राजस्थान

अंतकाल की वृत्ति तय करती है गति: भरत चरित्र ने समझाया जीवन का गूढ़ रहस्य: अंतकाल की वृत्ति ही तय करती है जीव की गति

thinQ360 · 18 सितम्बर 2026, 06:52 शाम
श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव के तहत आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में भरत महाराज एवं जडभरत चरित्र के माध्यम से बताया गया कि मनुष्य जीवनभर जिस भाव का चिंतन करता है, अंतकाल में उसी वृत्ति के प्रभावी होने की संभावना रहती है।

रेवदर | अर्बुदारण्य की पावन धरा पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से गो ऋषि दत्त शरणानंद जी महाराज के सान्निध्य में नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ के तहत श्रीमद्भागवत कथा श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में चल रही है। कथा में भरत महाराज एवं जडभरत चरित्र के माध्यम से मन, चिंतन, आसक्ति और अंतकालीन वृत्ति का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य समझाया गया।

अंतकाल का चिंतन तय करता है जीव की गति

कथा में भगवद्गीता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए महाराज जी ने कहा कि मनुष्य जीवनभर जिस भाव और विषय का निरंतर चिंतन करता है, अंत समय में उसी भाव की वृत्ति बनने की संभावना रहती है। उसी अंतकालीन वृत्ति के अनुसार जीव की आगे की गति निर्धारित होती है।

उन्होंने कहा कि भगवान का स्मरण केवल अंतिम समय के लिए सुरक्षित रखने वाला विषय नहीं है। भगवत्स्मरण को पूरे जीवन की निरंतर साधना बनाना चाहिए, ताकि अंतिम क्षण में भगवान का स्मरण किसी प्रयास अथवा दबाव से नहीं, बल्कि सहज रूप से हो सके।

भरत महाराज की आसक्ति से मिली बड़ी सीख

भरत महाराज के प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज जी ने बताया कि वे महान तपस्वी और वैराग्यवान थे। राजपाट एवं सांसारिक वैभव त्यागने के बाद वे वन में रहकर साधना कर रहे थे, लेकिन एक मृगशावक के प्रति उनकी अत्यधिक आसक्ति हो गई।

अंत समय में उनका चिंतन भगवान के स्थान पर उसी मृगशावक की ओर चला गया। इसी अंतकालीन वृत्ति के कारण उन्हें अगले जन्म में मृगयोनि प्राप्त हुई। इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि साधक को बाहरी त्याग के साथ अपने मन की आसक्तियों के प्रति भी निरंतर सजग रहना चाहिए।

केवल बाहरी त्याग से समाप्त नहीं होते संस्कार

महाराज जी ने कहा कि मन में संचित संस्कार और वासनाएं केवल सांसारिक वस्तुओं का बाहरी त्याग करने से समाप्त नहीं होतीं। वे सूक्ष्म रूप में मन और चित्त के भीतर बनी रह सकती हैं तथा अनुकूल अवसर मिलते ही फिर सक्रिय हो सकती हैं।

इसे समझाने के लिए उन्होंने हींग के डिब्बे का सरल उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार डिब्बे से हींग निकाल देने के बाद भी उसमें उसकी गंध बनी रहती है, उसी प्रकार बाहरी विषयों का त्याग करने के बाद भी पुराने संस्कारों और वासनाओं की गंध मन में बनी रह सकती है।

साधना का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि मन और चित्त को भी विषयों की आसक्ति से मुक्त करके भगवान की ओर मोड़ना है।

भगवान में रम जाए बुद्धि और चित्त

महाराज जी ने कहा कि जब साधक की बुद्धि और चित्त पूरी तरह भगवान में रम जाते हैं, तब उसे प्रत्येक स्थान और प्रत्येक जीव में भगवान की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। ऐसी अवस्था में संसार के दृश्य उसे परमात्मा से अलग दिखाई नहीं देते।

भगवान का निरंतर चिंतन मनुष्य की दृष्टि बदल देता है। जिस संसार में सामान्य व्यक्ति केवल भौतिक वस्तुएं देखता है, उसी संसार में भक्त को भगवान की लीला और परम सत्ता का अनुभव होने लगता है।

उद्धव प्रसंग से समझाई प्रेम की अवस्था

कथा में उद्धव प्रसंग के माध्यम से ज्ञान और भगवान के प्रेम के संबंध को भी समझाया गया। महाराज जी ने कहा कि उद्धव ज्ञान के प्रतिनिधि थे, लेकिन भगवान के प्रति भक्तों का निष्कपट प्रेम देखकर उनका ज्ञान भी भाव में परिवर्तित हो गया।

भगवान के प्रति प्रेम की अवस्था में तर्क, अहंकार और बौद्धिक श्रेष्ठता स्वतः समाप्त होने लगती है। भक्त के लिए भगवान केवल चिंतन अथवा चर्चा का विषय नहीं रहते, बल्कि उसके सम्पूर्ण जीवन और अस्तित्व का आधार बन जाते हैं।

जडभरत ने बनाए रखा आत्मज्ञान

भरत महाराज ने मृगयोनि के बाद जडभरत के रूप में जन्म लिया। पूर्व जन्म की स्मृति और आसक्ति के परिणाम को समझने के कारण उन्होंने संसार के प्रति अत्यंत सावधानी रखी और अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में स्थित रहने का प्रयास किया।

जडभरत चरित्र से यह संदेश मिलता है कि मनुष्य को बाहरी व्यवहार के साथ भीतर की चेतना को भी जागृत रखना चाहिए। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर व्यक्ति सुख-दुख, सम्मान-अपमान और सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठने लगता है।

भारतवर्ष की आध्यात्मिक महिमा का वर्णन

कथा में भारतवर्ष की आध्यात्मिक महिमा पर भी प्रकाश डाला गया। महाराज जी ने भारतभूमि को ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और भक्तों की साधना भूमि बताते हुए कहा कि यहां मनुष्य को कर्म, भक्ति और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि भारतभूमि की विशेषता केवल इसकी भौगोलिक सीमाओं में नहीं, बल्कि इसकी आध्यात्मिक परंपरा में निहित है। यहां मनुष्य को अपने कर्मों को शुद्ध करने, भगवान की भक्ति करने और आत्मतत्त्व को जानने का मार्ग बताया गया है।

भगवत्स्मरण को बनाएं स्वाभाविक जीवनचर्या

महाराज जी ने श्रद्धालुओं से जीवन की प्रत्येक वृत्ति को भगवान की ओर मोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दैनिक कार्यों और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी मनुष्य अपने मन को भगवान से जोड़ सकता है।

भगवत्स्मरण तभी अंतिम समय में सहज हो सकता है, जब उसे जीवनभर अभ्यास में लाया जाए। इसलिए भगवान का नाम, कथा, चिंतन और सेवा मनुष्य की स्वाभाविक जीवनचर्या का हिस्सा बनने चाहिए।

कथा के दौरान बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भरत महाराज और जडभरत चरित्र का श्रवण करते हुए आसक्ति से सावधान रहने, मन को नियंत्रित करने और जीवनभर भगवान का स्मरण करने का संदेश ग्रहण किया।

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