पाली | राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के घोषित परिणामों में पाली जिले के बीसलपुर गांव की मोनिका सिंह चौहान ने अपनी सफलता का परचम लहराया है। मोनिका ने इस प्रतिष्ठित परीक्षा में पूरे प्रदेश में 39वीं रैंक हासिल की है। यह सफलता केवल उनकी मेहनत नहीं, बल्कि पूरे परिवार के सामूहिक त्याग का परिणाम है। कहते हैं कि जब पूरा परिवार एक लक्ष्य के लिए जुट जाए, तो सफलता निश्चित हो जाती है। चौहान परिवार ने इसे सच कर दिखाया है।
सफलता की शानदार हैट्रिक
मोनिका की यह जीत उनके परिवार के लिए 'सफलता की हैट्रिक' की तरह है। उनके दो बड़े भाई पहले ही प्रशासनिक सेवाओं में चयनित हो चुके हैं। सबसे बड़े भाई महेंद्र सिंह चौहान का चयन साल 2021 की RAS परीक्षा में हुआ था। वे वर्तमान में जोधपुर में लेबर इंस्पेक्टर के पद पर हैं। मझले भाई ईश्वर सिंह चौहान भी RAS अधिकारी हैं। वे वर्तमान में फलोदी जिले के देचू में विकास अधिकारी (BDO) के पद पर तैनात हैं।
पिता बने बच्चों के 'कोच'
इस सफलता की कहानी के असली सूत्रधार मोनिका के पिता चंदन सिंह चौहान हैं। वे खुद अतिरिक्त निदेशक, राज्य बीमा सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपना पूरा समय बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिया। उन्होंने घर में ही एक गुरु की भूमिका निभाई। पिता ने न केवल बच्चों को प्रेरित किया, बल्कि खुद अपने हाथों से नोट्स तैयार किए। वे बच्चों के साथ बैठकर पढ़ाई की बारीकियों पर चर्चा करते थे।
मां का त्याग और ममता की शक्ति
जहां पिता ने पढ़ाई का मोर्चा संभाला, वहीं मां संतोष कंवर ने घर की सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर ले लिया। मोनिका बताती हैं कि उनकी मां ने उन्हें कभी रसोई के काम के लिए नहीं कहा। मां का एक ही मंत्र था- 'तू बस पढ़ाई कर, बाकी मैं देख लूंगी।' तैयारी के दौरान जब मोनिका रात के 2 बजे तक पढ़ती थीं, तो मां भी उनके साथ जागती रहती थीं। मां उन्हें चाय और मैगी बनाकर खिलाती थीं।
VDO की नौकरी के साथ जारी रखी पढ़ाई
मोनिका वर्तमान में लूणी (जोधपुर) में ग्राम विकास अधिकारी (VDO) के पद पर कार्यरत हैं। सरकारी नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई करना आसान नहीं था। उन्होंने अपनी ड्यूटी के बाद मिलने वाले समय का भरपूर उपयोग किया। वे अक्सर रात को देर तक जागकर अपनी तैयारी को धार देती थीं। यह मोनिका का दूसरा प्रयास था। साल 2023 की पिछली परीक्षा में उन्हें 651वीं रैंक मिली थी, लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं थीं।
किराए के फ्लैट में 4 साल का 'अज्ञातवास'
बच्चों की पढ़ाई में कोई बाधा न आए, इसके लिए पिता ने जोधपुर के कुड़ी इलाके में एक फ्लैट किराए पर लिया था। यहां तीनों भाई-बहन (महेंद्र, ईश्वर और मोनिका) करीब 4 साल तक साथ रहे। उन्होंने बाहरी दुनिया से कटकर सिर्फ अपनी किताबों से नाता जोड़ा। पिता बताते हैं कि यह समय किसी तपस्या से कम नहीं था। बच्चों ने अनुशासन के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखी और आज परिणाम सबके सामने है।
इंटरव्यू बोर्ड का वो दिलचस्प सवाल
इंटरव्यू के दौरान बोर्ड ने मोनिका से उनके वर्तमान कार्यक्षेत्र से जुड़ा एक बहुत ही व्यावहारिक सवाल पूछा था। बोर्ड ने पूछा- 'यदि किसी महिला सरपंच का पति आपकी ऑफिस में काम लेकर आए, तो आप उसे कैसे हैंडल करेंगी?' मोनिका ने बड़ी ही चतुराई और स्पष्टता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पंचायत में महिला सरपंच खुद काफी जागरूक हैं।
जागरूकता ने दिलाया सम्मान
मोनिका ने बताया कि उनकी सरपंच ग्राम सभा की बैठकों में खुद हिस्सा लेती हैं। इसलिए 'सरपंच पति' के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं रहती। उनके इस सटीक और प्रशासनिक समझ वाले जवाब ने इंटरव्यू बोर्ड को काफी प्रभावित किया। यही कारण रहा कि उन्हें अच्छे अंक मिले। मोनिका का मानना है कि एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आपको व्यावहारिक समस्याओं का समाधान पता होना चाहिए।
सफलता का मूल मंत्र: अनुशासन
अपनी सफलता पर मोनिका कहती हैं कि सफलता के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता। अनुशासन और निरंतरता ही सबसे बड़ी कुंजी है। वे कहती हैं कि अगर आपको परिवार का मानसिक सहयोग मिले, तो आधी जंग वहीं जीत ली जाती है। उनका परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा। मोनिका अब एक RAS अधिकारी के रूप में समाज की सेवा करने के लिए तैयार हैं। उनकी प्राथमिकता महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास होगी।
गांव में जश्न का माहौल
मोनिका की सफलता की खबर मिलते ही बीसलपुर गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने मिठाई बांटकर और पटाखे छोड़कर जश्न मनाया। एक ही परिवार से तीन-तीन प्रशासनिक अधिकारियों का निकलना पूरे जिले के लिए गर्व की बात है। मोनिका अब युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं। रिटायर्ड पिता चंदन सिंह के लिए इससे बड़ा तोहफा और कुछ नहीं हो सकता। उनकी मेहनत और बच्चों के समर्पण ने आज इतिहास रच दिया है।
भावी अभ्यर्थियों के लिए संदेश
मोनिका उन हजारों अभ्यर्थियों को संदेश देती हैं जो असफलता से घबरा जाते हैं। वे कहती हैं कि हार मत मानिए, अपनी कमियों को पहचानिए। 651वीं रैंक से 39वीं रैंक तक का सफर यह साबित करता है कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। बस आपको खुद पर विश्वास रखना होगा। आज चौहान परिवार की यह कहानी राजस्थान के हर उस घर के लिए मिसाल है, जहां बच्चे बड़े सपने देखते हैं।