तेहरान | दुनिया भर में पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव चल रहा है। अब ईरान की एक नई चाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींद उड़ा दी है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह अब होर्मुज जलडमरूमध्य के बाद स्वेज नहर को जोड़ने वाले एक और अहम रास्ते को बंद कर सकता है। यह रास्ता है 'बाब-अल-मंदेब' जलडमरूमध्य।
ईरान के स्पीकर का वो ट्वीट जिसने मचाया हड़कंप
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर घालिबफ ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा पोस्ट किया है, जिसने कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने अपने ट्वीट में दुनिया से एक कड़ा सवाल पूछा है। घालिबफ ने पूछा कि आखिर इस रास्ते से कितना तेल, गैस, गेहूं और खाद के जहाज गुजरते हैं। उनके इस सवाल को दुनिया भर के विशेषज्ञ एक सीधी चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि ईरान अब इस अहम समुद्री मार्ग को रणनीतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। अगर ऐसा हुआ, तो वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह से चरमरा सकती है।
बाब-अल-मंदेब: दुनिया की आर्थिक नस
बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को दुनिया की 'आर्थिक नस' कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला एक बहुत ही संकरा रास्ता है। यही वह रास्ता है जो जहाजों को स्वेज नहर तक ले जाता है। स्वेज नहर के जरिए ही एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा व्यापारिक मार्ग संभव हो पाता है। दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी (LNG) इसी रास्ते से होकर गुजरती है। अगर ईरान इसे बाधित करता है, तो ऊर्जा संकट गहरा जाएगा।
लाल सागर में पहले से ही है तनाव
लाल सागर का इलाका पिछले कुछ महीनों से युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। यमन के हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है, लगातार जहाजों को निशाना बना रहे हैं। हाल ही में हूतियों ने इजराइल की ओर मिसाइलें भी दागी थीं। हालांकि इन्हें रोक दिया गया, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि यह इलाका कितना असुरक्षित हो चुका है। अब ईरान के सीधे दखल की आशंका ने आग में घी डालने का काम किया है। पश्चिमी देश इस स्थिति पर पैनी नजर रख रहे हैं और अपनी नौसेना को अलर्ट पर रखा है।
महंगाई का नया तूफान आने की आशंका
अगर बाब-अल-मंदेब का रास्ता बंद होता है या वहां खतरा बढ़ता है, तो जहाजों को अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' से होकर गुजरना पड़ेगा। यह रास्ता बहुत लंबा है। लंबे रास्ते का मतलब है जहाजों का ज्यादा ईंधन खर्च होना और सामान पहुंचने में देरी होना। इससे माल ढुलाई की लागत कई गुना बढ़ जाएगी, जिसका सीधा असर सामान की कीमतों पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल तेल और गैस महंगी होगी, बल्कि गेहूं और खाद जैसी जरूरी चीजों की किल्लत भी हो सकती है। आम आदमी की जेब पर इसका भारी बोझ पड़ेगा।
भारत पर क्या होगा इसका असर?
भारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल इसी क्षेत्र के आसपास से आयात करता है। इसके अलावा, भारत से यूरोप जाने वाला निर्यात भी इसी रास्ते पर निर्भर है। अगर सप्लाई चेन बाधित होती है, तो भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, भारत में चल रहे कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, जैसे एक्सप्रेसवे और हाईवे का काम भी प्रभावित हो सकता है क्योंकि इनके लिए जरूरी कच्चे माल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
रणनीतिक दबाव की राजनीति
ईरान का यह कदम उसकी पुरानी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ईरान अक्सर पश्चिमी देशों और इजराइल पर दबाव बनाने के लिए समुद्री रास्तों को हथियार बनाता रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान पहले ही कई बार धमकियां दे चुका है। अब बाब-अल-मंदेब को इसमें शामिल करना उसकी आक्रामक विदेश नीति का नया अध्याय है। दुनिया के बड़े देशों को अब यह सोचना होगा कि वे इस समुद्री दादागिरी को कैसे रोकते हैं। अगर कूटनीति फेल हुई, तो दुनिया एक बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ सकती है।
निष्कर्ष: क्या टल पाएगा यह संकट?
फिलहाल स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। ईरान के स्पीकर का बयान केवल एक ट्वीट नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लग रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। क्या बातचीत से कोई रास्ता निकलेगा या समंदर में जंग के बादल और गहरे होंगे? दुनिया भर के बाजार इस समय डरे हुए हैं। हर किसी की नजर अब लाल सागर और ईरान की अगली चाल पर टिकी है। शांति और सुरक्षा ही वैश्विक व्यापार को बचाने का एकमात्र रास्ता है।