झुंझुनूं | राजस्थान के झुंझुनूं जिले के सबसे बड़े राजकीय बीडीके अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। अस्पताल में पिछले करीब एक महीने से सोनोग्राफी जांच की सुविधा बंद पड़ी है, जिससे मरीजों को भारी असुविधा हो रही है।
रेडियोलॉजिस्ट का पद रिक्त होने के कारण अस्पताल आने वाले मरीजों को निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ रहा है। अस्पताल प्रशासन के बेहतर इलाज के दावे यहां जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रहे हैं।
बीडीके अस्पताल में सोनोग्राफी बंद: झुंझुनूं: बीडीके अस्पताल में सोनोग्राफी बंद, मरीज परेशान
बीडीके अस्पताल में एक महीने से सोनोग्राफी बंद होने से मरीज निजी केंद्रों पर निर्भर हैं।
HIGHLIGHTS
- झुंझुनूं के बीडीके अस्पताल में पिछले एक महीने से सोनोग्राफी सेवाएं बंद हैं।
- रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली होने से मरीजों को निजी केंद्रों पर जाना पड़ रहा है।
- गरीब मरीजों को बाहर जांच कराने के लिए 1000 रुपये तक अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं।
- जांच के अभाव में चिकित्सकों को गंभीर बीमारियों के इलाज में दिक्कत आ रही है।
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मरीजों पर बढ़ा आर्थिक बोझ
सरकारी अस्पताल में निशुल्क जांच की उम्मीद लेकर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले गरीब मरीजों के लिए यह स्थिति किसी बड़े आर्थिक संकट से कम नहीं है। चिकित्सकों द्वारा जांच लिखने के बाद मरीज अस्पताल में भटकने को मजबूर हैं।
निजी लैब में जांच करवाने के लिए मरीजों को 800 से 1200 रुपये तक अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। कई बार गंभीर स्थिति वाले मरीजों को उधार लेकर या गहने गिरवी रखकर जांच करानी पड़ रही है।
इलाज में आ रही हैं बाधाएं
सोनोग्राफी रिपोर्ट के अभाव में चिकित्सकों को भी बीमारी का सही आकलन करने और इलाज शुरू करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इससे मरीजों की स्थिति और बिगड़ रही है।
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"चिकित्सक साफ कह देते हैं कि यहां सोनोग्राफी नहीं होगी, बाहर से करवानी पड़ेगी। हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि निजी लैब का खर्च उठा सकें।" - एक परेशान ग्रामीण
अस्पताल में आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर मरीज या तो बिना जांच के वापस लौट रहे हैं या कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं। समय और पैसे की बर्बादी से जनता में भारी रोष व्याप्त है।
जल्द समाधान की दरकार
अस्पताल प्रशासन को इस समस्या का तुरंत समाधान निकालना चाहिए ताकि आम जनता को राहत मिल सके। रिक्त पदों को भरना अब प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि व्यवस्था पटरी पर लौट सके।
स्वास्थ्य सेवाओं में इस तरह की गिरावट सरकार के 'निशुल्क इलाज' के वादों पर सवालिया निशान लगाती है। जल्द कार्रवाई न होने पर मरीजों का आक्रोश बढ़ सकता है और स्वास्थ्य संकट और गहरा सकता है।
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