माउंट आबू | राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध ग्रीष्म समारोह का आकर्षण अब बीते दिनों की बात होती जा रही है। पहले दिन के कार्यक्रमों में दर्शकों की भारी कमी देखी गई।
करीब 15 साल पहले का समय कुछ और था। तब स्थानीय लोगों और पर्यटकों में इस उत्सव को लेकर भारी उत्साह रहता था। राजस्थान और गुजरात से हजारों लोग यहां खिंचे चले आते थे।
उस दौर में ग्रीष्म और शरद महोत्सव का विशेष आकर्षण होता था। लोग महीनों पहले से इसकी चर्चा करते थे। हर कोई जानना चाहता था कि इस बार कौन से नए कलाकार आएंगे।
पंजाब और अन्य राज्यों से आने वाले लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां लोगों का दिल जीत लेती थीं। लेकिन अब वह जोश और वह उमंग बीते कुछ वर्षों में कहीं खो गई है।
आयोजन या महज औपचारिकता?
वर्ष 2025-26 के आयोजन को देखकर लगता है कि यह मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गया है। जिला प्रशासन, नगरपालिका और पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में यह कार्यक्रम आयोजित होता है।
विडंबना यह है कि अब यह समारोह सैलानियों के मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि रसूखदारों की खुशामद का जरिया बन गया है। आम जनता और स्थानीय लोग अब इससे पूरी तरह कट चुके हैं।
बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों और राजनेताओं के वरदहस्त की प्राप्ति के लिए यह आयोजन अब एक आसान माध्यम बन गया है। दर्शक अब इस प्रशासनिक खेल को अच्छी तरह समझने लगे हैं।
यही वजह है कि बाहर से आने वाले दर्शकों और स्थानीय लोगों का इस कार्यक्रम से मोहभंग हो चुका है। आयोजन स्थल पर उत्साह की जगह अब केवल सन्नाटा और मायूसी नजर आती है।
वीवीआईपी कल्चर का बोलबाला
साल-दर-साल एक ही ढर्रे पर चलने वाले कार्यक्रमों ने दर्शकों को बोर कर दिया है। बैठक व्यवस्था में भी भारी भेदभाव देखने को मिलता है, जिससे सैलानी खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।
सबसे आगे की कतारें हमेशा वीवीआईपी अधिकारियों और उनके करीबियों के लिए सुरक्षित रहती हैं। आम सैलानी पीछे की खाली कुर्सियों को देखकर मायूस होकर अपने होटल की ओर लौट जाते हैं।
"हम यहां कुछ नया और रोमांचक देखने आते हैं, लेकिन यहां तो हर साल वही पुरानी प्रस्तुतियां और वीवीआईपी का तामझाम ही देखने को मिलता है।"
यह राय वहां घूमने आए एक पर्यटक की है। सैलानियों का मानना है कि इससे ज्यादा अच्छे और भव्य कार्यक्रम तो उनके अपने महानगरों में आयोजित होते हैं, जहां बड़े कलाकार आते हैं।
कलाकारों के चयन पर उठते सवाल
स्थानीय लोगों का मानना है कि कलाकारों के चयन में अब कोई नयापन नहीं बचा है। बार-बार वही चेहरे और वही प्रस्तुतियां दर्शकों को आकर्षित करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं।
दमदार प्रस्तुतीकरण के अभाव में दर्शक दीर्घा में बैठकर कार्यक्रम देखने की इच्छा खत्म हो गई है। मैदान में उत्साह की कमी साफ तौर पर महसूस की जा सकती है, जो चिंताजनक है।
क्या लौटेगी पुरानी रौनक?
यदि प्रशासन ने अपनी कार्यशैली और आयोजन के तरीके में सुधार नहीं किया, तो माउंट आबू का यह गौरवशाली इतिहास केवल यादों में रह जाएगा। दर्शकों को वापस लाने के लिए बड़े बदलाव जरूरी हैं।
पर्यटन विभाग को चाहिए कि वह वीवीआईपी कल्चर को छोड़कर आम पर्यटकों की सुविधाओं और वास्तविक लोक कला पर ध्यान दे। तभी इन पारंपरिक समारोहों की सार्थकता दोबारा सिद्ध हो पाएगी।
अंततः, माउंट आबू का यह ग्रीष्म समारोह अब अपने अस्तित्व और पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। उम्मीद है कि भविष्य में प्रशासन जनभावनाओं को समझते हुए इसमें सुधार करेगा।
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