राजस्थान

जोधपुर स्थापना दिवस: ब्लू सिटी के राज: जोधपुर स्थापना दिवस: ब्लू सिटी के 10 अनसुने और रोचक रहस्य

प्रदीप बीदावत · 12 मई 2026, 11:53 दोपहर
जोधपुर के 567वें स्थापना दिवस पर जानें इस ऐतिहासिक शहर के 10 सबसे रोचक और अनसुने किस्से।

जोधपुर | राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर स्थित जोधपुर शहर आज अपना 567वां स्थापना दिवस मना रहा है। मारवाड़ की इस ऐतिहासिक राजधानी की स्थापना 12 मई 1459 को राव जोधा ने की थी।

आज जोधपुर विश्व मानचित्र पर एक प्रमुख 'हेरिटेज हब' के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। इस नीले शहर की सुंदरता और यहां की परंपराएं सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

नीली नगरी और सूर्य नगरी का अनूठा संगम

जोधपुर को दुनिया भर में 'ब्लू सिटी' के नाम से जाना जाता है। इसके पीछे एक वैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारण छिपा है। पुराने समय में यहां के लोग घरों में चूने का उपयोग करते थे।

भीषण गर्मी से बचने और दीमक जैसे कीड़ों को दूर रखने के लिए चूने में 'कॉपर सल्फेट' मिलाया जाता था। इसी रसायन के कारण घरों का रंग नीला हो जाता था, जो आज इसकी पहचान है।

इसे 'सन सिटी' भी कहा जाता है क्योंकि यहां साल भर सूरज की रोशनी खिली रहती है। सर्दियों के मौसम में यहां की गुनगुनी धूप पर्यटकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती।

मेहरानगढ़ किला: फरिश्तों की कलाकृति

जमीन से 410 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना मेहरानगढ़ किला जोधपुर का गौरव है। इसकी विशालता को देखकर प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग भी अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए थे।

"यह इंसानों ने नहीं, बल्कि परियों और फरिश्तों ने बनाया है।" - रुडयार्ड किपलिंग

इस किले की दीवारों पर आज भी ऐतिहासिक युद्धों के गोलों के निशान देखे जा सकते हैं। यह किला मारवाड़ की अजेय शक्ति और राजपूती शौर्य का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

राजा राम मेघवाल का अमर बलिदान

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि किले की नींव को मजबूती देने के लिए एक नर बलि की आवश्यकता थी। तब राजा राम मेघवाल ने राज्य की खुशहाली के लिए स्वेच्छा से बलिदान दिया।

उन्हें किले की नींव में जीवित दफन किया गया था। आज भी किले के भीतर उनका स्मारक बना हुआ है। जोधपुर के लोग आज भी उनके इस महान त्याग को श्रद्धा से याद करते हैं।

उम्मेद भवन: स्थापत्य कला का चमत्कार

जोधपुर का उम्मेद भवन पैलेस दुनिया के सबसे बड़े निजी निवासों में गिना जाता है। इस महल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बनाने में सीमेंट का प्रयोग नहीं हुआ है।

इसे 'इंटरलॉकिंग' तकनीक से तराशे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। महल का एक हिस्सा आज भी पूर्व राजपरिवार का निवास है, जबकि दूसरा हिस्सा आलीशान होटल और म्यूजियम है।

प्रकृति प्रेम और बिश्नोई समाज की गाथा

जोधपुर सिर्फ महलों का शहर नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा स्थली भी है। यहां का बिश्नोई समाज वन्यजीवों और पेड़ों को अपनी संतान की तरह प्रेम करता है और उनकी रक्षा करता है।

खेजड़ली का महान बलिदान

जोधपुर के पास स्थित खेजड़ली गांव उस ऐतिहासिक घटना का गवाह है, जहां 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे। यह दुनिया का पहला बड़ा पर्यावरण आंदोलन था।

आज भी इस क्षेत्र में काले हिरण और चिंकारा निडर होकर घूमते देखे जा सकते हैं। बिश्नोई समाज की महिलाएं हिरण के बच्चों को अपना दूध पिलाकर उनका पालन-पोषण करती हैं।

जोधपुरी स्वाद और वैश्विक फैशन

जोधपुर का खान-पान पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां का 'मिर्ची वड़ा' और 'मावा कचोरी' चखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। यहां के मसालों की खुशबू सात समंदर पार तक जाती है।

पहनावे की बात करें तो 'जोधपुरी सूट' और 'ब्रीचेस' ने वैश्विक फैशन जगत में अपनी अलग जगह बनाई है। हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक के सितारे जोधपुरी साफा पहनना गर्व की बात मानते हैं।

निष्कर्ष: विरासत और आधुनिकता का मेल

जोधपुर आज अपनी प्राचीन विरासत को सहेजते हुए आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। ओसियां के मंदिरों से लेकर मारवाड़ी घोड़ों के स्वैग तक, यह शहर हर कदम पर अपनी भव्यता का परिचय देता है।

स्थापना दिवस के इस पावन अवसर पर जोधपुर की गलियां उत्सव के रंग में डूबी हुई हैं। यह शहर हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही हम आसमान की ऊंचाइयों को छू सकते हैं।

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