राजस्थान

सृष्टि का मूल परम सत्य: ‘जन्माद्यस्य यतः’ से खुला सृष्टि के रहस्य का द्वार, शंकराचार्य ने समझाया परम सत्य का स्वरूप

गणपत सिंह मांडोली · 17 सितम्बर 2026, 06:51 शाम
श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव की भागवत कथा में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज ने प्रथम स्कन्ध के माध्यम से सृष्टि, जीव, परमात्मा और परम सत्य के संबंध को सरल भाषा में समझाया।

रेवदर | अर्बुदारण्य की पावन धरा पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ के तहत श्रीमद्भागवत कथा श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में चल रही है। गो ऋषि दत्त शरणानंद जी महाराज के सानिध्य में आयोजित कथा में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने प्रथम स्कन्ध के माध्यम से सृष्टि के मूल और परम सत्य का सरल एवं शास्त्रसम्मत विवेचन किया।

‘जन्माद्यस्य यतः’ में समाया सृष्टि का रहस्य

शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने ‘जन्माद्यस्य यतः’ का अर्थ समझाते हुए कहा कि जिस परम सत्य से इस संसार की उत्पत्ति होती है, जिससे इसका पालन और स्थिति बनी रहती है तथा अंत में जिसमें समस्त सृष्टि का विलय हो जाता है, वही परम तत्त्व है।

उन्होंने कहा कि संसार केवल दिखाई देने वाले पदार्थों का समूह नहीं है। इसके पीछे एक चेतन, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान आधार विद्यमान है। उसी परम चेतना से सृष्टि का विस्तार होता है और अंततः सम्पूर्ण सृष्टि उसी में समाहित हो जाती है।

सृष्टि के मूल कारण की खोज कराता है भागवत

महाराज श्री ने समझाया कि श्रीमद्भागवत का आरंभ ही मनुष्य को सृष्टि के मूल कारण की खोज की ओर ले जाता है। मनुष्य सामान्यतः संसार के दिखाई देने वाले स्वरूप को ही अंतिम सत्य मान लेता है, जबकि भागवत उसे दृश्य के पीछे विद्यमान अदृश्य चेतना को समझने की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और विलय की प्रक्रिया को समझने के लिए उस परम तत्त्व का ज्ञान आवश्यक है, जो इन सभी अवस्थाओं में अपरिवर्तित रहता है।

‘सत्यं परं धीमहि’ का बताया आध्यात्मिक अर्थ

शंकराचार्य जी महाराज ने ‘सत्यं परं धीमहि’ का अर्थ बताते हुए कहा कि हम उस परम सत्य का ध्यान करते हैं, जो सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। यह परम सत्य किसी एक स्थान, वस्तु अथवा कालखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक जीव और सम्पूर्ण ब्रह्मांड में चेतना के रूप में विद्यमान है।

उन्होंने कहा कि भागवत का उद्देश्य केवल कथा सुनना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य उस परम सत्य को समझना, उसका चिंतन करना और उसे अपने जीवन में अनुभव करना है।

आत्मप्रश्न से प्रारंभ होती है आध्यात्मिक यात्रा

महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य जब संसार की छोटी-बड़ी इच्छाओं और क्षणभंगुर विषयों से ऊपर उठकर अपने अस्तित्व के मूल प्रश्नों पर विचार करता है, तभी उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है।

‘मैं कौन हूं?’, ‘यह संसार किससे उत्पन्न हुआ?’, ‘जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?’ और ‘परम सत्य का स्वरूप क्या है?’ जैसे प्रश्न मनुष्य को बाहरी संसार से आत्मचिंतन की ओर ले जाते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया ही मनुष्य को आत्मज्ञान और परमात्मा की अनुभूति के निकट पहुंचाती है।

जीव और परमात्मा का संबंध समझाया

कथा के दौरान शंकराचार्य जी महाराज ने सृष्टि और सृष्टिकर्ता, जीव और परमात्मा तथा दिखाई देने वाले संसार और अदृश्य चेतन तत्त्व के संबंध को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया।

उन्होंने बताया कि जीव स्वयं को शरीर और सांसारिक पहचान तक सीमित मानता है, लेकिन उसका वास्तविक स्वरूप चेतन है। जब मनुष्य इस चेतना के मूल को समझने का प्रयास करता है, तब उसे जीव और परमात्मा के संबंध का बोध होने लगता है।

क्षणभंगुर संसार से ऊपर उठने का संदेश

शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि संसार के विषय और इच्छाएं स्थायी नहीं हैं। मनुष्य अपना अधिकांश जीवन उन्हीं क्षणभंगुर उपलब्धियों को प्राप्त करने में लगा देता है, जो समय के साथ समाप्त हो जाती हैं।

श्रीमद्भागवत मनुष्य को इन अस्थायी विषयों से ऊपर उठकर उस सत्य की खोज करने का संदेश देती है, जो सदैव विद्यमान रहता है। परम सत्य का चिंतन मनुष्य को जीवन की वास्तविकता समझने और अपने कर्मों को धर्म के मार्ग पर ले जाने की प्रेरणा देता है।

श्रद्धालु जुड़े गहन आध्यात्मिक चिंतन से

शंकराचार्य जी महाराज की सहज, सरल और शास्त्रसम्मत व्याख्या से कथा में उपस्थित श्रद्धालु गहन आध्यात्मिक चिंतन से जुड़े। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते हुए धर्म, अध्यात्म और आत्मचिंतन का संदेश ग्रहण किया।

कथा स्थल पर भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने परम सत्य, सृष्टि के मूल और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से संबंधित विचारों को ध्यानपूर्वक सुना।

पदाधिकारी एवं गणमान्यजन रहे उपस्थित

इस अवसर पर श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा के कार्यकारी अध्यक्ष रघुनाथसिंह राजपुरोहित, मुख्य कार्यकारी अधिकारी आलोक सिंहल, वरिष्ठ ट्रस्टी देवाराम जागरवाल, भरतसिंह बसंत, ब्रह्मदत्त राजपुरोहित और रामचन्द्र नेहरा सहित महोत्सव से जुड़े पदाधिकारी एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।

श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं। आयोजन के माध्यम से गोसेवा, धर्म, अध्यात्म और आत्मचिंतन का संदेश जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है।

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