इस्लामाबाद | पाकिस्तान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए इजराइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान अपनी मौलिक विचारधाराओं और सिद्धांतों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा मुस्लिम देशों से की गई उस अपील के बाद आया है, जिसमें उन्होंने इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने को कहा था।
इजराइल पर पाकिस्तान का बड़ा फैसला: इजराइल को देश नहीं मानेगा पाकिस्तान, ट्रम्प की अपील ठुकराई
पाकिस्तान ने इजराइल को मान्यता देने से किया इनकार, कहा- विचारधारा से समझौता मंजूर नहीं है।
HIGHLIGHTS
- पाकिस्तान ने इजराइल को देश के रूप में मान्यता देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है।
- रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान अपनी बुनियादी विचारधारा से समझौता नहीं करेगा।
- डोनाल्ड ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ संबंध सुधारने की अपील की थी।
- पाकिस्तान के पासपोर्ट पर साफ लिखा है कि यह इजराइल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।
संबंधित खबरें
पाकिस्तान का स्पष्ट रुख और विचारधारा
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में एक सार्वजनिक बयान में कहा कि पाकिस्तान की नीतियां उसके संस्थापक सिद्धांतों पर आधारित हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इजराइल के साथ किसी भी प्रकार के राजनयिक संबंध स्थापित करना पाकिस्तान की विचारधारा के विरुद्ध है।
आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान उन लोगों के साथ मेज पर नहीं बैठ सकता जिनकी विश्वसनीयता पर संदेह हो।
संबंधित खबरें
पाकिस्तान दुनिया का शायद इकलौता ऐसा देश है जिसके आधिकारिक पासपोर्ट पर यह स्पष्ट उल्लेख है कि यह इजराइल के लिए मान्य नहीं है।
यह प्रावधान पाकिस्तान के उस कड़े रुख को दर्शाता है जो दशकों से चला आ रहा है और इसमें बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है।
पासपोर्ट पर पाबंदी और कूटनीतिक संदेश
पाकिस्तान के पासपोर्ट पर लिखी यह चेतावनी केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गहरा कूटनीतिक संदेश भी है।
यह दुनिया को बताता है कि पाकिस्तान इजराइल की संप्रभुता को स्वीकार नहीं करता है।
ख्वाजा आसिफ ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान के लिए फिलिस्तीन का मुद्दा केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है।
यह पाकिस्तान के करोड़ों लोगों की धार्मिक और भावनात्मक भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ मामला है।
हम उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान का रुख पूरी तरह साफ है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।
ट्रम्प की अपील और अब्राहम समझौता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से मुस्लिम देशों को इजराइल के करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं।
ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ रिश्ते सुधारने और 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) में शामिल होने की अपील की थी।
पाकिस्तान पर भी यह दबाव बनाया गया था कि यदि वह अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया में भूमिका चाहता है, तो उसे इजराइल को मान्यता देनी होगी।
अब्राहम समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में एक नया अमेरिकी समर्थक गठबंधन तैयार करना है।
अमेरिका की नई रणनीतिक योजना
ट्रम्प की सबसे बड़ी रणनीतिक कोशिश ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए इजराइल और अरब देशों को एक साथ लाना है।
साल 2020 में यूएई, बहरीन और मोरक्को जैसे देशों ने इस समझौते के तहत इजराइल के साथ आधिकारिक संबंध बनाए थे।
ट्रम्प का दावा है कि इन देशों को आर्थिक और व्यापारिक स्तर पर इस समझौते से बहुत बड़ा फायदा हुआ है।
उन्होंने सऊदी अरब और कतर जैसे प्रभावशाली देशों को भी इस समझौते का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है।
घरेलू राजनीति और फिलिस्तीन का मुद्दा
पाकिस्तान के लिए अब्राहम समझौते में शामिल होना राजनीतिक रूप से एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में फिलिस्तीन का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है और जनता के बीच इसका व्यापक प्रभाव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी पाकिस्तानी सरकार इजराइल के प्रति नरम रुख अपनाकर सत्ता में नहीं रह सकती।
पाकिस्तान की सेना और नागरिक सरकार दोनों ही इस मुद्दे पर एकमत नजर आते हैं कि इजराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी।
धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव
पाकिस्तान की आम जनता फिलिस्तीन को एक धार्मिक संघर्ष के रूप में देखती है।
वहां की मस्जिदों और राजनीतिक रैलियों में अक्सर फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लगाए जाते हैं।
पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह है कि जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनता, तब तक वह इजराइल को स्वीकार नहीं करेगा।
यह शर्त पाकिस्तान की विदेश नीति का एक पत्थर की लकीर जैसा हिस्सा बन चुकी है।
जिन्ना की विरासत और कश्मीर का पेच
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इजराइल के गठन का पुरजोर विरोध किया था।
जिन्ना ने इजराइल को 'अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर' करार दिया था।
पाकिस्तान की वर्तमान सरकार आज भी जिन्ना के उसी विजन का पालन करने का दावा करती है।
इसके अलावा, पाकिस्तान फिलिस्तीन और कश्मीर के मुद्दों को अक्सर एक ही चश्मे से देखता है।
दो-राष्ट्र समाधान की मांग
पाकिस्तान का मानना है कि अगर वह फिलिस्तीन पर अपना रुख बदलता है, तो कश्मीर पर उसका नैतिक आधार कमजोर हो जाएगा।
वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना करता है और फिलिस्तीन के समर्थन को उसी नैरेटिव का हिस्सा बनाता है।
इसलिए, इजराइल को मान्यता देना पाकिस्तान के लिए अपनी कश्मीर नीति को दांव पर लगाने जैसा होगा।
फिलिस्तीन के लिए 'दो-राष्ट्र समाधान' पाकिस्तान की विदेश नीति की आधारशिला है।
इमरान खान और अंतरराष्ट्रीय दबाव
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने कार्यकाल के दौरान इजराइल को मान्यता देने के दबाव की बात कही थी।
उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका और कुछ 'मित्र' देशों ने उन पर अब्राहम समझौते में शामिल होने का दबाव डाला था।
इमरान खान ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे जायनिस्टों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि उनके बाद आई शहबाज शरीफ सरकार को इजराइल को मान्यता देने के लिए ही सत्ता में लाया गया है।
भविष्य की कूटनीतिक राह
गाजा युद्ध के बाद पूरी मुस्लिम दुनिया में इजराइल के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है।
ऐसे माहौल में सऊदी अरब जैसे देश भी इजराइल के साथ संबंधों को लेकर पीछे हटते दिखाई दे रहे हैं।
पाकिस्तान के लिए फिलहाल अमेरिका को खुश करने से ज्यादा जरूरी अपनी घरेलू स्थिरता को बनाए रखना है।
पाकिस्तान की यह दो-टूक बात ट्रम्प प्रशासन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती पेश कर सकती है।
निष्कर्ष के तौर पर, पाकिस्तान का इजराइल को मान्यता न देने का निर्णय उसकी ऐतिहासिक विरासत और वर्तमान राजनीतिक जरूरतों का मिश्रण है। अमेरिकी दबाव के बावजूद, पाकिस्तान ने यह साफ कर दिया है कि वह फिलिस्तीनी अधिकारों की कीमत पर कोई भी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन स्वीकार नहीं करेगा। यह फैसला आने वाले समय में पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
*Edit with Google AI Studio