माउंट आबू | राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू में ग्रीष्म समारोह का आगाज काफी फीका रहा। कभी गुलजार रहने वाला यह उत्सव अब केवल एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है।
पोलो ग्राउंड में आयोजित इस कार्यक्रम में दर्शकों की जगह खाली कुर्सियां नजर आईं। सैलानियों और स्थानीय लोगों की घटती संख्या प्रशासन के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है।
वीआईपी कल्चर और आमजन की दूरी
एसडीएम डॉ. अंशु प्रिया और पर्यटन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में कार्यक्रम शुरू हुआ। आगे की सोफे वाली लाइन में अफसर बैठे थे, जबकि पीछे का पूरा हिस्सा खाली था।
सैलानियों का कहना है कि प्रशासन केवल वीआईपी व्यवस्थाओं में व्यस्त रहता है। आम दर्शकों के बैठने और उनकी सुविधा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, जिससे उत्सव का आकर्षण घट रहा है।
स्वर्णिम अतीत बनाम फीका वर्तमान
करीब 15 साल पहले इस मेले में राजस्थान, गुजरात और पंजाब के कलाकारों का संगम होता था। आज वही पुराने कलाकार और घिसी-पिटी प्रस्तुतियां दर्शकों को बोर कर रही हैं।
महानगरों के कंसर्ट्स देख चुके सैलानी अब इन पारंपरिक कार्यक्रमों में कुछ नया ढूंढते हैं। नयापन न मिलने पर वे कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर होटलों का रुख कर लेते हैं।
"समारोह को अगर फिर से जीवित करना है, तो हमें कलाकारों के चयन और आयोजन के तरीके में बड़ा बदलाव करना होगा।"
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला
कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई। इसके बाद एयर फोर्स स्कूल के बच्चों और सीआरपीएफ की महिला अधिकारियों ने मनमोहक नृत्य पेश किए। चीनी ट्यून्स बैंड ने सूफी गायन किया।
'मारो राजस्थान' ग्रुप ने राजस्थानी लोकगीतों और इंडो-वेस्टर्न फ्यूजन की शानदार प्रस्तुति दी। अंत में पद्मावत के 'घूमर' नृत्य ने कार्यक्रम का समापन किया, जिसका संचालन ऋचा पानेरी और सवि मालू ने किया।
माउंट आबू के इस प्रतिष्ठित उत्सव को बचाने के लिए प्रशासन को अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुए, तो यह ऐतिहासिक परंपरा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।
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