जयपुर | सरकारी सिस्टम में सुस्ती और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति किस हद तक हावी हो सकती है, इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण राजस्थान की राजधानी जयपुर में देखने को मिला है। हरमाड़ा क्षेत्र में एक खराब हाई मास्ट लाइट को ठीक कराने के लिए फाइल को 83 बार एक मेज से दूसरी मेज पर भेजा गया। यह मामला केवल एक लाइट खराब होने का नहीं, बल्कि सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी और काम टालने की मानसिकता को दर्शाता है।
सिस्टम की सुस्ती का बड़ा उदाहरण
इस दौरान करीब 22 बार तो शिकायत जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और नगर निगम के बीच ही झूलती रही। बाकी समय यह शिकायत स्वायत्त शासन विभाग से लेकर निगम और जेडीए की विद्युत शाखाओं के चक्कर लगाती रही। अंततः जब मामला मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक पहुंचा, तब जाकर तंत्र हरकत में आया और समस्या का समाधान हुआ।
17 नवंबर को दर्ज हुई थी शिकायत
हरमाड़ा स्थित शक्ति नगर कॉलोनी के निवासी सुनील ने 17 नवंबर को राजस्थान संपर्क पोर्टल पर एक शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत बरगद के पास चौराहे पर लगी हाई मास्ट लाइट के खराब होने को लेकर थी। शिकायत दर्ज होने के बाद सुनील को उम्मीद थी कि जल्द ही लाइट ठीक हो जाएगी। लेकिन उन्हें महीनों तक अधिकारियों के फोन कॉल्स और क्षेत्राधिकार के सवालों का सामना करना पड़ा।
क्षेत्राधिकार की जंग में उलझी जनता
सुनील ने बताया कि जब भी उनके पास अधिकारियों के फोन आते, वे हमेशा सीमा क्षेत्र की बात पूछते थे। निगम के अधिकारी इसे जेडीए का काम बताते, तो जेडीए के अधिकारी इसे निगम के पाले में डाल देते थे। इस खींचतान के बीच फाइल 83 बार प्रोसेस हुई। जनता अंधेरे में रही और अधिकारी कागजों में उलझे रहे। यह सिलसिला 17 नवंबर से शुरू होकर फरवरी के अंत तक चलता रहा।
सीएमओ का दखल और 3 घंटे में समाधान
जब यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय के संज्ञान में आया, तो वहां से कड़े निर्देश जारी किए गए। 27 फरवरी को ऊपरी दबाव के चलते जेडीए प्रशासन अचानक सक्रिय हो गया। हैरानी की बात यह है कि जिस लाइट को ठीक करने में महीनों लग गए, वह दबाव पड़ने पर महज तीन घंटे के भीतर सही कर दी गई। इससे साफ जाहिर होता है कि इच्छाशक्ति हो तो काम में देरी नहीं होती।
अधिकारियों पर गिरी गाज
मामले की समीक्षा के बाद लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं। जेडीए की विद्युत शाखा के अधिशासी अभियंता (XEN) विजय कुमार को कार्यमुक्त कर दिया गया है। वहीं, नगर निगम के कनिष्ठ अभियंता (JEN) मनीष कुमार को भी एपीओ (पदस्थापन की प्रतीक्षा में) कर दिया गया है। जांच में पाया गया कि एक्सईएन को अपने सीमा क्षेत्र की सही जानकारी ही नहीं थी।
जेडीए के पास नहीं है कोई ठोस तंत्र
इस प्रकरण ने जेडीए की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नगर निगम के पास स्ट्रीट लाइटों की शिकायतों के लिए एक व्यवस्थित कॉल सेंटर है, लेकिन जेडीए के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है। जेडीए की विद्युत शाखा केवल संपर्क पोर्टल या लिखित शिकायतों पर ही निर्भर रहती है। अधिकारियों का मानना है कि शिकायतों को सुनने और ट्रैक करने का जेडीए के पास कोई आधुनिक तंत्र मौजूद नहीं है।
आयुक्त के सख्त निर्देश
इस घटना के बाद नगर निगम आयुक्त गौरव सैनी ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने सोमवार को निगम मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए। आयुक्त ने कहा कि संपर्क पोर्टल पर लंबित शिकायतों की प्रतिदिन मॉनिटरिंग की जाए। यदि कोई शिकायत क्षेत्राधिकार में नहीं आती है, तो उसे संबंधित विभाग के साथ समन्वय कर तुरंत सुलझाया जाए।
फीडबैक के लिए परिवादियों को कॉल
आयुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे रैंडम आधार पर परिवादियों को कॉल करें। उनसे समस्या के समाधान के बारे में फीडबैक लिया जाए ताकि कागजों पर होने वाली खानापूर्ति को रोका जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिकायतों को बेवजह एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर करने की प्रवृत्ति को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जनता की समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण ही प्राथमिकता होनी चाहिए।