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राम का अवतार: धर्म की स्थापना: श्रीराम का अवतार रावण-वध के लिए नहीं, धर्म स्थापना के लिए हुआ

गणपत सिंह मांडोली · 14 अगस्त 2026, 06:25 शाम
जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भगवान श्रीराम का अवतार केवल रावण-वध के लिए नहीं, बल्कि धर्म और आदर्श की स्थापना के लिए हुआ। उनका जीवन धर्म की पाठशाला है।

रेवदर |अर्बुदारण्य की पुण्यभूमि पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ के तहत चातुर्मास प्रवचनमाला जारी है। धर्माचार्य मण्डपम् स्थित सत्संग मण्डप में आयोजित दैनिक धर्मसभा में जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने ‘राम के आदर्श’ विषय पर महत्वपूर्ण प्रवचन दिया।

श्रीराम का अवतार: धर्म और आदर्श की स्थापना

जगद्गुरु शंकराचार्य ने भगवान श्रीराम के अवतार के आध्यात्मिक प्रयोजन को विस्तार से समझाते हुए कहा कि उनका अवतार केवल रावण-वध या अधर्म के विनाश तक सीमित नहीं था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान का अवतरण संसार को धर्म, आचरण और एक आदर्श जीवन का शिक्षण देने के लिए हुआ था।

धर्म को जीकर दिखाया

शंकराचार्य जी ने कहा कि भगवान ने केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपने सम्पूर्ण जीवन में धर्म को जीकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा, "पिता के वचन की मर्यादा, भ्रातृप्रेम, प्रजारक्षण, त्याग और राजधर्म—श्रीराम के जीवन का प्रत्येक प्रसंग धर्माचरण की जीवंत पाठशाला है।"

भगवान स्वयं मर्यादा का आचरण कर यह संदेश देते हैं कि धर्म केवल कहने या सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में धारण करने और आचरण करने का तत्त्व है।

अज्ञान के आवरण से मुक्ति

जगद्गुरु ने माया की दो प्रमुख शक्तियों, आवरण और विक्षेप, का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन्हीं शक्तियों के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर संसार के प्रपंच में दुःख का अनुभव करता है।

उन्होंने कहा कि भगवान जीव को इसी अज्ञान से मुक्त कर उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराने के लिए अवतरित होते हैं। भगवान का अवतार जीव के जीवन में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने का एक सशक्त माध्यम है।

धर्म की पुनः प्रतिष्ठा

जगद्गुरु ने आगे कहा कि जब मनुष्य शास्त्रविहित धर्म के स्वरूप और उसके आचरण को भूल जाता है, तब भगवान स्वयं अपने दिव्य चरित्र के माध्यम से धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करते हैं। श्रीराम का जीवन इसी धर्मतत्त्व की साकार अभिव्यक्ति है।

अद्वैत का सच्चा अर्थ

अद्वैत दर्शन पर प्रकाश डालते हुए जगद्गुरु ने कहा कि अभिमान का वास्तविक नाश तभी होता है, जब यह ज्ञान हो जाए कि परमात्मा से वास्तव में कुछ भी भिन्न नहीं है।

उन्होंने समझाया, "अद्वैत का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि भेदबुद्धि के अज्ञान का निवारण है।" भगवान का अवतार जीव को इसी आत्मज्ञान की दिशा में प्रेरित करता है।

सच्चिदानंद स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि केवल शब्द के बाह्य अर्थ से भगवान के स्वरूप को समझना संभव नहीं है। तत्त्व को समझने के लिए शास्त्रीय विवेक और लक्ष्यार्थ की शरण आवश्यक है।

चिंतन की दिशा: विषय या भगवान?

प्रवचन के दौरान “ध्यायतो विषयान् पुंसः” का संदर्भ देते हुए जगद्गुरु ने कहा कि विषयों का निरंतर चिंतन मनुष्य को आसक्ति और पतन की ओर ले जाता है।

इसके विपरीत, भगवान के स्वरूप का चिंतन जीवन को ज्ञान और शांति की दिशा प्रदान करता है।

उन्होंने एक सुंदर उपमा देते हुए कहा, "जैसे कमल के पुष्प से जलाशय की शोभा बढ़ती है, वैसे ही भगवान के अवतार से संसार की शोभा बढ़ती है और मानव जीवन को धर्म एवं मर्यादा का प्रकाश मिलता है।"

हर युग के लिए आदर्श

जगद्गुरु ने इस बात पर जोर दिया कि श्रीराम का आदर्श केवल त्रेतायुग तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक युग के मनुष्य के लिए जीवन का मार्गदर्शक है।

उन्होंने कहा कि राम के चरित्र में धर्म, मर्यादा, त्याग, कर्तव्य, करुणा और आत्मसंयम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

अंत में, उन्होंने कहा कि राम जन्मोत्सव का वास्तविक संदेश केवल भगवान के जन्म का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना है। इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्ति और हजारों गोभक्त उपस्थित रहे।

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