राजस्थान

करणपुर माता मंदिर में छठ मेला शुरू: करौली में 350 साल पुराने करणपुर वाली माता मंदिर में छठ मेला शुरू, 200 वर्षों से जल रही है अखंड ज्योति

मानवेन्द्र जैतावत · 22 अप्रैल 2026, 01:55 दोपहर
राजस्थान के करौली जिले में स्थित करणपुर वाली माता मंदिर में छठ के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया गया है। 350 साल पुराने इस मंदिर में 200 वर्षों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है।

करौली | राजस्थान की पावन धरा अपनी प्राचीन संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और अटूट धार्मिक आस्था के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

इसी भक्तिमय वातावरण के बीच करौली जिले के करणपुर क्षेत्र में स्थित माता बीजासन का दरबार आज भक्तों के जयकारों से गूंज उठा है।

छठ के पावन अवसर पर यहाँ करणपुर वाली माता के मंदिर में विशाल मेले का भव्य शुभारंभ हो गया है।

यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि यहाँ श्रद्धा, परंपरा और गहरी भक्ति का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

350 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर

करणपुर वाली माता का यह मंदिर लगभग 350 साल पुराना बताया जाता है, जो आज भी अपने प्राचीन स्वरूप में स्थित है।

मंदिर का इतिहास करौली रियासत के समय से जुड़ा हुआ है और इसकी मान्यता दूर-दूर तक फैली हुई है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि माता के इस दरबार में जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ आता है, उसकी मुराद पूरी होती है।

यही कारण है कि आज मेले के पहले ही दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के चरणों में शीश नवाने पहुंचे हैं।

200 वर्षों से जल रही अखंड ज्योति

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ प्रज्वलित अखंड ज्योति है, जो पिछले 200 वर्षों से निरंतर जल रही है।

यह अखंड ज्योति भक्तों के अटूट विश्वास और माता की असीम कृपा का साक्षात प्रतीक मानी जाती है।

इस ज्योति की देखरेख और सेवा पुजारी परिवार द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी बहुत ही नियम और निष्ठा के साथ की जा रही है।

भक्तों का मानना है कि इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे अंधेरे और कष्ट दूर हो जाते हैं।

सवाई माधोपुर के इंद्रगढ़ से आया नाता

मंदिर के इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वर्ष 1713 में इस स्थान पर माता की ज्योति लाई गई थी।

करौली रियासत के समय के परम भक्त बलवीदा गौड़ माता की ज्योति को सवाई माधोपुर के इंद्रगढ़ से यहाँ लाए थे।

उन्होंने पूरे विधि-विधान और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ माता को यहाँ स्थापित किया था।

तब से लेकर आज तक यह स्थान क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।

पुजारी परिवार की आठवीं पीढ़ी कर रही सेवा

मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना का दायित्व आज भी उसी परंपरा के अनुसार निभाया जा रहा है।

वर्तमान में पुजारी परिवार की आठवीं पीढ़ी लगातार माता की सेवा और मंदिर की व्यवस्थाओं में जुटी हुई है।

यह अपने आप में एक मिसाल है कि कैसे एक परिवार ने सदियों से अपनी धार्मिक विरासत को संजोकर रखा है।

भक्तों के लिए पुजारी परिवार का मार्गदर्शन और माता की आरती का अनुभव बहुत ही सुखद और शांतिदायक होता है।

छठ के दिन खुलते हैं गर्भगृह के पट

करणपुर वाली माता के मंदिर में एक बहुत ही खास और अनोखी परंपरा का पालन किया जाता है।

साल में केवल छठ के दिन ही माता के गर्भगृह के पट पूरे 24 घंटे के लिए खुले रखे जाते हैं।

अन्य दिनों में दर्शन का समय निश्चित होता है, लेकिन छठ के दिन माता अपने भक्तों को रातभर दर्शन देती हैं।

यही वजह है कि इस दिन यहाँ श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है और लोग रातभर कतारों में खड़े रहते हैं।

पहाड़ियों के बीच बसा आध्यात्मिक केंद्र

यह मंदिर करौली जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर दुर्गम पहाड़ियों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित है।

यहाँ की शांति और शुद्ध वातावरण भक्तों को एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कराता है।

मंदिर तक पहुँचने का रास्ता भी काफी रोमांचक है, जहाँ चारों ओर अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई देती हैं।

भक्तों की टोली नाचते-गाते और माता के जयकारे लगाते हुए इस पहाड़ी रास्ते को पार कर मंदिर पहुँचती है।

प्रशासन की ओर से पुख्ता इंतजाम

मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है।

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए करणपुर बस स्टैंड के पास विशाल निशुल्क वाहन पार्किंग बनाई गई है।

सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल की तैनाती की गई है।

मेला क्षेत्र में 24 घंटे बिजली और पेयजल की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

भक्तों के ठहरने की उत्तम व्यवस्था

दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के रुकने के लिए मंदिर परिसर और आसपास कई धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।

इसके अलावा प्रशासन ने अटल सेवा केंद्र और तहसील परिसर में भी श्रद्धालुओं के विश्राम की व्यवस्था की है।

स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भक्तों के लिए भंडारे और लंगर का आयोजन भी किया जा रहा है।

ताकि किसी भी श्रद्धालु को भोजन या विश्राम के लिए किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

भक्तिमय माहौल और लांगुरिया गीतों की गूंज

छठ की रात को मंदिर परिसर का नजारा देखने लायक होता है, जब पूरा क्षेत्र रोशनी से जगमगा उठता है।

माता के प्रसिद्ध लांगुरिया गीत, ढोल-नगाड़ों और थाली की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

भक्त रातभर जागरण करते हैं और भजन कीर्तन के माध्यम से अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

करौली की संस्कृति में लांगुरिया गीतों का विशेष स्थान है, जो माता की महिमा का गुणगान करते हैं।

विशिष्ट श्रृंगार की अनोखी कहानी

मंदिर के इतिहास में एक और रोचक तथ्य यह है कि माता का विशेष श्रृंगार इतिहास में केवल एक बार किया गया था।

यह बात इस मंदिर को अन्य मंदिरों से अलग और विशिष्ट बनाती है, जो भक्तों की जिज्ञासा का केंद्र रहती है।

माता के विग्रह का स्वरूप अत्यंत सौम्य और प्रभावशाली है, जिसे देखकर भक्तों का मन मोह जाता है।

हर कोई बस एक बार माता की छवि को अपनी आंखों में बसा लेने के लिए व्याकुल नजर आता है।

व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था

इस वार्षिक मेले के आयोजन से स्थानीय व्यापारियों और ग्रामीणों को भी रोजगार के अवसर मिलते हैं।

मेले में सजी रंग-बिरंगी चूड़ियों, खिलौनों और स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोग यहाँ से अपनी जरूरत का सामान और बच्चों के लिए उपहार खरीदते हैं।

यह मेला केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं और विश्वास

करणपुर वाली माता के बारे में कहा जाता है कि वे निसंतान को संतान और दुखियों के दुख हरती हैं।

मेले में आए कई भक्त ऐसे हैं जो सालों से यहाँ नियमित रूप से हाजिरी लगाने आ रहे हैं।

कोई अपनी नई गाड़ी की पूजा करवाने आता है, तो कोई बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए यहाँ पहुँचता है।

यह अटूट विश्वास ही है जो लोगों को इतनी दूर पहाड़ियों के बीच खींच लाता है।

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा

राजस्थान सरकार भी करौली के इन प्राचीन मंदिरों को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर उभारने का प्रयास कर रही है।

कैला देवी के बाद करणपुर वाली माता का मंदिर जिले का दूसरा सबसे बड़ा आस्था का केंद्र बनता जा रहा है।

सड़कों के सुधार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से आने वाले समय में यहाँ पर्यटकों की संख्या और बढ़ेगी।

इससे न केवल क्षेत्र का विकास होगा बल्कि हमारी प्राचीन धरोहरों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सकेगा।

निष्कर्ष: आस्था का महाकुंभ

करणपुर वाली माता का मेला वास्तव में आस्था का एक ऐसा महाकुंभ है जहाँ ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है।

यहाँ अमीर-गरीब सब एक ही कतार में खड़े होकर माता के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं।

यह मेला हमारी साझी संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है।

अगर आप भी शांति और आध्यात्मिकता की तलाश में हैं, तो करणपुर माता का यह दरबार आपके लिए उत्तम स्थान है।

जय माता दी के उद्घोष के साथ शुरू हुआ यह मेला अगले कुछ दिनों तक इसी तरह हर्षोल्लास के साथ जारी रहेगा।

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