इस्लामाबाद | पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने एक बड़ा कूटनीतिक दावा करते हुए कहा है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने जा रहा है। डार के अनुसार, दोनों महाशक्तियों ने इस्लामाबाद की इस पहल पर अपना पूर्ण विश्वास व्यक्त किया है।
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व में संघर्ष गहराता जा रहा है और वैश्विक शांति पर खतरा मंडरा रहा है। डार ने एक टेलीविजन संबोधन में कहा कि आने वाले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण बातचीत होने की संभावना है।
क्षेत्रीय शक्तियों का मिला समर्थन
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हाल ही में एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। इन देशों ने पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई मध्यस्थता की प्रक्रिया का पुरजोर समर्थन किया है।
इशाक डार ने बताया कि विदेशी मंत्रियों को अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली संभावित बातचीत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि यह युद्ध किसी के भी हित में नहीं है और इससे केवल विनाश ही होगा।
मुस्लिम उम्माह की एकता पर जोर
बैठक के दौरान डार ने 'मुस्लिम उम्माह' की एकता को समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि चुनौतीपूर्ण समय में सभी मुस्लिम राष्ट्रों को एक साथ आकर इस संघर्ष को समाप्त करने के प्रयास करने चाहिए।
पाकिस्तान पिछले कई हफ्तों से पर्दे के पीछे से कूटनीति (Backchannel Diplomacy) में सक्रिय था। अधिकारियों का कहना है कि अब इन प्रयासों को सार्वजनिक करने का सही समय आ गया है क्योंकि तनाव कम करना प्राथमिकता है।
ईरान का कड़ा रुख और सैन्य तनाव
हालांकि, पाकिस्तान की इन कोशिशों के बीच ईरान की ओर से कड़े संकेत मिल रहे हैं। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलीबाफ ने प्रस्तावित वार्ताओं पर संदेह जताया है। उन्होंने क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की बढ़ती उपस्थिति की आलोचना की।
कलीबाफ ने सरकारी मीडिया के माध्यम से चेतावनी दी कि ईरानी सेना जमीन पर अमेरिकी सैनिकों के आगमन का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा कि वे अमेरिकी सेना और उनके क्षेत्रीय सहयोगियों को कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।
अमेरिका की सक्रियता और सैन्य तैनाती
दूसरी ओर, अमेरिका ने भी क्षेत्र में अपनी सैन्य पकड़ मजबूत कर ली है। लगभग 2,500 अमेरिकी मरीन कमांडो मध्य पूर्व में पहुंच चुके हैं। इस सैन्य हलचल ने कूटनीतिक प्रयासों के बीच तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी लेबनान में सैन्य अभियान के विस्तार के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि सेना दक्षिण में मौजूदा सुरक्षा घेरे को और चौड़ा करेगी, जिसका मुख्य लक्ष्य ईरान समर्थित हिजबुल्लाह समूह होगा।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य और आर्थिक संकट
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माना जाता है। यहां पैदा हुए व्यवधान ने पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है।
एशिया के कई देशों, जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं, को गैस और तेल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान में केवल कुछ सीमित टैंकरों को ही इस मार्ग से गुजरने की अनुमति मिल पा रही है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।
कूटनीतिक रास्ता ही एकमात्र विकल्प
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दोहराया कि वे लगातार अमेरिकी नेतृत्व के संपर्क में हैं। उनका लक्ष्य स्थिति को बिगड़ने से रोकना और संघर्ष का एक स्थायी समाधान खोजना है। उन्होंने संरचित बातचीत के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने का आह्वान किया।
बताया जा रहा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव भेजा था। हालांकि, ईरान ने फिलहाल इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। अब दुनिया की नजरें आने वाले दिनों में इस्लामाबाद में होने वाली गतिविधियों पर टिकी हैं।