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राजस्थान

कुम्भलगढ़ अभयारण्य में भीषण आग: कुम्भलगढ़ अभयारण्य में फिर भड़की आग, वन्यजीवों पर संकट गहराया

गणपत सिंह मांडोली

राजसमंद के कुम्भलगढ़ अभयारण्य में आग बेकाबू, हवाओं ने बढ़ाई मुश्किल और वन्यजीवों का पलायन शुरू।

HIGHLIGHTS

  • कुम्भलगढ़ अभयारण्य में छठे दिन भी आग बेकाबू, मामाजी बावजी खाड़ी तक पहुंची लपटें।
  • तेज हवाओं और सूखी घास के कारण आग बुझाने में आ रही है भारी मशक्कत।
  • तेंदुआ, भालू और नीलगाय जैसे वन्यजीवों का सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन शुरू।
  • स्थानीय लोगों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और नियंत्रण के दावों पर उठाए गंभीर सवाल।
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राजसमंद | राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य इस समय भीषण आग की चपेट में है। छठे दिन भी आग पर काबू पाना नामुमकिन साबित हो रहा है। आग की लपटें इतनी विकराल हो चुकी हैं कि उन्होंने अब सादड़ी रेंज के मामाजी बावजी खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। वन विभाग ने पांचवें दिन आग पर नियंत्रण का दावा किया था, लेकिन यह दावा हवा हवाई साबित हुआ है। शाम होते ही आग ने एक बार फिर से रौद्र रूप धारण कर लिया और देखते ही देखते पहाड़ियों पर फैल गई।

आग का विकराल रूप और भौगोलिक विस्तार

सादड़ी और बोखाड़ा रेंज के घने जंगलों में लगी यह आग अब बेकाबू होकर नए क्षेत्रों की ओर बढ़ रही है। मामाजी बावजी खाड़ी का पहाड़ी क्षेत्र अब पूरी तरह से आग की लपटों से घिरा हुआ नजर आ रहा है। तेज हवाओं के कारण आग की रफ्तार इतनी अधिक है कि वन विभाग की टीमें असहाय महसूस कर रही हैं। सूखी घास और झाड़ियाँ आग के लिए ईंधन का काम कर रही हैं, जिससे लपटें कई फीट ऊंची उठ रही हैं। धुएं का गुबार आसमान में इतना घना हो गया है कि आसपास के कई किलोमीटर तक दृश्यता कम हो गई है।

तेज हवाओं ने बढ़ाई वन विभाग की चुनौतियां

इस समय क्षेत्र में चल रही तेज हवाओं ने आग बुझाने के प्रयासों को पूरी तरह से विफल कर दिया है। हवा के झोंके जलती हुई चिंगारियों को दूर-दूर तक ले जा रहे हैं, जिससे नए स्थानों पर आग भड़क रही है। वन विभाग के कर्मचारी और स्थानीय ग्रामीण मिलकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संसाधन कम पड़ रहे हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण दमकल की गाड़ियों का वहां तक पहुंचना लगभग असंभव है। पारंपरिक तरीकों से आग बुझाने की कोशिशें तेज हवा के सामने टिक नहीं पा रही हैं।

संकट में अरावली की अनमोल वन्य संपदा

कुम्भलगढ़ अभयारण्य अरावली पर्वतमाला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो जैव विविधता से समृद्ध है। आग के कारण अब तक कई हेक्टेयर वन भूमि और बेशकीमती जड़ी-बूटियां जलकर खाक हो चुकी हैं। छोटे पौधों और नए पनप रहे पेड़ों को इस आग से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है। जंगल की पारिस्थितिकी को इस आग से जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई करने में दशकों का समय लग सकता है। वनस्पति के नष्ट होने से मिट्टी के कटाव का खतरा भी बढ़ गया है, जो भविष्य में पारिस्थितिक असंतुलन पैदा करेगा।

वन्यजीवों का पलायन और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर

यह अभयारण्य तेंदुआ, भालू, नीलगाय, और भारतीय खरगोश जैसे वन्यजीवों का सुरक्षित प्राकृतिक आवास माना जाता है। आग की भीषण गर्मी और दम घोंटू धुएं के कारण ये बेजुबान जानवर अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। कई वन्यजीव सुरक्षित स्थानों और इंसानी बस्तियों की ओर पलायन करते देखे गए हैं। जंगली मुर्गियों और अन्य पक्षियों के घोंसले इस आग में पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि अगर आग जल्द नहीं बुझी, तो कई दुर्लभ प्रजातियों को बड़ा नुकसान होगा।

स्थानीय ग्रामीणों की चिंता और विभाग पर सवाल

स्थानीय ग्रामीणों ने वन विभाग की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए हैं और अपने आक्रोश को व्यक्त किया है। लोगों का कहना है कि विभाग केवल कागजों पर आग बुझाने के दावे कर रहा है, जबकि धरातल पर स्थिति भयावह है। ग्रामीणों के अनुसार, हर बार जब आग थोड़ी शांत होती है, तो विभाग लापरवाही बरतने लगता है। इसी लापरवाही का नतीजा है कि आग बार-बार भड़क रही है और नए इलाकों को निगल रही है। ग्रामीणों को डर है कि अगर आग बस्तियों तक पहुंची, तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है।

दुर्गम पहाड़ियों पर आग बुझाना बना बड़ी चुनौती

कुम्भलगढ़ का इलाका अपनी ऊंची चोटियों और गहरी खाइयों के लिए जाना जाता है, जो आग बुझाने में बड़ी बाधा है। कर्मचारियों को पैदल ही पहाड़ियों पर चढ़कर आग पर काबू पाने की कोशिश करनी पड़ रही है। पानी की उपलब्धता पहाड़ियों के ऊपर न के बराबर है, जिससे स्थिति और भी विकट हो गई है। झाड़ियों को काटकर 'फायर लाइन' बनाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि आग के फैलाव को रोका जा सके। लेकिन तेज हवाएं इन फायर लाइनों को भी पार कर आग को आगे धकेल रही हैं।

कुम्भलगढ़ अभयारण्य का महत्व और इतिहास

करीब 610 वर्ग किलोमीटर में फैला यह अभयारण्य न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यह अरावली की पहाड़ियों को हरियाली प्रदान करने वाला मुख्य स्रोत है और पर्यटन का बड़ा केंद्र भी है। यहां का पारिस्थितिक तंत्र बेहद संवेदनशील है और छोटी सी आग भी यहां बड़ा नुकसान करती है। कुम्भलगढ़ का किला इसी अभयारण्य के बीच स्थित है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। आग का इस तरह फैलना पर्यटन और पर्यावरण दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

सूखी घास और गर्मी ने बना दिया 'बारूद का ढेर'

इस साल गर्मी की शुरुआत के साथ ही जंगल में सूखी घास की मात्रा बहुत अधिक बढ़ गई है। सूखी वनस्पति और बढ़ता तापमान जंगल को एक तरह से बारूद के ढेर में तब्दील कर चुका है। जरा सी चिंगारी भी यहां बड़े दावानल का रूप ले लेती है, जैसा कि वर्तमान में हो रहा है। वन विभाग को गर्मी शुरू होने से पहले ही सुरक्षात्मक उपाय करने चाहिए थे, जो नहीं किए गए। आग लगने के कारणों की जांच भी अभी तक स्पष्ट रूप से शुरू नहीं हो पाई है।

आगामी दिनों के लिए प्रशासन की क्या है तैयारी?

एक स्थानीय ग्रामीण ने कहा, 'हम अपनी आंखों के सामने जंगल को जलते देख रहे हैं, विभाग के दावे पूरी तरह खोखले हैं।' प्रशासन अब अतिरिक्त फोर्स और संसाधनों को मौके पर बुलाने की योजना बना रहा है ताकि आग को रोका जा सके। जिला प्रशासन ने वन विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि किसी भी कीमत पर आग को आबादी वाले क्षेत्रों में न पहुंचने दें। स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद भी ली जा रही है ताकि रात के समय भी निगरानी रखी जा सके। आने वाले 24 घंटे इस अभयारण्य के भविष्य के लिए बहुत ही निर्णायक साबित होने वाले हैं।

निष्कर्ष और भविष्य की चिंता

कुम्भलगढ़ अभयारण्य में लगी यह आग केवल पेड़ों का जलना नहीं है, बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश है। अगर इसे जल्द नियंत्रित नहीं किया गया, तो अरावली के इस महत्वपूर्ण हिस्से की पहचान मिट सकती है। वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अब युद्ध स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है। यह घटना भविष्य के लिए एक सबक होनी चाहिए कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में कितनी लापरवाही बरत रहे हैं। प्रशासन को आधुनिक तकनीक और हवाई साधनों का उपयोग करने पर भी विचार करना चाहिए ताकि ऐसी आपदाओं से निपटा जा सके।

*Edit with Google AI Studio

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