मैसूर | कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनाव 2023 के रंग में पूरी तरह से रंग चुका है। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला होने जा रहा है। इस मुकाबले में कांग्रेस सत्तारूढ़ भाजपा को बाहर करने के लिए कोई भी कसर बाकी नहीं रख रही है।
जरा हट के: दिलचस्प है मैसूर महल की कहानी, सोने से हुआ है काम, आज भी दिखता है पुराना ठाठ-बाट
मैसूर महल 1912 ईस्वी के दौरान बनकर तैयार हुआ। इसे बनने में करीब 15 साल का समय लगा। उस समय के दौरान इस पैलेस को तैयार करने में तकरीबन 42 लाख रुपए की लागत आई थी। इसे अंबा विलास के नाम से भी जाना जाता है।
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- मैसूर महल 1912 ईस्वी के दौरान बनकर तैयार हुआ। इसे बनने में करीब 15 साल का समय लगा। उस समय के दौरान इस पैलेस को तैयार करने में तकरीबन 42 लाख रुपए की लागत आई थी। इसे अंबा विलास के नाम से भी जाना जाता है।
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इन सबके बीच राज्य के मैसूर शहर में भी चुनावों को लेकर ऐसा ही माहौल बना हुआ है। मैसूर शहर कर्नाटक की विरासत को सहेजे हुए है जो खूबसूरत महलों, रियासत कालीन स्थलों, रंगीन त्योहारों, मंदिरों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरे देश में मशहूर है।
आइए चुनावी चर्चा से थोड़ा हटकर जानते हैं मैसूर और यहां स्थित महल की खूबसूरती और इतिहास के बारे में....
मैसूर महल का निर्माण सर्वप्रथम 14वीं शताब्दी के दौरान किया गया था। यहां का पहला निर्माण चंदन की लकड़ी से हुआ था।
एक दुर्घटना के कारन यह लकड़ी का पैलेस बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था जिसके बाद 1897 के दौरान कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ और उनकी मां ने यहां महल के रूप में दूसरा निर्माण कराने का जिम्मा वास्तुकार लॉर्ड हेनरी इरविन को सौंपा।
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यहां पर दूसरा मैसूर महल 1912 ईस्वी के दौरान बनकर तैयार हुआ। इसे बनने में करीब 15 साल का समय लगा। उस समय के दौरान इस पैलेस को तैयार करने में तकरीबन 42 लाख रुपए की लागत आई थी। इसे अंबा विलास के नाम से भी जाना जाता है।
बेहद खास और अद्भुत है मैसूर महल
मैसूर महल बेहद खास और अद्भुत है। इस पैलेस के ऊपरी भाग में स्थित गुंबद को गुलाबी रंग के स्लेटी पत्थर से बनाया गया है।
महल के अंदर बने एक बड़ेे दुर्ग का गुंबद सोने की पॉलिश से तैयार किया गया है। मैसूर पैलेस दविड़, पूर्वी और रोमन कला का अद्भुत संगम है।
मैसूर महल में राजाओं के रहने के लिए अलग कक्ष एवं आम लोगों के लिए अलग कक्ष बने हुए हैं।
इस महल में कई पौराणिक गुड़ियों का संग्रह भी देखने को मिलता है। मैसूर पैलेस में वर्तमान समय में तकरीबन 97000 बल्ब लगे हुए हैं, जिनकी चमचमाती रोशनी रात के समय में महल की खूबसूरती को निखार देती है।
मैसूर का पुराना नाम क्या है ?
कर्नाटक के ऐतिहासिक शहर मैसूर का उल्लेख महाभारत में ’माहिष्मती’ के रूप में किया गया है। वहीं, मौर्य काल में इसे ’पुरीगेरे’ के नाम से जाना जाता था, जो बाद में ’महिषापुर’ और फिर मैसूर में बदल गया।
यदुवीर कृष्णदत्त हैं वर्तमान संरक्षक
यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार मैसूर के रॉयल हाउस के 27वें और वर्तमान संरक्षक हैं। वे बेट्टादा कोटे उर्सु परिवार के एचएच राजमाथा डॉ. प्रमोदा देवी वाडियार के इकलौते बेटे हैं।
वाडियार राजघराने ने 1399 से मैसूर पर राज करना शुरू किया था। पिछली बार यहां 1974 में राजतिलक हुआ था।
तब यदुवीर के चाचा श्रीकांतदत्ता नरसिम्हाराजा वाडियार को गद्दी पर बैठाया गया था। जिनकी साल 2013 में मौत हो गई थी।
दो साल गद्दी खाली रहने के बाद यदुवीर को राजा बनाया गया। श्रीकांतादत्ता नरसिम्हा राजा वाडियार और रानी गायत्री देवी को संतान नहीं थी।
मैसूर महल खुलने और बंद होने का समय
मैसूर महल में पर्यटकों के लिए घूमने का समय निश्चित किया गया है। यह महल पर्यटकों के लिए सुबह 10ः00 बजे खुलता एवं शाम 5ः30 बजे बंद हो जाता है। इस समय में यहां आने वाले आगंतुक यहां की विरासत को जान सकते हैं।
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