Rajasthan: जयरंगम: 'माजुली', 'गरम रोटी' और 'ढाई आखर प्रेम के' का मंचन

जयरंगम: 'माजुली', 'गरम रोटी' और 'ढाई आखर प्रेम के' का मंचन
जयरंगम में ज्वलंत मुद्दे, संगीत ने दिया सुकून
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Highlights

  • जयरंगम के दूसरे दिन तीन नाटकों का सफल मंचन हुआ।
  • 'माजुली' ने द्वीप के संघर्ष और 'गरम रोटी' ने नारी श्रम को दर्शाया।
  • 'ढाई आखर प्रेम के' ने प्रेम के महत्व और जिम्मेदारी को उजागर किया।
  • 'राग-मद' में लोक और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला।

जयपुर: जयपुर (Jaipur) में आयोजित जयरंगम थिएटर फेस्टिवल (Jayarangam Theatre Festival) के दूसरे दिन 'माजुली', 'गरम रोटी' और 'ढाई आखर प्रेम के' जैसे नाटकों का मंचन हुआ। संगीत प्रस्तुति 'राग-मद' ने भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

थ्री एम डॉट बैंड्स थिएटर फैमिली सोसाइटी, कला एवं संस्कृति विभाग, राजस्थान तथा जवाहर कला केंद्र, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित जयरंगम थिएटर फेस्टिवल का शुक्रवार को दूसरा दिन रहा। इस दिन कलाप्रेमियों ने नाटकों के साथ सुरीले संगीत का भी जमकर आनंद लिया।

जयरंगम का दूसरा दिन: नाटकों और संगीत का संगम

जयरंगम महोत्सव में प्रस्तुतियाँ कला प्रेमियों के लिए एक अनूठा अनुभव लेकर आईं। नाटकों ने जहाँ ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को उठाया, वहीं संगीत प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को सुकून दिया।

कृष्णायन सभागार में शिल्पिका बोरदोलोई के नाटक ‘माजुली’ के साथ दिन की शुरुआत हुई। इसके बाद सुकृति आर्ट गैलरी में दुर्गा वेंकटेशन निर्देशित ‘गरम रोटी’ का मंचन हुआ।

रंगायन में रुचि भार्गव नरूला के नाटक ‘ढाई आखर प्रेम के’ में प्रेम के विभिन्न आयामों को दर्शाया गया। वहीं, मध्यवर्ती में संदीप रत्नू के निर्देशन में ‘राग-मद’ की संगीतयमी प्रस्तुति ने समां बांध दिया।

'माजुली': द्वीप के बदलते स्वरूप का सशक्त चित्रण

शिल्पिका बोरदोलोई द्वारा निर्देशित नाटक ‘माजुली’ असम की ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित माजुली द्वीप के बदलते स्वरूपों को दर्शाता है। यह प्रभावशाली फिजिकल थिएटर का एक सशक्त उदाहरण है।

यह प्रस्तुति संवादों के स्थान पर शरीर की भाषा, गति, संगीत और दृश्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से माजुली के जीवन को मंच पर जीवंत करती है। नाटक में माजुली के लोगों की दैनिक दिनचर्या, उनकी सांस्कृतिक परंपराओं और प्रकृति से उनके गहरे जुड़ाव को संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।

नाटक ब्रह्मपुत्र नदी के साथ द्वीपवासियों के निरंतर संघर्ष को भी दर्शाता है। जो नदी कभी जीवनदायिनी है, वही एकाएक रौद्र रूप धारण कर सब कुछ तहस-नहस भी कर सकती है।

ऑडियो-विजुअल माध्यम से नदी के दृश्य और असम का पारंपरिक संगीत नाटक को और भी अनुभवात्मक बनाते हैं। कलाकार अपने शारीरिक अभिनय के माध्यम से नदी का बहाव, नावों की गति, बारिश, बाढ़ और द्वीप के बदलते स्वरूप को बखूबी दर्शाते हैं।

'गरम रोटी': स्त्री के परिश्रम और अपेक्षाओं की कहानी

दुर्गा वेंकटेशन द्वारा लिखित, निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘गरम रोटी’ प्रेम, परिश्रम और अपेक्षा के ताने-बाने में औरत और रसोई के रिश्ते को उकेरता है। यह चूल्हे और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रही महिलाओं के सशक्त सवालों को मंच पर लाता है।

यह प्रस्तुति स्त्री के श्रम, उसकी भूमिका और समाज की जमी-जमाई धारणाओं पर दर्शकों को गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करती है। नाटक के दौरान ‘गरम रोटी लाइब्रेरी’ के माध्यम से देश के विभिन्न कोनों से महिलाओं की रिकॉर्डिंग सुनाई गई।

ये रिकॉर्डिंग बताती हैं कि उन्हें खाना बनाने का शौक़ है और रसोई से उनका रिश्ता प्रेम का है। लेकिन उन्हें उन गरम-गरम रोटियों को परोसने से नफरत है, जिन्हें परोसते समय कोई उनका हाथ नहीं बंटाता।

बदले में बस यही अपेक्षा रखी जाती है कि रोटी हमेशा गरम हो। उसे बनाने वाले हाथों की कोई सैलरी नहीं तय होती, बल्कि यह मान लिया जाता है कि औरत का फर्ज है कि वह घर के हर सदस्य को अपने हाथ से बनी रोटी खिलाए, और वह भी गरम-गरम।

'ढाई आखर प्रेम के': प्रेम की मधुरता और जिम्मेदारी

रंगायन में वरिष्ठ नाट्य निर्देशक रुचि भार्गव नरूला के निर्देशन में नाटक 'ढाई आखर प्रेम के' का मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय के हुनर से एक ही मंच पर अलग-अलग प्रेम कहानियों को साकार कर सभी को भाव विभोर कर दिया।

बीच-बीच में चुटीले संवादों ने दर्शकों को खूब हंसाया। कहानी प्रो. मार्तंड वर्मा और प्रियम्वदा के घर से शुरू होती है, जिनके बच्चे अब सयाने हो गए हैं और प्रेम उनके मन में हिलोरे मार रहा है।

प्रो. मार्तंड, जिन्होंने स्वयं प्रेम विवाह किया है, वे बच्चों के मनोभाव को खूब समझते हैं। उनकी छोटी बेटी बबली को बाजा बाबू से प्रेम हुआ है, वहीं बेटे बच्चू बाबू तीन बार दिल की बाजी हार चुके हैं।

बबली और बाजा बाबू के विवाह में दो रुकावटें आती हैं: बबली की मां प्रियम्वदा और बाजा के पिता पंडित जी। दोनों भागकर शादी करते हैं, जिसके बाद दोनों परिवार एक-दूसरे को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

नाटक में मोड़ तब आता है जब बबली और बाजा का झगड़ा हो जाता है। इस बीच पंडित जी की प्रेम परिभाषा बताती है कि प्रेम एक जिम्मेदारी है और रिश्तों को निभाना एक कला है।

प्रो. मार्तंड का मनोवैज्ञानिक तरीका दोनों को समझाने में कारगर साबित होता है। इसी बीच बच्चू बाबू का दिल दोबारा टूट जाता है और वह प्यार न करने की कसमें खाता है।

लेकिन जन्म और मरण की तरह प्रेम होने से भी इंसान स्वयं को रोक नहीं सकता है, और बच्चू बाबू को फिर प्यार होता है। बेटे, बेटी और नाती के सुख का स्वाद लेने वाले प्रो. मार्तंड और प्रियम्वदा शादी की सालगिरह के बहाने अपने प्यार भरे दिनों को याद करते हैं।

प्रियम्वदा की ख्वाहिश है कि इन प्यार भरे पलों में उसके प्राण पखेरू उड़ जाएं, जिस पर प्रो. मार्तंड कहते हैं "तथाअस्तु"। रुचि भार्गव नरूला, सर्वेश व्यास, कार्तिकेय मिश्रा, रिया माथुर, प्रतीक्षा सक्सेना, अनिमेश आचार्य और मनन शर्मा ने मंच पर सशक्त अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया।

'राग-मद': थार के स्वर और शास्त्रीय रागों का अद्भुत समागम

जयरंगम की शाम मध्यवर्ती में 'राग-मद' के नाम से लोक और शास्त्रीय संगीत के संगम से सजी। इस विशेष प्रस्तुति का क्यूरेशन संदीप रतनू द्वारा किया गया और यह जयपुर विरासत फाउंडेशन के सहयोग से प्रस्तुत की गयी।

प्रस्तुति की शुरुआत कमायचा और वायलिन की धुन पर दोहों से हुई। यहीं लोक की परंपरा और शास्त्रीय रचना का पहला संवाद सुनाई देता है, जो श्रोताओं को एक ऐसी यात्रा के लिए तैयार करता है जहां संगीत की सीमाएं धीरे-धीरे विलीन होने लगती हैं।

पहली रचना “अंतरिया” थी, जो राग खम्माज और विहाग में आकार लेती है। इसमें नगाड़ा, पखावज, खड़ताल, तबले और ढोलक ने मिलकर एक जीवंत ताल-संवाद रचा।

इसके बाद उल्लास पुरोहित की आवाज़ में श्रृंगार रस के स्वर खुले और फिर राग सोरठ में आधारित गीत “लुंडाघर” प्रस्तुत किया गया। यह खंड तालों की उस समृद्ध परंपरा को सामने लाता है, जो लोक और शास्त्रीय दोनों में समान रूप से जीवित है।

लतीफ खान हमीरा की ढोलक, ज़ाकिर खान हमीरा की खड़ताल, दिनेश खींची का तबला, मनीष देवली का नगाड़ा और ऐश्वर्या आर्य का पखावज यह दिखाते हैं कि अलग-अलग परंपराओं से आए साज, जब एक-दूसरे के लिए जगह बनाते हैं, तो संगीत अपने आप में पूर्ण हो जाता है।

आगामी कार्यक्रम: विरासत से कला तक

फेस्टिवल के तीसरे दिन शनिवार को सुबह 8 बजे हेरिटेज वॉक – जयपुर: द सीन एंड द अनसीन से होगी। यह वॉक शहर की अनदेखी विरासत से परिचित कराएगी।

दोपहर 12 बजे कृष्णायन में मल्लिका तनेजा के नाटक ‘डू यू नो दिस सॉन्ग?’ का मंचन होगा। दोपहर 2 बजे सुकृति आर्ट गैलरी में ‘मैरी एंड जेन’ द्वारा संगीत प्रस्तुति दी जाएगी।

शाम 4 बजे रंगायन में रिजू बजाज का नाटक ‘क्रॉसरोड्स’ प्रस्तुत किया जाएगा। वहीं, शाम 7 बजे मध्यवर्ती में ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में दास्तानगोई के जरिए अभिनेता गुरुदत्त के सुनहरे सफर को अनोखे अंदाज में बयां किया जाएगा।

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