जैसलमेर | राजस्थान के जैसलमेर जिले से भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे बैंकिंग तंत्र और सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला उन गरीब किसानों के हक की राशि से जुड़ा है, जिसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर थी, उन्होंने ही उसे लूट लिया। जैसलमेर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में हुए करीब 70 लाख रुपये के इस बड़े घोटाले का खुलासा होने के बाद पुलिस ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई की है। इस कार्रवाई के तहत बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक (MD) और एक कैशियर को गिरफ्तार कर लिया गया है।
भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें और गिरफ्तारी
इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए किसानों के बीमा क्लेम की एक बड़ी राशि को आपस में बंदरबांट कर लिया। पकड़े गए आरोपियों में पूर्व एमडी जगदीश सुथार शामिल हैं, जो वर्तमान में बाड़मेर में उप रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत थे। उनके साथ ही पूर्व कैशियर विवेक सैन को भी गिरफ्तार किया गया है, जो वर्तमान में मोहनगढ़ को-ऑपरेटिव में मैनेजर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। पुलिस की इस कार्रवाई से पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अन्य फरार आरोपियों की भी सरगर्मी से तलाश कर रही है।
कैसे हुआ 70 लाख का यह बड़ा घोटाला?
इस घोटाले की कहानी साल 2020 से शुरू होती है। जैसलमेर के कनोई ग्राम सेवा सहकारी समिति में करीब 70 किसानों के कृषि क्लेम की राशि आई थी। नियमों के अनुसार, यह राशि सीधे किसानों के व्यक्तिगत बैंक खातों में ऑनलाइन ट्रांसफर की जानी चाहिए थी। लेकिन तत्कालीन एमडी जगदीश सुथार और समिति के व्यवस्थापक नरेश कुमार ने मिलकर एक साजिश रची। उन्होंने किसानों के हक के पैसे को हड़पने के लिए नियमों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया और एक सुनियोजित तरीके से जाल बिछाया।
फर्जी हस्ताक्षर और कागजी जालसाजी
इस घोटाले का मुख्य आधार फर्जी हस्ताक्षर और कागजी हेरफेर था। कनोई ग्राम सेवा सहकारी समिति के अध्यक्ष रोजे खान ने इस मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके फर्जी हस्ताक्षर करके बैंक से भारी भरकम राशि निकाली गई है। जांच में यह बात सच साबित हुई कि आरोपियों ने अध्यक्ष के फर्जी साइन किए और बैंक रिकॉर्ड में हेराफेरी की। किसानों को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उनके नाम पर आया बीमा क्लेम अधिकारियों की जेब में जा रहा है।
व्यवस्थापक को हटाने के बाद भी खेल जारी रहा
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए समिति के अध्यक्ष रोजे खान ने 30 अगस्त 2020 को ही व्यवस्थापक नरेश कुमार को उसके पद से हटा दिया था। इसकी लिखित और मौखिक जानकारी तत्कालीन एमडी जगदीश सुथार को दे दी गई थी। इसके बावजूद, एमडी सुथार ने नियमों का उल्लंघन करते हुए नरेश कुमार के साथ मिलीभगत जारी रखी। उन्होंने पद से हटाए जा चुके व्यक्ति के साथ मिलकर करोड़ों के लेनदेन को अंजाम दिया, जो पूरी तरह से अवैध था।
दो किस्तों में लूटी गई किसानों की मेहनत
पुलिस जांच के अनुसार, 70 लाख रुपये की इस राशि को दो अलग-अलग किस्तों में निकाला गया था। पहली किस्त 8 सितंबर 2020 को 20 लाख रुपये के रूप में निकाली गई। इसके कुछ ही दिनों बाद, 25 सितंबर 2020 को 50 लाख रुपये की दूसरी किस्त भी निकाल ली गई। यह पूरा भुगतान नियमों के विपरीत जाकर किया गया था। एमडी ने जानते हुए भी कि व्यवस्थापक कार्यमुक्त हो चुका है, उसे भुगतान की अनुमति दी और बैंक के खजाने से किसानों का पैसा निकाल लिया गया।
चांधन ब्रांच से लेनदेन का संदिग्ध कनेक्शन
घोटाले को अंजाम देने के लिए आरोपियों ने एक और चालाकी की थी। कनोई समिति का मुख्य खाता जैसलमेर की मुख्य शाखा में था। लेकिन लेनदेन को छिपाने और मिलीभगत को आसान बनाने के लिए भुगतान चांधन ब्रांच से किया गया। राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश थे कि क्लेम की राशि सीधे ऑनलाइन ट्रांसफर होगी, लेकिन यहां नकद विड्रॉल और अवैध ट्रांसफर का सहारा लिया गया। चांधन ब्रांच के तत्कालीन मैनेजर अश्विनी केवलिया की भूमिका भी इसमें संदिग्ध पाई गई है, जिनकी पुलिस अभी तलाश कर रही है।
पुलिस की जांच और कानूनी कार्रवाई
एएसपी रेवंतदान के नेतृत्व में इस मामले की गहन जांच की गई। राजस्थान को-ऑपरेटिव एक्ट की धारा 55 और 57 के तहत हुई इस जांच में चार अधिकारी मुख्य रूप से दोषी पाए गए। इनमें पूर्व एमडी जगदीश सुथार, व्यवस्थापक नरेश कुमार, चांधन ब्रांच मैनेजर अश्विनी केवलिया और कैशियर विवेक सैन के नाम शामिल हैं। नरेश कुमार को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी थी, जो फिलहाल जमानत पर बाहर है। शुक्रवार को हुई गिरफ्तारी के बाद जगदीश सुथार और विवेक सैन से कड़ी पूछताछ की जा रही है।
किसानों के हक पर डाका
यह घोटाला केवल वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि उन किसानों के साथ विश्वासघात है जो सूखे और फसल खराबे की मार झेलने के बाद बीमा क्लेम की उम्मीद लगाए बैठे थे। 70 किसानों के परिवार इस उम्मीद में थे कि सरकार से मिलने वाली सहायता राशि उनके संकट को कम करेगी। लेकिन बैंक के ही वरिष्ठ अधिकारियों ने उनकी इस उम्मीद पर पानी फेर दिया। इस मामले के सामने आने के बाद अब अन्य सहकारी समितियों के ऑडिट की मांग भी उठने लगी है ताकि ऐसे अन्य घोटालों का पता लगाया जा सके।
बैंकिंग सुरक्षा और भविष्य के कदम
इस घटना ने को-ऑपरेटिव बैंकिंग सिस्टम की सुरक्षा खामियों को उजागर कर दिया है। कैसे एक एमडी स्तर का अधिकारी नियमों को दरकिनार कर भुगतान कर सकता है, यह चिंता का विषय है। पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस घोटाले के तार कहीं और भी जुड़े हैं। फरार आरोपी अश्विनी केवलिया की गिरफ्तारी के बाद कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। पुलिस का कहना है कि भ्रष्टाचार के इस मामले में किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और किसानों की डूबी हुई राशि की रिकवरी के प्रयास भी किए जाएंगे।
निष्कर्ष
जैसलमेर का यह मामला राजस्थान के सहकारी विभाग के लिए एक बड़ा सबक है। सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक पहुंचे, इसके लिए सिस्टम में पारदर्शिता होना अनिवार्य है। फिलहाल, गिरफ्तार किए गए पूर्व एमडी और कैशियर से पुलिस रिमांड के दौरान पूछताछ कर रही है। आने वाले दिनों में इस घोटाले में शामिल अन्य लोगों पर भी गाज गिर सकती है। किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि उन्हें जल्द से जल्द उनका हक वापस दिलाया जाए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए ताकि भविष्य में कोई ऐसा दुस्साहस न कर सके।