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धर्माचरण ही सच्चा मार्ग: रामकथा से रामराज्य: धर्माचरण ही सच्चा मार्ग- शंकराचार्य

गणपत सिंह मांडोली · 16 अगस्त 2026, 07:06 शाम
रेवदर के नंदगांव में आयोजित महोत्सव में जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि धर्माचरण ही रामराज्य की स्थापना का सच्चा मार्ग है। जिस हृदय में धर्म प्रतिष्ठित है, वहीं श्रीराम का राज्य है।

रेवदर |अर्बुदारण्य की पावन धरा पर श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह महोत्सव परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराजश्री की पावन प्रेरणा से आयोजित किया जा रहा है, जिसमें प्रतिदिन धर्माचार्य मण्डपम् स्थित सत्संग मण्डप में धर्मसभा का आयोजन होता है।

रामकथा का आध्यात्मिक विवेचन

रामजन्मोत्सव के पश्चात चल रही रामकथा के प्रसंग में, जगद्गुरु शंकराचार्य ने भगवान श्रीराम के अवतार के आध्यात्मिक प्रयोजन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने धर्माचरण, आत्मकल्याण, रामराज्य की संकल्पना और दान की शास्त्रीय मर्यादा तक का एक प्रभावशाली विवेचन प्रस्तुत किया, जिसने उपस्थित भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

भगवान के अवतार का उद्देश्य

जगद्गुरु ने समझाया कि भगवान का अवतार केवल किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा अनेक प्रयोजनों से अवतरित होते हैं, जिनमें जीव का कल्याण, धर्म की प्रतिष्ठा और संसार को एक आदर्श जीवन का मार्ग दिखाना प्रमुख है।

उन्होंने आगे कहा कि अजन्मा, निराकार और निर्गुण परमब्रह्म भी भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर माता कौशल्या की गोद में बालरूप धारण करते हैं। परमात्मा नाम और रूप से परे होते हुए भी लोककल्याण के लिए ही नाम और रूप धारण करते हैं।

धर्माचरण: जीवन का वास्तविक गौरव

मनुष्य जीवन के महत्व पर जोर देते हुए जगद्गुरु ने कहा कि यह जीवन हमें शास्त्रविहित धर्म के आचरण और अधर्म के त्याग के लिए मिला है। उन्होंने कहा कि शास्त्र की आज्ञा और निषेध को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन के रूप में स्वीकार करना चाहिए। उनके अनुसार, धर्म का पालन ही मनुष्य को उसके वास्तविक गौरव और पहचान तक पहुंचाता है।

रामराज्य की सच्ची संकल्पना

रामराज्य की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि रामराज्य केवल एक बाहरी शासन व्यवस्था का नाम नहीं है।

वास्तविक रामराज्य तब स्थापित होता है जब मनुष्य की बुद्धि, मन, ज्ञानेन्द्रियां और कर्मेन्द्रियां धर्म के अनुशासन में आ जाती हैं। जब जीवन सद्गुणों से संपन्न हो जाता है, तब व्यक्ति के भीतर ही रामराज्य की स्थापना होती है। उन्होंने जोर देकर कहा, “जिस हृदय में धर्म प्रतिष्ठित है, वहीं श्रीराम का राज्य है।”

रामकथा का वास्तविक प्रयोजन

संत-महापुरुषों के जीवन की विशेषताओं का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि यह संसार गुण और दोष दोनों से युक्त है। उन्होंने “जड़ चेतन गुण दोषमय, विश्व कीन्ह करतार” की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि संत एक हंस की भांति दोषों को त्यागकर केवल गुणों को ही ग्रहण करते हैं।

उन्होंने समझाया कि रामकथा का उद्देश्य केवल कथा सुनकर भाव-विभोर हो जाना नहीं है। इसका वास्तविक प्रयोजन जीवन में विवेक को जागृत करना, अपने दोषों का त्याग करना और सद्गुणों को अपने आचरण में अपनाना है।

दान की शास्त्रीय मर्यादा

दान के महत्व और उसकी मर्यादा पर प्रकाश डालते हुए जगद्गुरु ने कहा कि दया का भाव सर्वत्र रखा जा सकता है, लेकिन दान केवल सुपात्र को ही दिया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भूमि, गो अथवा अन्य किसी भी वस्तु का दान करते समय देश, काल और पात्र का विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भगवद्गीता के श्लोक “देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बिना विचार के किया गया दान अपेक्षित फल देने के स्थान पर अनर्थ का कारण भी बन सकता है।

आचरण में उतारें श्रीराम के आदर्श

अंत में, उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के चरित्र को सुनना और पढ़ना तभी सार्थक है, जब हम उनके द्वारा स्थापित धर्म, मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और लोककल्याण के आदर्शों को अपने आचरण में उतारें। उन्होंने कहा कि यही रामकथा का वास्तविक प्रयोजन है और इसी से रामराज्य की स्थापना का सच्चा मार्ग प्रशस्त होता है।

इस धर्मसभा के अवसर पर ऋषिचैतन्यजी महाराज, चेतननाथजी महाराज, श्रीराम कथा मनोरथी केवलाजी कस्तुराजी पुरोहित पालड़ी, प्रवीणजी सांवताजी पुरोहित पालड़ी, देवाराम जागरवाल, रघुनाथसिंह राजपुरोहित, रामचन्द्र नेहरा, बलवंतराज अणखोल, सीईओ आलोक सिंहल, भरतसिंह बसंत, देवाराम डिगारी, हरजीभाई मोदी, और मूलाराम पुरोहित सहित हजारों की संख्या में गोभक्त उपस्थित रहे।

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