषों को मूल्यवान संसाधन में बदलना भारत के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
डॉ. सिंह के अनुसार, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने से देश को सालाना लगभग 40,000 करोड़ रुपये के आयात खर्च की बचत हो सकती है। यह कदम न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मील का पत्थर है।
बायो-बिटुमेन: ₹40,000 करोड़ की बचत: फसल अवशेषों से बनेगा बायो-बिटुमेन: भारत बचाएगा सालाना ₹40,000 करोड़ का विदेशी मुद्रा भंडार, डॉ. जितेंद्र सिंह ने दी जानकारी
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने घोषणा की कि स्वदेशी बायो-बिटुमेन तकनीक के माध्यम से फसल अवशेषों को सड़क निर्माण सामग्री में बदलकर भारत सालाना ₹40,000 करोड़ की बचत कर सकता है।
HIGHLIGHTS
- भारत में प्रतिवर्ष लगभग छह करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं, जिन्हें अब बायो-बिटुमेन में बदला जा सकेगा।
- बायो-बिटुमेन तकनीक से भारत को सालाना लगभग 40,000 करोड़ रुपये के आयात बिल में बचत होने का अनुमान है।
- यह तकनीक सीएसआईआर-सीआरआरआई और सीएसआईआर-आईआईपी द्वारा संयुक्त रूप से स्वदेशी रूप से विकसित की गई है।
- बायो-बिटुमेन पारंपरिक बिटुमेन की 30 प्रतिशत तक जगह ले सकता है, जिससे सड़क निर्माण की लागत और कार्बन उत्सर्जन कम होगा।
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स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भर भारत
यह तकनीक नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) और देहरादून स्थित सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) के साझा प्रयासों का परिणाम है। यह पूरी तरह से 'मेक इन इंडिया' की भावना के अनुरूप विकसित की गई है।
डॉ. सिंह ने बताया कि पारंपरिक बिटुमेन, जो मुख्य रूप से पेट्रोलियम आधारित होता है, के स्थान पर बायो-बिटुमेन का आंशिक उपयोग आयात पर हमारी निर्भरता को काफी हद तक कम कर देगा। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में होने वाले व्यवधानों से हमारा बुनियादी ढांचा क्षेत्र सुरक्षित रहेगा।
यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि आर्थिक लचीलापन बढ़ाना और विदेशी मुद्रा भंडार की बचत करना वर्तमान सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में से एक है।
अपशिष्ट से धन: एक नया आर्थिक मॉडल
मंत्री महोदय ने 'अपशिष्ट से धन' (Waste to Wealth) के मंत्र पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिक नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्था में कचरा जैसी कोई चीज नहीं होती। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से हर संसाधन को मूल्यवान बनाया जा सकता है।
भारत में प्रतिवर्ष लगभग छह करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं। वर्तमान में, इनमें से एक बड़ा हिस्सा किसानों द्वारा जला दिया जाता है, जिससे उत्तर भारत में विशेष रूप से सर्दियों के दौरान गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।
बायो-बिटुमेन तकनीक इस कृषि अपशिष्ट को एक औद्योगिक कच्चे माल में बदल देती है। धान की भूसी और गेहूं के डंठल जैसे अवशेष अब किसानों के लिए बोझ नहीं, बल्कि आय का एक अतिरिक्त स्रोत बनेंगे।
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आयात निर्भरता और आर्थिक आंकड़े
वर्तमान में भारत की बिटुमेन की वार्षिक आवश्यकता लगभग 88 लाख टन है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस आवश्यकता का लगभग 50 से 58 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है।
इस आयात पर देश को प्रतिवर्ष 25,000 से 30,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि बायो-बिटुमेन तकनीक न केवल इस खर्च को बचाएगी, बल्कि संबंधित लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण लागतों को जोड़कर यह बचत 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
यह तकनीक सड़क निर्माण के लिए एक टिकाऊ और सस्ता विकल्प प्रदान करती है। इससे न केवल सड़कों की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि निर्माण की कुल लागत में भी कमी आने की संभावना है।
तकनीकी प्रक्रिया और इसकी विशेषताएं
बायो-बिटुमेन बनाने के लिए 'लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास' का उपयोग किया जाता है। इसमें थर्मोकेमिकल प्रक्रिया, जिसे पायरोलिसिस कहा जाता है, के माध्यम से कृषि अवशेषों को एक नवीकरणीय बाइंडर में बदला जाता है।
परीक्षणों से पता चला है कि यह बायो-बाइंडर पारंपरिक बिटुमेन की 30 प्रतिशत तक जगह ले सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके उपयोग से सड़क के प्रदर्शन या स्थायित्व में कोई कमी नहीं आती है।
इसके विपरीत, बायो-बिटुमेन से बनी सड़कों ने बेहतर लचीलापन और कार्बन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी दिखाई है। यह तकनीक नेट ज़ीरो उत्सर्जन के भारत के वैश्विक संकल्प को पूरा करने में भी सहायक सिद्ध होगी।
कृषि और पर्यावरण पर प्रभाव
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस पहल की सराहना की। उन्होंने इसे कृषि, विज्ञान और उद्योग का एक ऐतिहासिक संगम करार दिया।
चौहान ने कहा कि यह तकनीक पराली जलाने की समस्या का एक व्यावहारिक समाधान है। जब किसानों को अपने फसल अवशेषों का उचित मूल्य मिलेगा, तो वे उन्हें जलाने के बजाय आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनाना पसंद करेंगे।
इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। फसल अवशेषों के एकत्रीकरण, प्रसंस्करण और परिवहन के लिए एक नया पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी का महत्व
डॉ. जितेंद्र सिंह ने नवाचार को गति देने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला से जमीन तक तकनीक पहुंचाने के लिए उद्योगों की भागीदारी अनिवार्य है।
सीएसआईआर द्वारा आयोजित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का उद्देश्य यही है कि इस स्वदेशी तकनीक को निजी कंपनियों तक पहुंचाया जाए ताकि इसका उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर शुरू हो सके।
मंत्री ने 'वन वीक वन लैब' जैसी पहलों का भी जिक्र किया, जिन्होंने वैज्ञानिक संस्थानों और आम जनता के बीच की दूरी को कम किया है। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे अपनी खोजों को सरल भाषा में हितधारकों तक पहुंचाएं।
भविष्य की राह और विकसित भारत 2047
यह पहल केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। डॉ. सिंह ने बताया कि इसी तरह के नवाचार अन्य क्षेत्रों में भी किए जा रहे हैं, जैसे इस्तेमाल किए गए कुकिंग ऑयल को जैव ईंधन में बदलना और स्टील स्लैग का उपयोग सड़कों में करना।
ये सभी प्रयास एक चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के निर्माण की ओर इशारा करते हैं। भारत अब कचरे को फेंकने के बजाय उसे फिर से उपयोग करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बुनियादी ढांचे में आत्मनिर्भरता अनिवार्य है। बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें सुनिश्चित करती हैं कि हमारा विकास पर्यावरण के अनुकूल और आर्थिक रूप से टिकाऊ हो।
निष्कर्ष
अंत में, डॉ. सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि मंत्रालयों, शोध संस्थानों और उद्योग जगत के बीच यह तालमेल भारत को वैश्विक नवाचार मानचित्र पर अग्रणी बनाएगा।
फसल अवशेषों से बायो-बिटुमेन बनाने की यह यात्रा केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह करोड़ों किसानों के जीवन में सुधार और देश की आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करने का एक माध्यम है।
आने वाले समय में, यह तकनीक भारतीय सड़कों की पहचान बनेगी, जो प्रदूषण मुक्त और आर्थिक रूप से समृद्ध भारत का प्रतीक होगी।
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