जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने जोधपुर सेंट्रल जेल में एक विचाराधीन कैदी की कस्टडी में हुई संदिग्ध मौत और जेल की बदहाली पर कड़ा संज्ञान लिया है। जस्टिस फरजंद अली ने प्रशासन को जमकर फटकार लगाई।
हाईकोर्ट जज ने चैंबर में देखे सीसीटीवी फुटेज
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने मामले की सच्चाई जानने के लिए गुरुवार को अपने चैंबर में करीब दो घंटे तक सीसीटीवी फुटेज देखे। इस दौरान जेल की व्यवस्थाओं की पोल खुल गई।
अदालत ने पाया कि जेल में मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। फुटेज के माध्यम से कोर्ट ने कैदी के अंतिम समय की परिस्थितियों और जेल प्रशासन की लापरवाही को बारीकी से नोट किया।
जेल वार्ड, डिस्पेंसरी और मुख्य द्वार के फुटेज देखने के बाद कोर्ट ने माना कि यदि समय पर इलाज मिलता तो कैदी की जान बचाई जा सकती थी। इस दौरान कई खामियां उजागर हुईं।
17 मिनट तक नहीं मिला कोई डॉक्टर
सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण में सामने आया कि 2 जुलाई 2025 को सुबह 8:37 बजे जब सह-कैदी मृतक रूपाराम को गंभीर अवस्था में डिस्पेंसरी लाए, तब वहां कोई मेडिकल स्टाफ मौजूद नहीं था।
मेडिकल सहायता के अभाव में केवल साथी कैदी ही उसे बचाने की कोशिश करते दिखे। मेडिकल ऑफिसर करीब 17 मिनट की देरी से 8:54 बजे वहां पहुंचे, जो कि एक गंभीर लापरवाही है।
इसके बाद सुबह 9 बजे कैदी को महात्मा गांधी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कोर्ट ने इस देरी को 'घोर लापरवाही' करार देते हुए नाराजगी जताई।
जेल की बदहाली पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
अदालत ने जेल में बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर भी कड़ा रुख अपनाया। फुटेज से पता चला कि लगभग 200 कैदियों के लिए केवल 6 खस्ताहाल शौचालय उपलब्ध हैं, जो अमानवीय है।
पीने के साफ पानी और नहाने-धोने के पानी के बीच कोई फर्क नहीं पाया गया। सुरक्षित पेयजल के लिए वाटर प्यूरीफायर जैसी कोई अलग व्यवस्था जेल प्रशासन ने नहीं की थी।
सीसीटीवी निगरानी में भी भारी कमी मिली। बैरकों के अंदर एक भी कैमरा नहीं है और मुख्य बैरक के बाहर लगे कैमरे भी बहुत सीमित क्षेत्र को ही कवर कर पाते हैं।
डीजी जेल और सीएमएचओ तलब
यदि समय पर पर्याप्त चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती तो मौत को टाला जा सकता था। यह देरी प्रशासन की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
इन अमानवीय हालातों पर कोर्ट ने महानिदेशक (जेल) और सीएमएचओ को 14 मई को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। मामले को 'पार्ट-हर्ड' श्रेणी में रखा गया है।
कोर्ट ने जेल अधीक्षक, जेलर, ड्यूटी डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ को व्यक्तिगत हलफनामे पेश करने के निर्देश दिए हैं। उनसे पूछा गया है कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए।
विचाराधीन कैदी रूपाराम की मौत के मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। मृतक के शरीर पर मौत से कुछ समय पहले की कई चोटें दर्ज की गई थीं।
मुआवजे और सुरक्षा पर मांगा जवाब
एडवोकेट अभिषेक अखावत ने याचिका के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी। कोर्ट ने अब अतिरिक्त महाधिवक्ता को मृतक के परिजनों को अंतरिम मुआवजा देने पर जवाब पेश करने को कहा है।
जेल प्रशासन की इस लापरवाही ने राजस्थान की जेलों में कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट अब इस मामले की गहराई से जांच कर रहा है।
जोधपुर सेंट्रल जेल का यह मामला मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। अदालत के सख्त रुख से जेल प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है।
*Edit with Google AI Studio