जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर, जिसे हम गुलाबी नगरी के नाम से जानते हैं, वहां से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। लश्कर-ए-तैयबा का एक खूंखार आतंकी, जिसका नाम उमर हारिस है और जिसे 'खरगोश' के कोडनेम से जाना जाता है, जयपुर में पूरे एक साल तक छिपा रहा। हैरानी की बात यह है कि वह यहां केवल छिपा ही नहीं था, बल्कि उसने एक आम नागरिक की तरह यहां नौकरी की, शादी की और फिर फरार भी हो गया। यह खबर न केवल जयपुर के लिए बल्कि पूरे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर एक आतंकी इतनी आसानी से सिस्टम को कैसे चकमा दे गया। एटीएस (ATS) के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उमर हारिस उर्फ खरगोश साल 2023 के मध्य में जयपुर आया था और अगस्त 2024 तक यहीं रहा। इस दौरान उसने जयपुर के सबसे व्यस्त और पॉश इलाकों में से एक, सी-स्कीम में एक इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग कंपनी में काम भी किया। सोचिए, जिस इलाके में सरकारी दफ्तर और बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं, वहां एक आतंकी रोज काम पर जाता था और किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। आतंकी खरगोश ने रहने के लिए जयपुर के जयसिंहपुराखोर इलाके को चुना, जहां उसने एक किराए का कमरा लिया और स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गया। उसने स्थानीय लोगों का भरोसा इस कदर जीता कि उन्होंने उसकी पहचान की पुष्टि करने में अनजाने में उसकी मदद कर दी।
सी-स्कीम में नौकरी और रेकी का बड़ा खतरा
जांच एजेंसियों को संदेह है कि उमर हारिस ने सी-स्कीम में नौकरी केवल गुजारे के लिए नहीं, बल्कि रेकी करने के उद्देश्य से की थी। सी-स्कीम जयपुर का वह इलाका है जहां राजभवन, मुख्यमंत्री आवास और कई महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रतिष्ठान बेहद करीब स्थित हैं। इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग के काम के बहाने वह कई संवेदनशील जगहों तक पहुंच बना सकता था, जो सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी चूक है। एटीएस अब इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि इस एक साल के दौरान वह किन-किन लोगों के संपर्क में आया और उसने कहां-कहां की जानकारी जुटाई। विशेषज्ञों का मानना है कि 'स्लीपर सेल' के तौर पर काम करने वाले ऐसे आतंकी अक्सर इसी तरह के छोटे कामों की आड़ में अपनी गतिविधियां चलाते हैं।
फर्जी पहचान और निकाह का पेचीदा मामला
आतंकी उमर हारिस ने जयपुर में रहते हुए न केवल अपनी पहचान छिपाई, बल्कि उसने यहां निकाह भी किया ताकि उसे स्थानीय पहचान मिल सके। उसने स्थानीय दस्तावेजों का इस्तेमाल कर अपना आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्र बनवाने की कोशिश की, जिसमें वह काफी हद तक सफल भी रहा। इसी स्थानीय पहचान के आधार पर उसने फर्जी किरायानामा तैयार करवाया, जो बाद में उसके पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बना। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, उसने जयपुर की ही एक महिला से निकाह किया था, जिससे उसे समाज में घुलने-मिलने और खुद को सुरक्षित रखने में मदद मिली। यह तरीका अक्सर आतंकी संगठनों द्वारा अपनाया जाता है ताकि वे स्थानीय आबादी का हिस्सा बनकर सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचे रह सकें।
चार मददगारों का नूंह-मेवात कनेक्शन
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा उन चार लोगों को लेकर हुआ है, जिन्होंने आतंकी उमर हारिस की जयपुर में कदम-कदम पर मदद की। ये चारों व्यक्ति मूल रूप से हरियाणा के नूंह-मेवात इलाके के रहने वाले हैं और पिछले कई सालों से जयपुर में रहकर अलग-अलग काम कर रहे हैं। जांच में सामने आया कि एक व्यक्ति ने उसे सी-स्कीम में नौकरी दिलवाई, जबकि दूसरे ने उसका किरायानामा बनवाने में अपनी पहचान का इस्तेमाल किया। तीसरे व्यक्ति ने उसे फर्जी पासपोर्ट बनवाने के लिए जरूरी कागजात और प्रक्रिया में मदद की, जिससे वह देश से बाहर भागने में सफल रहा। चौथा मददगार वह था जिसने आतंकी को जयपुर के अलावा उत्तर प्रदेश, नेपाल और अन्य संवेदनशील इलाकों का दौरा करवाया और उसे सुरक्षित रास्ता दिखाया।
2012 से भारत में सक्रिय था 'खरगोश'
आतंकी उमर हारिस का इतिहास काफी पुराना है। वह साल 2012 में पाकिस्तान से सीमा पार कर जम्मू-कश्मीर के रास्ते भारत में घुसपैठ करने में सफल हुआ था। घुसपैठ के बाद वह लश्कर-ए-तैयबा के विभिन्न ऑपरेशंस में शामिल रहा और धीरे-धीरे उसने उत्तर भारत के राज्यों में अपना नेटवर्क फैलाना शुरू किया। श्रीनगर पुलिस ने जब हाल ही में लश्कर के एक अंतरराज्यीय मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया, तब जाकर उमर हारिस के जयपुर कनेक्शन की परतें खुलनी शुरू हुईं। इस मॉड्यूल के पांच संदिग्धों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में पता चला कि 'खरगोश' नाम का आतंकी राजस्थान में लंबे समय तक सक्रिय रहा था। यह जानकारी मिलते ही राजस्थान एटीएस सक्रिय हुई और उन ठिकानों पर छापेमारी की गई जहां वह पिछले एक साल से रह रहा था।
सुरक्षा एजेंसियों की जांच और रडार पर संदिग्ध
वर्तमान में राजस्थान एटीएस और जम्मू-कश्मीर पुलिस मिलकर इस मामले की जांच कर रही हैं और कई संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। हालांकि, जिन चार मददगारों के नाम सामने आए हैं, उनका अभी तक किसी आतंकी घटना से सीधा संबंध नहीं मिला है, लेकिन उनकी भूमिका संदिग्ध बनी हुई है। एटीएस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या ये मददगार जानते थे कि वे एक आतंकी की मदद कर रहे हैं या उन्हें गुमराह किया गया था। जयपुर के जयसिंहपुराखोर और सी-स्कीम के उन इलाकों में भी सघन तलाशी ली गई है जहां आतंकी उमर हारिस का आना-जाना था। सुरक्षा एजेंसियों ने आम जनता से भी अपील की है कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति को कमरा किराए पर देने से पहले उसका पुलिस वेरिफिकेशन जरूर करवाएं।
निष्कर्ष और सुरक्षा चुनौतियां
जयपुर जैसे शांत शहर में एक आतंकी का एक साल तक रहना और फर्जी पासपोर्ट बनाकर भाग जाना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह घटना दर्शाती है कि आतंकी संगठन अब छोटे शहरों और भीड़भाड़ वाले इलाकों को अपना नया ठिकाना बना रहे हैं ताकि वे आसानी से छिप सकें। प्रशासन को अब किराएदारों के सत्यापन और स्थानीय खुफिया तंत्र को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। उमर हारिस उर्फ खरगोश का मामला एक चेतावनी है कि खतरा हमारी सोच से कहीं अधिक करीब हो सकता है और सतर्कता ही एकमात्र बचाव है। फिलहाल, एटीएस की टीमें फरार आतंकी की तलाश में जुटी हैं और उसके नेटवर्क को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए ऑपरेशन जारी है।