नई दिल्ली | कई मकान मालिक यह मानकर चलते हैं कि अगर उनकी कमाई का जरिया सिर्फ किराया है, तो उन्हें इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन यह एक बड़ी गलतफहमी है जो भविष्य में जुर्माने और टैक्स नोटिस का कारण बन सकती है।
किराए की आय पर टैक्स की गणना
आयकर विभाग यह नहीं देखता कि आपकी आय कितने स्रोतों से आ रही है, बल्कि यह देखता है कि आपकी कुल आय टैक्स छूट की सीमा से अधिक है या नहीं।
अगर आपकी एकमात्र आय किराये से है, तब भी आपको ITR फाइल करना होगा। यदि आपकी कुल आय मूल छूट सीमा से अधिक है तो रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है।
हालांकि, टैक्स की गणना सीधे पूरी किराये की राशि पर नहीं होती है। सबसे पहले, इसमें से नगर निगम को चुकाए गए टैक्स को घटाया जाता है।
कटौती के नियम
इसके बाद बची हुई रकम पर मरम्मत और रखरखाव के लिए 30 प्रतिशत की एकमुश्त मानक कटौती (Standard Deduction) मिलती है।
इसके अलावा, अगर मकान होम लोन लेकर खरीदा गया है, तो इनकम टैक्स के सेक्शन 24(b) के तहत चुकाए गए ब्याज पर भी छूट का दावा किया जा सकता है। इन सभी कटौतियों के बाद बची हुई राशि पर ही आपकी टैक्स देनदारी बनती है।
नई और पुरानी टैक्स व्यवस्था
नई टैक्स व्यवस्था में 3 लाख रुपए और पुरानी व्यवस्था में 2.5 लाख रुपए की सालाना आय सीमा पार करने पर रिटर्न भरना अनिवार्य है।
BDO इंडिया में पार्टनर दीपाश्री शेट्टी ने बताया कि दोनों व्यवस्थाओं में सिर्फ छूट की सीमा का ही अंतर नहीं है।
पुरानी व्यवस्था में प्रॉपर्टी से हुए नुकसान को दूसरी आमदनी से समायोजित (Set Off) किया जा सकता है, जबकि नई व्यवस्था में यह सुविधा नहीं मिलती।
इसलिए, करदाताओं को केवल छूट की सीमा देखने के बजाय अपनी पूरी वित्तीय स्थिति का विश्लेषण करके ही किसी एक व्यवस्था को चुनना चाहिए।
सही ITR फॉर्म का चुनाव
सही फॉर्म का चुनाव करना भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति की आय केवल एक प्रॉपर्टी से है और कुल आय 50 लाख रुपए से कम है, तो उसे ITR-1 (सहज) फॉर्म भरना चाहिए।
लेकिन, यदि आय का स्रोत दो या दो से अधिक प्रॉपर्टीज हैं, तो उसे ITR-2 फॉर्म का उपयोग करना होगा। इन दोनों ही फॉर्म को भरने की अंतिम तिथि 31 जुलाई, 2026 है।
संक्षेप में, यदि आपकी किराये से आमदनी होती है, तो टैक्स नियमों को समझना और समय पर ITR फाइल करना आपको किसी भी कानूनी परेशानी से बचा सकता है।
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