सिरोही | जालोर जिले के तीखी गांव के एक समृद्ध परिवार ने सांसारिक मोह-माया को त्याग कर संयम की राह पर चलने का फैसला किया है। मुंबई के वाशी में प्लास्टिक का बड़ा कारोबार करने वाले अनिल दुग्गड़ ने अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ जीरावला तीर्थ में दीक्षा ली। 
जालोर: प्लास्टिक कारोबार छोड़ दुग्गड़ परिवार ने अपनाया संयम मार्ग, माता-पिता समेत दो बेटों ने ली दीक्षा
जालोर के दुग्गड़ परिवार ने सांसारिक सुख त्यागकर संयम का मार्ग चुना, दो बेटों संग ली दीक्षा।
HIGHLIGHTS
- जालोर के दुग्गड़ परिवार ने मुंबई का करोड़ों का प्लास्टिक कारोबार छोड़ वैराग्य का मार्ग चुना।
- अनिल दुग्गड़ और उनकी पत्नी समता के साथ उनके 15 और 13 वर्षीय बेटों ने भी दीक्षा ग्रहण की।
- सिरोही के जीरावला पार्श्वनाथ जैन तीर्थ में आचार्य रश्मिरत्न सूरीश्वरजी के सान्निध्य में विधि संपन्न हुई।
- 'वैराग्य शतक' के अध्ययन और संतों के सान्निध्य से परिवार में संयम जीवन के प्रति जागृति आई।
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करोड़ों का कारोबार और वैराग्य
अनिल दुग्गड़ पिछले 12 वर्षों से मुंबई में एक सफल व्यवसायी के रूप में स्थापित थे, लेकिन भौतिक सुख उन्हें शांति नहीं दे पा रहे थे। साधु-संतों के संपर्क में आने और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से उनके मन में वैराग्य की लौ जली, जिसने पूरे परिवार को प्रभावित किया।उन्होंने अपने व्यापारिक साम्राज्य को समेट लिया और जालोर में भी कुछ समय व्यवसाय करने के बाद पूर्णतः अध्यात्म की ओर मुड़ गए। विशेष रूप से 'वैराग्य शतक' के पाठ ने परिवार के हर सदस्य के हृदय में त्याग और संयम की भावना को गहराई से भर दिया।
बच्चों ने भी चुना संयम का मार्ग
अनिल के 15 वर्षीय पुत्र दक्ष और 13 वर्षीय पुत्र प्राकृत ने भी सांसारिक जीवन की चकाचौंध के बजाय गुरु भक्ति का रास्ता चुना। इन बच्चों को संस्कारिक शिक्षा के लिए तपोवन जैन विद्यापीठ भेजा गया था, जहां उन्होंने जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को आत्मसात किया।माता-पिता के साथ बच्चों का इस छोटी उम्र में दीक्षा लेना क्षेत्र के लोगों के लिए एक विस्मयकारी और प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है। पूरे परिवार ने एक साथ दीक्षा लेकर समाज को यह संदेश दिया कि शांति धन-दौलत में नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार में छिपी है।
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जीरावला तीर्थ में भव्य आयोजन
जीरावला पार्श्वनाथ जैन तीर्थ में आचार्य श्री रश्मिरत्न सूरीश्वरजी महाराज के सान्निध्य में तीन दिवसीय दीक्षा महोत्सव का आयोजन किया गया था। गुरुवार को मुख्य समारोह के दौरान चारों मुमुक्षुओं ने अपने कीमती वस्त्रों का त्याग कर संयम का श्वेत धवल वेश धारण किया।दीक्षा के बाद अनिल को मुनिश्री आज्ञासार रत्न विजय और समता को साध्वी श्री सम्यगज्ञानी रेखा श्रीजी के नाम से नई पहचान मिली। बड़े पुत्र दक्ष अब मुनि दृष्टिसार रत्न विजय और छोटे पुत्र प्राकृत मुनि प्रीतिसार रत्न विजय के रूप में धर्म की सेवा करेंगे।मनुष्य जन्म और धर्म पर श्रद्धा अत्यंत दुर्लभ है। अब यह परिवार केवल एक घर का नहीं, बल्कि पूरे विश्व का कल्याण करने हेतु विहार करेगा।
भविष्य का विहार और संदेश
दीक्षा मंडप में 'नूतन दीक्षित अमर रहें' के नारों के साथ चतुर्मुख परमात्मा की प्रदक्षिणा, द्रव्य पूजा और गुरु पूजन के अनुष्ठान संपन्न हुए। आचार्यश्री ने जब नवदीक्षितों को रजोहरण प्रदान किया, तो वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा और भावुकता से नम हो गईं।समारोह के समापन के बाद आचार्यश्री ने वरमाण की ओर विहार किया, जहां से वे मंडार और डीसा होते हुए शंखेश्वर तीर्थ पहुंचेंगे। वहां 6 मई को एक अन्य दीक्षा समारोह के बाद वे 15 जुलाई को भुज (कच्छ) में चातुर्मास के लिए मंगल प्रवेश करेंगे।यह दीक्षा समारोह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक परिवार के आत्मिक परिवर्तन की गौरवशाली गाथा के रूप में याद किया जाएगा। दुग्गड़ परिवार का यह कदम आधुनिक युग में अध्यात्म की शक्ति और भारतीय संस्कृति की जड़ों की मजबूती को बखूबी दर्शाता है।
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