बीकानेर | क्षत्रिय सभा एवं ट्रस्ट, बीकानेर संभाग द्वारा राष्ट्रीय नायक और सनातन धर्म के रक्षक, बीकानेर के महाराजा कर्ण सिंह राठौड़ "जय जंगलधर बादशाह" की 410वीं जयंती बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर उनके जीवन और योगदान को याद किया गया।
औरंगजेब की धर्मांतरण की साजिश को किया विफल
समारोह के मुख्य वक्ता नरेंद्र सिंह बीका (करणीसर) ने महाराजा कर्ण सिंह के शासनकाल पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि औरंगजेब के गद्दी पर बैठने के बाद महाराजा कर्ण सिंह उसके साथ रहे और कई युद्ध अभियानों में भी हिस्सा लिया।
हालांकि, वे हमेशा उसकी नीतियों के प्रति सतर्क रहते थे। नरेंद्र सिंह ने कहा कि ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि औरंगजेब कई हिंदू राजाओं का धर्मांतरण कर उन्हें मुसलमान बनाना चाहता था।
उन्होंने जोर देकर कहा कि महाराजा कर्ण सिंह की दूरदर्शिता, अपने धर्म के प्रति अटूट निष्ठा और दृढ़ संकल्प के कारण औरंगजेब का यह षड्यंत्र कभी सफल नहीं हो सका।
वीर शासक के साथ विद्या-अनुरागी भी थे महाराज
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे समुद्र सिंह राठौड़ ने कहा कि महाराजा कर्ण सिंह केवल एक वीर शासक ही नहीं थे, बल्कि वे एक विद्वान और विद्या-प्रेमी शासक भी थे।
उन्होंने बताया कि महाराजा कर्ण सिंह विद्वानों के महान आश्रयदाता थे। उनके संरक्षण में कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई।
इन ग्रंथों में "साहित्यकल्पद्रुम", पंडित गंगानाथ मैथिल द्वारा रचित "कर्णभूषण", "काव्य डाकिनी" और भट्ट हौसिक द्वारा रचित "कर्णवंतस" प्रमुख हैं। ये सभी ग्रंथ आज भी बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में सुरक्षित रखे हुए हैं।
युवा पीढ़ी को इतिहास से जोड़ना उद्देश्य
क्षत्रिय सभा एवं ट्रस्ट, बीकानेर संभाग के प्रवक्ता प्रदीप सिंह चौहान ने कार्यक्रम के उद्देश्य के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सभा द्वारा वर्षभर महापुरुषों, राष्ट्रीय नायकों और समाज के अग्रणी लोकनायकों की जयंती मनाई जाती है।
इसका मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और प्रेरणादायी व्यक्तित्वों से परिचित कराना है, ताकि समाज अपनी ऐतिहासिक विरासत से हमेशा जुड़ा रहे।
गणमान्य जनों ने दी श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों और उपस्थित लोगों ने महाराजा कर्ण सिंह राठौड़ के चित्र पर माल्यार्पण किया और दीप प्रज्वलित कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर विक्रम सिंह राजावत, उम्मेद सिंह राजपुरोहित, अग्रसेन सुथार, वीरेंद्र सिंह नरूका, गिरधारी सिंह खिंदासर, भंवर सिंह उदट, केसरी सिंह मोटासर, और हनुमान सिंह सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे और उन्होंने अपने विचार भी व्यक्त किए।