नागौर | राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जो न केवल गर्व महसूस कराती है बल्कि यह भी साबित करती है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
यहाँ के दो स्कूली छात्रों ने अपनी मेहनत और लगन से वह कर दिखाया है जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। इन दोनों छात्रों ने सुपरस्टार रजनीकांत की मशहूर फिल्म 'रोबोट' से प्रेरित होकर एक असली ह्युमेनाइड रोबोट तैयार किया है।
इस रोबोट का नाम उन्होंने 'रक्षक 1.0' रखा है। यह रोबोट न केवल देखने में आधुनिक है, बल्कि यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से सवालों के सटीक जवाब भी देता है।
फिल्म से मिला इनोवेशन का आईडिया
नागौर जिले के कुचेरा कस्बे के रहने वाले यश शर्मा और नीरज सैनी क्रमशः 9वीं और 11वीं कक्षा के छात्र हैं। दोनों गहरे दोस्त हैं और बचपन से ही कुछ नया करने का जुनून रखते हैं।
यश और नीरज ने कुछ साल पहले रजनीकांत की फिल्म 'रोबोट' देखी थी। फिल्म में दिखाए गए 'चिट्टी' रोबोट ने उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। यहीं से उनके मन में खुद का रोबोट बनाने का विचार आया।
शुरुआत में यह केवल एक खेल जैसा था। करीब दो साल पहले उन्होंने कार्डबोर्ड की मदद से एक साधारण रोबोटिक ढांचा तैयार किया था, जिसे उन्होंने 'कंप्यूटराइज' नाम दिया था। लेकिन उनका सपना इससे कहीं बड़ा था।
यूट्यूब बना इन बच्चों का गुरु
एक ह्युमेनाइड रोबोट बनाना कोई आसान काम नहीं था, खासकर तब जब आपके पास कोई औपचारिक प्रशिक्षण न हो। यश और नीरज ने हार नहीं मानी और इंटरनेट को अपना हथियार बनाया।
उन्होंने यूट्यूब पर घंटों समय बिताकर कोडिंग सीखना शुरू किया। रोबोट को प्रोग्राम करने और उसे एआई से जोड़ने के लिए उन्होंने पायथन (Python) और C++ जैसी जटिल कंप्यूटर भाषाएं ऑनलाइन सीखीं।
इन बच्चों ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ इस प्रोजेक्ट को समय दिया। स्कूल से आने के बाद वे घंटों तक अपने कंप्यूटर पर कोडिंग की प्रैक्टिस करते थे और रोबोट के सॉफ्टवेयर पर काम करते थे।
कबाड़ और जुगाड़ से बना 'रक्षक'
यश के पिता जयप्रकाश और नीरज के पिता जितेंद्र सैनी दोनों ही डिस्कॉम में तकनीशियन के पद पर कार्यरत हैं। मध्यमवर्गीय परिवार से होने के कारण उनके पास इस महंगे प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त फंड नहीं था।
हालांकि, बच्चों के जुनून को देखते हुए परिवारों ने अपनी क्षमता के अनुसार मदद की। यश और नीरज ने अपनी पॉकेट मनी बचाई और रिश्तेदारों से मिली मदद को जोड़कर करीब 80 हजार रुपये इकठ्ठा किए।
फंड की कमी के कारण उन्होंने कई 'जुगाड़' तकनीकों का सहारा लिया। रोबोट की आंखों के लिए साधारण वेब कैमरों का उपयोग किया गया है, जो लाइव रिकॉर्डिंग करने में सक्षम हैं।
रोबोट को पावर सप्लाई देने के लिए उन्होंने पुराने कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाले SMPS (Switch Mode Power Supply) का इस्तेमाल किया। रोबोट के जोड़ बनाने के लिए लोहे के बड़े स्क्रू और कबाड़ के सामान का उपयोग किया गया।
3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल
रोबोट की बॉडी को प्रोफेशनल लुक देने के लिए उन्होंने प्लास्टिक बॉडी का उपयोग किया है। इस बॉडी को उन्होंने 3D प्रिंटर की मदद से प्रिंट करवाया, ताकि यह एक असली इंसान जैसा दिख सके।
डेढ़ साल की कड़ी मेहनत और लगातार असफलताओं के बाद आखिरकार 'रक्षक 1.0' का प्रोटोटाइप बनकर तैयार हो गया। यह रोबोट अब पूरी तरह से वॉइस कमांड पर काम करता है।
इस रोबोट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मोशन सेंसर लगे हुए हैं। यह अपने सामने खड़े व्यक्ति की हर गतिविधि को डिटेक्ट कर सकता है और उसे रिकॉर्ड भी कर सकता है।
छत के एक छोटे कमरे में बनी लैब
यश और नीरज के पास कोई बड़ी वर्कशॉप नहीं थी। यश के पिता को मिले सरकारी क्वार्टर की छत पर बने एक छोटे से कमरे को ही इन दोनों ने अपनी लैब बना लिया।
इसी छोटे से कमरे में बैठकर उन्होंने दुनिया बदलने वाले सपने बुने। उनके पास पर्याप्त उपकरण भी नहीं थे, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार कर लिया।
बच्चों के पिता का कहना है कि शुरुआत में उन्हें समझ ही नहीं आता था कि ये दोनों कमरे में बंद होकर क्या कर रहे हैं। लेकिन जब रोबोट ने बोलना शुरू किया, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।
भविष्य की योजनाएं और स्टार्टअप का सपना
यश और नीरज का सपना केवल एक रोबोट बनाकर रुकना नहीं है। वे भविष्य में अपना खुद का स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। उनका लक्ष्य ऐसे रोबोट बनाना है जो भारतीय सेना के काम आ सकें।
वे चाहते हैं कि सीमा पर जवानों की जगह रोबोट तैनात हों ताकि किसी की जान न जाए। इसके अलावा, वे फैक्ट्रियों और घरों के काम को आसान बनाने के लिए भी रोबोटिक तकनीक विकसित करना चाहते हैं।
हालांकि, इन बड़े सपनों के लिए उन्हें बड़े निवेश और एक बेहतर लैब की जरूरत है। फिलहाल वे अपने बोर्ड एग्जाम्स की तैयारी में भी जुटे हैं, इसलिए रोबोट के विकास की गति थोड़ी धीमी है।
सरकार से मदद की उम्मीद
इन दोनों होनहार छात्रों का कहना है कि यदि सरकार या कोई संस्था उन्हें आर्थिक रूप से मदद करे, तो वे 'रक्षक' को और भी उन्नत बना सकते हैं। अभी यह रोबोट चल नहीं सकता क्योंकि इसमें पैर नहीं लगाए गए हैं।
फंड मिलने पर वे इसे मेटल बॉडी में तब्दील करना चाहते हैं और इसे पूरी तरह से 'सेल्फ एआई' रोबोट बनाना चाहते हैं जो बिना कंप्यूटर के भी स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सके।
नागौर के इन बच्चों की यह कहानी देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। यह दिखाती है कि अगर आपके पास सीखने की ललक है, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती।
इन बच्चों ने साबित कर दिया है कि 'डिजिटल इंडिया' के इस दौर में ज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक क्लिक की दूरी पर मौजूद है। बस जरूरत है तो उसे सही दिशा में इस्तेमाल करने की।