नई दिल्ली | प्रख्यात कवि और रामकथा वाचक कुमार विश्वास ने भगवान राम के अवतार और उनके जीवन दर्शन के गूढ़ रहस्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, राम का इस धरा पर आगमन केवल एक ऐतिहासिक घटना मात्र नहीं, बल्कि मानवता की पुनर्स्थापना का दिव्य महापर्व है।
आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय का मार्ग
कुमार विश्वास के अनुसार, राम का आगमन इस पृथ्वी पर इसलिए हुआ ताकि मनुष्य अपने भीतर छिपी आसुरी प्रवृत्तियों को जीत सके। जब तक मनुष्य अपने अंतर्मन के अंधकार को पराजित नहीं करता, तब तक वह वास्तविक 'मनुष्यता' के गुणों को प्राप्त नहीं कर सकता है।रामचरितमानस में रावण को केवल दस सिरों वाले दैत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रावण उन तामसिक गुणों का प्रतीक है, जो मनुष्य के नैतिक आचरण को कमजोर करते हैं और उसे पतन की ओर ले जाते हैं।
अहंकार और मर्यादा का संघर्ष
रावण उस नकारात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो सत्ता के मद में चूर होकर लोक-लाज और मर्यादा को कुचल देती है। भगवान शिव ने माता पार्वती को रावण के इसी घातक लोभ और अहंकार का वर्णन करते हुए मर्यादा के महत्व को समझाया था।तुलसीदास जी ने रावण के अहंकार का वर्णन करते हुए लिखा है कि उसने जीवित रहते कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। यहाँ तक कि ईश्वर के सामने भी उसका अहंकार अडिग रहा, जो उसके पतन का मुख्य कारण बना।
मानवता की पुकार और ईश्वरीय अवतार
मानस के बालकांड में तुलसीदास जी ने उस भयावह स्थिति का चित्रण किया है, जहां मानवता रावण के अत्याचारों से सिसक रही थी। जब धर्म, नीति और संस्कृति का लोप होने लगा, तब तुलसी ने उस 'विवेक' को पुकारा जो साहस देता है।जब पाप की अति हुई, तो पीड़ित मानवता और देवताओं ने मिलकर उस परात्पर ब्रह्म का आह्वान किया। राम का अवतार रक्षण, सृजन और मर्यादा की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था, ताकि समाज को एक नई दिशा प्रदान की जा सके।
सामाजिक समरसता और दीनबंधु राम
तुलसी के राम 'दीनबंधु' हैं, जिनका अवतार खोए हुए सामाजिक संतुलन को बहाल करने के लिए हुआ था। उन्होंने उस वैचारिक अहंकार को कुचलने का कार्य किया जिसने समाज को ऊंच-नीच और भेदभाव के खानों में बांट दिया था।भगवान राम ने महलों के ऐश्वर्य को त्यागकर वन के उन दुर्गम पथों को चुना, जहां निषादराज, शबरी और जटायु जैसे पात्र प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने इन उपेक्षितों को गले लगाकर समाज को वास्तविक समरसता का पाठ पढ़ाया।
आधुनिक भारत में राम-राज्य
महात्मा गांधी ने 'राम-राज्य' की अवधारणा को स्वाधीनता संग्राम का केंद्र बनाया, जिसका उद्देश्य केवल राजनैतिक स्वतंत्रता नहीं थी। गांधी जी का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त जाति-पांति और धार्मिक संघर्ष रूपी 'आधुनिक रावणत्व' का अंत करना था।अहंकार की स्वर्णमयी लंका मर्यादा के एक छोटे से दीये के सामने कभी नहीं टिक सकती। राम का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए ही परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। सियावर रामचंद्र की जय।