नई दिल्ली | भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करते हुए केंद्रीय मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह ने नई दिल्ली में आयोजित 'सीफूड एक्सपोर्टर्स मीट 2026' की अध्यक्षता की। यह बैठक देश के समुद्री खाद्य निर्यात को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए मील का पत्थर साबित होने वाली है।
मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वैश्विक बाजार में भारत की पकड़ को मजबूत करना था। मंत्री महोदय ने स्पष्ट किया कि भारत अब केवल कच्चे माल के निर्यातक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मूल्य-वर्धित उत्पादों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व करेगा।
निर्यात का नया कीर्तिमान और ₹1 लाख करोड़ का लक्ष्य
केंद्रीय मंत्री ने निर्यातकों के अटूट प्रयासों की सराहना करते हुए घोषणा की कि भारत का अगला लक्ष्य ₹1 लाख करोड़ का समुद्री खाद्य निर्यात हासिल करना है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने इस क्षेत्र में निरंतर वृद्धि दर्ज की है।
मंत्री ने निर्यातकों से आग्रह किया कि वे 'ओपन मार्केट' दृष्टिकोण अपनाएं और नए बाजारों की खोज करें। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार और उसकी सभी एजेंसियां निर्यातकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं।
भारत का समुद्री खाद्य निर्यात पिछले 11 वर्षों में असाधारण गति से बढ़ा है। वर्ष 2013-14 में जहां यह आंकड़ा ₹30,213 करोड़ था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर ₹62,408 करोड़ के प्रभावशाली स्तर पर पहुंच गया है। इसमें झींगा (Shrimp) निर्यात का योगदान सबसे अधिक रहा है।
ईईजेड और खुले समुद्र की क्षमता का दोहन
बैठक के दौरान विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई। मंत्री ने कहा कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे क्षेत्रों में टूना जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के निर्यात की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
सरकार अब ईईजेड नियमों को सुव्यवस्थित कर रही है ताकि सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जा सके। एक्सेस पास के माध्यम से इस ढांचे को लागू किया जा रहा है, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलेगा और छोटे मछुआरों को भी वैश्विक बाजार का लाभ मिलेगा।
गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों के लिए निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अंडमान और निकोबार में आयोजित हालिया निवेशक बैठक के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिससे समुद्री केज कल्चर और मोती की खेती जैसे क्षेत्रों में निवेश का प्रवाह बढ़ा है।
गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय अनुपालन
वैश्विक बाजारों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए मंत्री ने कड़े नियामकीय अनुपालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक प्रतिबंधों का पालन और ट्रेसबिलिटी (पता लगाने की क्षमता) प्रणाली को मजबूत करना अनिवार्य है।
निर्यातकों को सलाह दी गई कि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपनी प्रसंस्करण इकाइयों को अपग्रेड करें। उत्पाद की गुणवत्ता और स्वच्छता ही भारतीय समुद्री खाद्य ब्रांड को वैश्विक पहचान दिलाएगी। इसके लिए ईआईसी और एमपीईडीए जैसी संस्थाएं निरंतर तकनीकी सहायता प्रदान करेंगी।
राज्य मंत्री श्री जॉर्ज कुरियन ने भी बैठक को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बजट 2026 के प्रावधानों के अनुरूप मत्स्य क्षेत्र को उच्च मांग वाले क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने निर्यात वृद्धि को बनाए रखने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स और मूल्य श्रृंखला के विकास को आवश्यक बताया।
बाजार विविधीकरण और कूटनीतिक प्रयास
मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि वाणिज्य विभाग और एमपीईडीए के सहयोग से एक केंद्रित बाजार विविधीकरण रणनीति तैयार की गई है। इसके तहत लगभग 40 देशों के राजदूतों के साथ सीधा संवाद किया गया है।
इस कूटनीतिक पहल का उद्देश्य भारतीय समुद्री उत्पादों के लिए नए द्वार खोलना है। सरकार अब 'रेडी-टू-ईट' और 'रेडी-टू-कुक' जैसे मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा दे रही है। विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों और निर्यातकों के बीच सीधा संपर्क स्थापित किया जाएगा।
हितधारकों की चुनौतियां और सरकारी समाधान
बैठक में उपस्थित निर्यातकों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने अपनी चुनौतियों को भी साझा किया। उन्होंने कैच सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाने और अंडमान में समुद्री शैवाल की खेती के लिए परमिट की सुविधा की मांग की।
निर्यातकों ने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं, उच्च अनुपालन लागत और कोल्ड चेन की कमियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। मंत्री ने इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने और उनका त्वरित समाधान निकालने का भरोसा दिलाया।
मछली आहार (Fish Feed) के वैज्ञानिक विकास और उत्पादन विस्तार पर भी चर्चा हुई। पश्चिमी तट पर अंतर्देशीय मत्स्य पालन और समुद्री कृषि की निर्यात क्षमता को मजबूत करने के लिए भी विशेष कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
पीएमएमएसवाई और बुनियादी ढांचे का विकास
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) इस पूरे परिवर्तन की रीढ़ है। इस योजना के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण मछली बीज उत्पादन, खारे पानी की जलीय कृषि का विस्तार और आधुनिक मछली पकड़ने के बंदरगाहों का विकास किया जा रहा है।
सरकार निर्बाध कोल्ड चेन नेटवर्क और आधुनिक फिश लैंडिंग केंद्रों के निर्माण में भारी निवेश कर रही है। इससे फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी, जो वर्तमान में निर्यातकों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
व्यापक भागीदारी और भविष्य की राह
इस महत्वपूर्ण बैठक में एमपीईडीए, एनएफडीबी, नाबार्ड, एनसीडीसी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। इसके अलावा ओडिशा, गुजरात, गोवा और केंद्र शासित प्रदेशों के मत्स्य विभागों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।
सी6 एनर्जी, साशिमी फूड्स और एक्वाग्री प्रोसेसिंग जैसी निजी कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन सभी हितधारकों के बीच समन्वय ही भारत को दुनिया का 'सीफूड हब' बनाने के सपने को साकार करेगा।
अंत में, मंत्री राजीव रंजन सिंह ने दोहराया कि भारत की नीली क्रांति अब वैश्विक स्तर पर अपनी चमक बिखेरने के लिए तैयार है। ₹1 लाख करोड़ का लक्ष्य केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों मछुआरों और निर्यात से जुड़े लोगों के सुनहरे भविष्य का संकल्प है।