पाली | राजस्थान के पाली जिले में सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवालिया निशान लग रहे हैं। बाली उपखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत खेतरली के अंतर्गत आने वाले कोलवाड़ा गांव की स्थिति प्रशासन की उदासीनता को बयां कर रही है। यहाँ रहने वाली अन्ना बाई, जो बचपन से ही दिव्यांग हैं, आज भी सरकारी सहायता के लिए दर-दर भटक रही हैं। सरकार द्वारा गरीब और जरूरतमंदों के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन अन्ना बाई तक ये लाभ नहीं पहुंच पा रहे हैं।
दस्तावेजों के अभाव में अटकी योजनाएं
अन्ना बाई की स्थिति इतनी दयनीय है कि उनके पास आज तक न तो आधार कार्ड बन पाया है और न ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र। इन बुनियादी दस्तावेजों के अभाव में वे किसी भी सरकारी कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं ले पा रही हैं। अशिक्षा और जानकारी की कमी के कारण यह परिवार आज भी सरकारी सिस्टम की जटिलताओं में उलझा हुआ है। उनके पति बाबूराम मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पेट पाल रहे हैं, लेकिन उनकी आय अत्यंत सीमित है।
आशियाने का संकट और स्वास्थ्य चुनौतियां
इस परिवार के पास रहने के लिए एक पक्का मकान तक नहीं है। वे एक टूटे-फूटे कच्चे मकान में रहने को मजबूर हैं, जिसकी छत भी सुरक्षित नहीं है। बारिश और ठंड के मौसम में उनकी मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। आर्थिक तंगी के कारण जब भी परिवार में कोई बीमार होता है, तो मजदूरी छूट जाती है। ऐसी स्थिति में परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण योजना भी इस पात्र परिवार तक नहीं पहुंच सकी है।
बच्चों के भविष्य पर मंडराता खतरा
अन्ना बाई के परिवार की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती। उनके तीन बच्चों में से दो बेटियों की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। उनका एक बेटा, शंकर, आधार कार्ड न होने के कारण स्कूल नहीं जा पा रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि ग्राम स्तर पर आयोजित होने वाले सरकारी शिविर और जागरूकता अभियान केवल कागजों तक ही सीमित हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रियता पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक जरूरतमंद परिवार तक मदद क्यों नहीं पहुंच रही है।
प्रशासन से जवाबदेही की मांग
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम विकास अधिकारी और अन्य संबंधित कर्मचारियों को इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए। उज्ज्वला योजना, पेंशन योजना और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ अन्ना बाई को तुरंत मिलना चाहिए। यह मामला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन तभी सफल माना जाएगा जब अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को उसका हक मिले। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ओर कब ध्यान देता है और अन्ना बाई को न्याय मिलता है।