जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और जयपुर विकास प्राधिकरण को बड़ा झटका देते हुए लैंड पूलिंग स्कीम पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने 6 गांवों की करीब 350 बीघा जमीन पर विकसित की जा रही दो प्रमुख योजनाओं की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख और अंतरिम आदेश
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश शुभा मेहता की खंडपीठ ने कानाराम मीना सहित 25 अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर यह आदेश दिया। अदालत ने सरकार से पूछा है कि क्यों न लैंड पूलिंग स्कीम एक्ट-2016 और इसके तहत विकसित योजनाओं को पूरी तरह रद्द कर दिया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक जमीन का कब्जा लेने या योजना की आगामी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर पाबंदी रहेगी। इस मामले की अगली सुनवाई अब 27 मई को तय की गई है, जिसमें सरकार को अपना विस्तृत जवाब पेश करना होगा।
किसानों की आपत्तियां और कानूनी पेच
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पल्लवी महेता ने दलील दी कि लैंड पूलिंग स्कीम एक्ट 2016 केंद्र के भूमि अवाप्ति कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। किसानों का आरोप है कि इस कानून के तहत उनकी कीमती कृषि भूमि को बिना उचित मुआवजे के छीना जा रहा है, जो अन्यायपूर्ण है। याचिका में यह भी कहा गया कि इस योजना में स्थानीय प्राधिकरण को असीमित अधिकार दिए गए हैं, जबकि काश्तकारों के अधिकारों की अनदेखी की गई है। किसानों का तर्क है कि जिन काश्तकारों के पास 112.5 वर्ग मीटर से कम जमीन है, उन्हें बदले में कोई जमीन भी नहीं दी जाएगी। यह कानून किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीन लेने का अधिकार देता है, जो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है और किसानों को भूमिहीन बना देगा।
क्या है लैंड पूलिंग स्कीम और विवाद की वजह?
लैंड पूलिंग स्कीम के तहत सरकार कई जमीन मालिकों की जमीन को एक साथ मिलाकर बुनियादी ढांचे और आवासीय योजनाओं का विकास करती है। नियमों के अनुसार, विकास के बाद 55% जमीन किसानों को लौटाई जानी चाहिए, जबकि शेष जमीन का उपयोग सड़क और पार्क के लिए होता है। विवाद तब बढ़ा जब किसानों ने आरोप लगाया कि विकसित जमीन वापस लेने के लिए भी उनसे भारी विकास शुल्क वसूला जा रहा है। जयपुर के टोंक रोड और डिग्गी-मालपुरा रोड स्थित शिवदासपुरा, चंदलाई, बरखेड़ा, अचरावाला, जयसिंपुरा और अभयपुरा गांव इस योजना से प्रभावित हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि अन्य राज्यों में भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों की अनिवार्य सहमति ली जाती है, लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं हो रहा है। इस उपजाऊ भूमि पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, और जमीन छिन जाने से किसानों के पास आजीविका का कोई साधन नहीं बचेगा।
भविष्य की सुनवाई और संभावित प्रभाव
हाईकोर्ट के इस फैसले ने फिलहाल जयपुर विकास प्राधिकरण की विस्तार योजनाओं पर ब्रेक लगा दिया है, जिससे प्रशासन में हड़कंप मच गया है। यदि अदालत इस कानून को रद्द करती है, तो यह राज्य सरकार की भविष्य की शहरी विकास नीतियों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा। किसानों ने इस अंतरिम रोक का स्वागत किया है और इसे अपनी प्रारंभिक जीत बताया है, हालांकि अंतिम फैसला कानूनी बहस पर निर्भर करेगा। आने वाली 27 मई की तारीख इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है, जब सरकार अपनी दलीलों के साथ अदालत के समक्ष उपस्थित होगी। यह मामला न केवल जयपुर बल्कि पूरे प्रदेश में लैंड पूलिंग के भविष्य और किसानों के भूमि अधिकारों के बीच संतुलन को परिभाषित करेगा। फिलहाल, 6 गांवों के हजारों किसानों ने राहत की सांस ली है क्योंकि उनकी जमीन पर कब्जा लेने की प्रक्रिया पर पूर्ण विराम लग गया है।
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